'लगता है अमेरिका को सैन्य भाषा में जवाब देना पड़ेगा', Russia ने इस बार US को दे डाली खुली चुनौती, दुनियाभर में हड़कंप

अमेरिकी नीति में एक बड़ा विरोधाभास भी सामने आया है। जिस रूस से दूसरे देशों को तेल खरीदने से रोकने की कोशिश की जा रही है, उसी रूस से अमेरिकी परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के लिए समृद्ध यूरेनियम की खरीद को नए कानून में विशेष छूट दी गई है।
अब अमेरिका से सीधी भिड़ंत के मूड में दिख रहा है रूस। यह बात हम इसलिए कह रहे हैं कयोंकि यूक्रेन युद्ध के बीच वाशिंगटन ने मास्को पर आर्थिक शिकंजा कसने के लिए अब तक का एक और बड़ा कदम उठाया है, लेकिन इस बार रूस की तरफ से जवाब भी बेहद कड़ा आया है। रूस की सुरक्षा परिषद के उपाध्यक्ष और पूर्व राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने साफ कहा है कि अमेरिका के नए प्रतिबंधों का जवाब सैन्य प्रतिरोध की भाषा में दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अटलांटिक के पार बैठे लोग केवल सीधे सैन्य प्रतिरोध की भाषा समझते हैं और रूस को उसी भाषा में जवाब देना चाहिए। हालांकि मेदवेदेव ने यह स्पष्ट नहीं किया कि रूस किस तरह के सैन्य कदम पर विचार कर सकता है।
हम आपको बता दें कि तनाव की इस नई पटकथा की शुरुआत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस फैसले से हुई है, जिसके तहत उन्होंने रूस और ईरान पर प्रतिबंधों से जुड़ा नया कानून लागू कर दिया है। इस कानून के तहत रूस के ऊर्जा और रक्षा क्षेत्रों, रूसी अधिकारियों, वित्तीय संस्थानों और प्रतिबंधों से बचने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले कथित छाया यानि शेडो फ्लीट तेल टैंकर बेड़े पर नए प्रतिबंधों का रास्ता खुल गया है। सबसे विस्फोटक प्रावधान यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले बड़े देशों पर शत-प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लगाने का अधिकार मिल गया है। इसका सीधा असर भारत और चीन जैसे बड़े रूसी तेल खरीदारों पर पड़ सकता है।
यानी अमेरिका का निशाना केवल रूस नहीं है। निशाना रूस की ऊर्जा कमाई के साथ-साथ उन देशों पर भी है जो रूसी ऊर्जा खरीदकर मास्को की अर्थव्यवस्था को सहारा दे रहे हैं। इस कानून का नाम दिवंगत अमेरिकी सांसद लिंडसे ग्राहम के नाम पर रखा गया है, जो रूस के मुखर आलोचक रहे थे।
यहीं से इस पूरे घटनाक्रम का सामरिक महत्व और बढ़ जाता है। यूक्रेन युद्ध पांचवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है और पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद रूस अपनी ऊर्जा बिक्री के जरिए राजस्व जुटाता रहा है। अमेरिका अब उस आर्थिक आधार पर प्रहार करना चाहता है। लेकिन रूस के लिए ऊर्जा केवल व्यापार का विषय नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय शक्ति, युद्ध क्षमता और वैश्विक प्रभाव का महत्वपूर्ण साधन है। ऐसे में यदि मास्को को लगता है कि उसके ऊर्जा हितों पर सीधा हमला हो रहा है, तो मेदवेदेव का सैन्य प्रतिरोध वाला बयान महज बयानबाजी न रहकर दबाव बढ़ाने की रणनीति का संकेत बन सकता है।
इसे भी पढ़ें: Vishwakhabram: Trump दबाव बनाते रह गये, Modi-Putin-Jinping गाड़ी आगे बढ़ाते चले गये, त्रिमूर्ति ने मिलकर बदल डाला World Order
इस टकराव का सबसे बड़ा पेच भारत के मोर्चे पर है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए विविध स्रोतों से खरीद करता है, लेकिन रूसी कच्चे तेल का महत्व बेहद बड़ा हो चुका है। उपलब्ध जहाज निगरानी आंकड़ों के मुताबिक अगस्त में भारत ने रूस से प्रतिदिन लगभग 20.8 लाख बैरल तेल खरीदा, जो उसकी कुल तेल खरीद का करीब 45 प्रतिशत था। इससे पहले के दो महीनों में यह हिस्सा 50 प्रतिशत से भी अधिक रहा था। पश्चिम एशिया में ऊर्जा आपूर्ति पहले से दबाव में होने के कारण अचानक रूसी तेल खरीद में बड़ी कटौती भारत की ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू कीमतों पर असर डाल सकती है।
