Strait of Hormuz और Bab-el-Mandeb पर संकट आया तो क्या हुआ? Modi ने खोज लिया नया रास्ता! Oman के Sohar Port से दे दबादब तेल आयेगा India

नई दिल्ली में 16 सितंबर को आयोजित कार्यक्रम में सोहार मुक्त क्षेत्र और सोहार बंदरगाह के प्रमुख रईद अल रुवैई ने भारतीय कंपनियों और निवेशकों को सोहार में निवेश का आमंत्रण दिया। उनका कहना था कि भारत सोहार के अंतरराष्ट्रीय निवेश परिदृश्य का महत्वपूर्ण और लगातार बढ़ता हिस्सा है।
भारतीयों की ऊर्जा सुरक्षा के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कुछ भी कर गुजरने को तैयार हो जाते हैं। पश्चिम एशिया में होर्मुज और बाब-अल-मंदेब जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर दबाव बढ़ा तो भारत ने हाथ पर हाथ रखकर बैठने की बजाय अपनी ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए नए रास्तों की तलाश तेज कर दी। इसी कूटनीतिक और रणनीतिक सक्रियता के बीच ओमान ने भारत के सामने ऐसा जोरदार प्रस्ताव रख दिया है, जो आने वाले समय में खाड़ी क्षेत्र से भारत तक तेल और ऊर्जा संसाधनों की निर्बाध आपूर्ति के लिए बेहद अहम साबित हो सकता है। हम आपको बता दें कि ओमान ने भारत को अपने सोहार बंदरगाह में निवेश का न्योता दिया है। यह ऐसा बंदरगाह है जो होर्मुज जलडमरूमध्य से दूर है और संकट के समय भारत के लिए खाड़ी तक पहुंच का एक वैकल्पिक और सुरक्षित द्वार बन सकता है।
नई दिल्ली में 16 सितंबर को आयोजित कार्यक्रम में सोहार मुक्त क्षेत्र और सोहार बंदरगाह के प्रमुख रईद अल रुवैई ने भारतीय कंपनियों और निवेशकों को सोहार में निवेश का आमंत्रण दिया। उनका कहना था कि भारत सोहार के अंतरराष्ट्रीय निवेश परिदृश्य का महत्वपूर्ण और लगातार बढ़ता हिस्सा है। भारतीय कंपनियां पहले से ही वहां के औद्योगिक तंत्र में मौजूद हैं और भविष्य में निवेश से औद्योगिक समूहों, आपूर्ति शृंखलाओं और क्षेत्रीय व्यापार को और मजबूती मिल सकती है। ओमान के राजदूत ईसा सालेह अल शिबानी ने भी भारतीय विनिर्माण क्षेत्र के लिए सोहार सहित ओमान के बंदरगाहों को देश और व्यापक क्षेत्र में विस्तार के द्वार के रूप में प्रस्तुत किया।
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होर्मुज से दूरी ही सोहार की सबसे बड़ी ताकत
हम आपको बता दें कि सोहार की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसका भौगोलिक स्थान है। यह ओमान के उत्तर-पूर्वी तट पर स्थित है और होर्मुज जलडमरूमध्य से दूर है। यही दूरी मौजूदा संकट में इसे विशेष महत्व देती है। यदि होर्मुज के रास्ते जहाजों की आवाजाही बाधित होती है, तो सोहार भारत और अन्य एशियाई देशों के लिए खाड़ी क्षेत्र तक पहुंच बनाए रखने वाला एक वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध करा सकता है।
इसका महत्व केवल सैद्धांतिक नहीं है। सोहार संयुक्त अरब अमीरात और पूर्वी सऊदी अरब की महत्वपूर्ण ऊर्जा अवसंरचनाओं के निकट है। पश्चिम एशिया में पाइपलाइनों और बंदरगाहों पर हमलों के बाद समुद्री मार्गों के पुनर्गठन की आवश्यकता बढ़ी है। ऐसी स्थिति में सोहार से कच्चे तेल की जहाजों के माध्यम से आपूर्ति की संभावनाओं पर भी ध्यान बढ़ रहा है।
केवल बंदरगाह नहीं, पूरा औद्योगिक तंत्र
साथ ही सोहार की शक्ति केवल समुद्री स्थिति में नहीं है। वर्ष 2004 से संचालित यह विशाल गहरे समुद्र का बंदरगाह लगभग 2.1 करोड़ वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला है। यहां रसद, पेट्रोरसायन और धातु जैसे प्रमुख औद्योगिक समूह मौजूद हैं। इसके साथ खाद्य क्षेत्र भी विकसित किया गया है और कृषि उत्पादों के लिए ओमान का पहला विशेष टर्मिनल यहां स्थापित है।
हम आपको यह भी बता दें कि सोहार बंदरगाह और मुक्त क्षेत्र में 30 अरब डॉलर से अधिक का निवेश हो चुका है और अधिकारियों के अनुसार इसकी वार्षिक माल संभालने की क्षमता 7.2 करोड़ टन है। वर्ष 2026 की पहली छमाही में कंटेनर यातायात में पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 40 प्रतिशत वृद्धि हुई। इस अवधि में कुल माल आवागमन 5.2 करोड़ टन तक पहुंच गया।
भारतीय कंपनियों की मौजूदगी भी इसे भारत के लिए अधिक महत्वपूर्ण बनाती है। नवीन जिंदल समूह की इस क्षेत्र में इस्पात इकाई है, जिसकी वार्षिक उत्पादन क्षमता 20 लाख टन बताई गई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि सोहार भारतीय कारोबार के लिए केवल संभावित नया पड़ाव नहीं, बल्कि पहले से विकसित औद्योगिक साझेदारी का आधार भी है।
खाड़ी तक भारत की पहुंच को मिलेगा नया विकल्प
इसके अलावा, सोहार की एक और बड़ी ताकत संयुक्त अरब अमीरात के साथ उसकी निकटता है। सोहार से सड़क मार्ग के जरिए संयुक्त अरब अमीरात और आगे खाड़ी सहयोग परिषद के अन्य देशों तक माल पहुंचाया जा सकता है। सोहार और जेबेल अली के बीच हरित गलियारे की योजना तथा ओमान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच प्रस्तावित रेल संपर्क इस व्यवस्था को और मजबूत कर सकते हैं। ओमानी अधिकारियों के अनुसार यह रेल संपर्क 2028 तक चालू होने की संभावना है।
भारत और सोहार के बीच समुद्री संपर्क भी पश्चिम एशिया संकट के बाद बढ़ा है। सोहार को खाड़ी सहयोग परिषद और अफ्रीकी बाजारों के लिए माल के पुनर्वितरण केंद्र के रूप में विकसित करने की संभावनाएं भी तलाशी जा रही हैं।
ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा बड़ा रणनीतिक अर्थ
देखा जाये तो भारत के लिए इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा अर्थ ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति मार्गों के विविधीकरण में छिपा है। भारत की ऊर्जा जरूरतों के बड़े हिस्से का संबंध पश्चिम एशिया से है। ऐसे में किसी एक समुद्री मार्ग पर अत्यधिक निर्भरता जोखिम बढ़ा सकती है। सोहार जैसे वैकल्पिक मार्ग उस जोखिम को बांटने में मदद कर सकते हैं।
ओमान के सलालाह और दुक्म बंदरगाह भी इस व्यापक रणनीति के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। सलालाह पूर्वी अफ्रीका और अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी से जुड़ा प्रमुख केंद्र है, जबकि दुक्म बड़े औद्योगिक और रसद विकास के लिए तैयार किया जा रहा है। इस तरह तीनों बंदरगाहों की भूमिकाएं अलग-अलग हैं। सोहार खाड़ी और औद्योगिक व्यापार पर केंद्रित है, सलालाह अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी और अफ्रीकी संपर्क को मजबूती देता है, जबकि दुक्म बड़े औद्योगिक निवेश के लिए अवसर प्रदान करता है।
इसके अलावा, भारत और ओमान के बीच 1 जून 2026 से लागू व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता भी इस बढ़ते संबंध को व्यापारिक आधार देता है। हालांकि सोहार की वास्तविक दीर्घकालिक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि मौजूदा संकट से पैदा हुआ अतिरिक्त माल आवागमन स्थायी निवेश, नियमित जहाज सेवाओं और मजबूत वितरण तंत्र में कितना बदलता है।
बहरहाल, होर्मुज संकट ने सोहार के महत्व को अचानक बढ़ा दिया है, लेकिन इसकी क्षमता केवल संकट के समय के वैकल्पिक मार्ग तक सीमित नहीं है। गहरे समुद्र का बंदरगाह, औद्योगिक समूह, मुक्त क्षेत्र, संयुक्त अरब अमीरात से संपर्क और भारत के साथ बढ़ती व्यापारिक निकटता इसे भारत की खाड़ी नीति और आपूर्ति शृंखला विविधीकरण में दीर्घकालिक महत्व का केंद्र बना सकती है। भारत के लिए इसका मूल संदेश साफ है। ऊर्जा सुरक्षा केवल तेल खरीदने से नहीं, बल्कि उसे सुरक्षित रूप से भारत तक पहुंचाने वाले अनेक भरोसेमंद मार्ग तैयार करने से सुनिश्चित होती है।
-नीरज कुमार दुबे
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