भारत ने भी वाशिंगटन को अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि देश की ऊर्जा सुरक्षा राष्ट्रीय हित, बाजार की बदलती परिस्थितियों और विविध स्रोतों से खरीद पर आधारित रहेगी। नई अमेरिकी व्यवस्था के भारत-अमेरिका संबंधों और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर संभावित प्रभाव को अमेरिकी अधिकारियों के सामने उठाया जा चुका है। खास बात यह है कि यह कानून ऐसे समय आया है जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते की बातचीत निर्णायक चरण में है। इसलिए नई व्यवस्था वाशिंगटन के हाथ में नई दिल्ली पर दबाव बनाने का अतिरिक्त औजार भी बन सकती है।
यहीं अमेरिकी नीति में एक बड़ा विरोधाभास भी सामने आता है। जिस रूस से दूसरे देशों को तेल खरीदने से रोकने की कोशिश की जा रही है, उसी रूस से अमेरिकी परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के लिए समृद्ध यूरेनियम की खरीद को नए कानून में विशेष छूट दी गई है। वर्ष 2025 में अमेरिका ने रूस से करीब 1.02 अरब डॉलर का समृद्ध यूरेनियम खरीदा, जो उसकी कुल ऐसी आयातित मात्रा के मूल्य का लगभग 23 प्रतिशत था। वर्ष 2024 में अमेरिकी वाणिज्यिक परमाणु ऊर्जा की जरूरत के लिए आयात किए गए निम्न-समृद्ध यूरेनियम का करीब 20 प्रतिशत रूस से आया था। वैश्विक यूरेनियम संवर्धन क्षमता में रूस की हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत बताई गई है।
यानी ऊर्जा के एक क्षेत्र में रूस को घेरने वाला अमेरिका दूसरे संवेदनशील क्षेत्र में रूसी आपूर्ति पर अपनी निर्भरता बनाए हुए है। यही वह बिंदु है जिसे मास्को और उसके साझेदार अमेरिकी प्रतिबंध नीति की दोहरी कसौटी के प्रमाण के रूप में पेश कर सकते हैं।
भारत के लिए संकट और भी जटिल है। पहले भी रूस से तेल खरीदने के कारण भारत पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जा चुका है, जबकि चीन को उस समय समान स्तर का दंड नहीं मिला था। अब नए कानून ने फिर वही सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों को रूस से भारत की ऊर्जा खरीद के साथ जोड़कर देखा जाएगा। भारतीय नीति-निर्माताओं के लिए चुनौती यह है कि एक तरफ अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंध महत्वपूर्ण हैं, तो दूसरी तरफ रूस से मिलने वाला तेल ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है।
रणनीतिक स्तर पर सबसे बड़ा संकेत यह है कि दुनिया की दो प्रमुख शक्तियों के बीच टकराव अब केवल यूक्रेन के मैदान तक सीमित नहीं रह गया है। प्रतिबंध, ऊर्जा, व्यापार, समुद्री परिवहन, वित्त और अब सैन्य प्रतिरोध, ये सभी एक ही संघर्ष के अलग-अलग मोर्चे बनते जा रहे हैं। चीन भी इस अमेरिकी दबाव के दायरे में है और ऐसे समय में जब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा प्रस्तावित है, वाशिंगटन के इस कदम का असर व्यापक शक्ति-संतुलन पर पड़ना तय है।
उधर, मेदवेदेव की चेतावनी इसलिए गंभीर है कि आर्थिक युद्ध को रूस अब केवल आर्थिक चुनौती के रूप में देखने से इंकार करता दिखाई दे रहा है। अगर मास्को वास्तव में प्रतिबंधों के जवाब में सैन्य दबाव बढ़ाता है, तो यूक्रेन युद्ध के आसपास पहले से मौजूद तनाव का दायरा और फैल सकता है। और अगर अमेरिका भारत तथा चीन जैसे बड़े रूसी ऊर्जा खरीदारों पर भारी शुल्क लगाता है, तो इसका असर केवल रूस की अर्थव्यवस्था पर नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था, व्यापारिक संबंधों और महाशक्तियों के बीच बनते नए ध्रुवीकरण पर पड़ सकता है।
फिलहाल तस्वीर साफ है कि वाशिंगटन आर्थिक हथियारों से मास्को को झुकाने की कोशिश कर रहा है और मास्को की तरफ से जवाब में सैन्य प्रतिरोध की धमकी सुनाई दे रही है। यूक्रेन का युद्ध अब केवल यूरोप की लड़ाई नहीं रह गया है; यह ऊर्जा, व्यापार और वैश्विक शक्ति संतुलन की ऐसी लड़ाई बन चुका है, जिसमें भारत जैसे देशों को भी अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए बेहद सावधानी से कदम बढ़ाने होंगे।
अन्य न्यूज़













