रियाद से दगा, हूतियों से डर! क्या सऊदी अरब पर आये संकट में काम आएगा पाकिस्तान का 'कागज़ी' समर्थन? शहबाज़ शरीफ ने क्राउन प्रिंस से की बात

Shehbaz Sharif
ANI

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने रविवार को सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से बात की। इस बातचीत में उन्होंने सऊदी अरब के आम लोगों और आर्थिक बुनियादी ढांचे पर हाल ही में हुए हूति हमलों की कड़ी निंदा दोहराई।

ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के खिलाफ सीधे सैन्य कार्रवाई से पीछे हटने के संकेतों के बाद पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ अपने कूटनीतिक रिश्तों को संभालने की कोशिशें तेज कर दी हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से फोन पर बात कर सऊदी अरब के नागरिक क्षेत्रों और आर्थिक बुनियादी ढांचे पर हुए हूती हमलों की कड़े शब्दों में निंदा की।

मक्का रक्षा समझौते पर पाकिस्तान का स्पष्टीकरण
यह बातचीत तब हुई जब इस्लामाबाद ने यह साफ करने का प्रयास किया कि पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुए 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौते' का मतलब हूतियों के खिलाफ पाकिस्तानी सेना की स्वत: सैन्य भागीदारी नहीं है।

इससे पहले पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने बयान दिया था कि यदि सऊदी अरब पर हूती हमले जारी रहते हैं, तो मक्का समझौता लागू हो सकता है। हालांकि, बाद में पाकिस्तान सरकार ने रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि यह समझौता मुख्य रूप से रक्षात्मक (Defensive) है और इसके तहत पाकिस्तानी सेना को किसी आक्रामक सैन्य अभियान में शामिल होने की बाध्यता नहीं है।

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रविवार को फ़ोन पर हुई बातचीत के दौरान, शरीफ़ ने सऊदी नेतृत्व और वहां के लोगों के साथ पाकिस्तान के "पूरे समर्थन" की बात कही। उन्होंने कहा कि हूति हमले क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा के लिए खतरा हैं और इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति में और बाधा आ सकती है।

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यह बातचीत यमन में तनाव बढ़ने के बीच हुई, जहां ईरान समर्थित हूति सेना और सऊदी समर्थित सरकारी सेना के बीच लड़ाई तेज़ हो गई है। हूतियों ने हाल ही में लाल सागर के अहम बंदरगाह मोखा और बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य के पास एक द्वीप पर कब्ज़ा कर लिया है, जिससे दुनिया के अहम शिपिंग रूटों में से एक की सुरक्षा पर फिर से ध्यान केंद्रित हुआ है।

पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हाल ही में हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में यह प्रावधान है कि तीनों देशों में से किसी एक पर भी सशस्त्र हमला होने पर उसे सभी पर हमला माना जाएगा।

पिछले हफ़्ते, रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ़ ने कहा था कि सऊदी अरब पर हमले से यह समझौता लागू हो सकता है।

उन्होंने कहा था, "अगर बिना उकसावे के कोई हमला होता है, या यमन में जो हो रहा है उसका असर सऊदी अरब तक पहुँचता है, तो निश्चित रूप से मक्का समझौता लागू हो जाएगा।"

इसके बाद इस्लामाबाद ने ज़ोर देकर कहा कि यह समझौता मुख्य रूप से रक्षात्मक है और इसके तहत पाकिस्तानी सेना को आक्रामक सैन्य अभियानों के लिए अपने-आप शामिल नहीं होना पड़ता है।

पाकिस्तान ने रियाद को समर्थन दोहराया

शरीफ़ ने मोहम्मद बिन सलमान से कहा कि वह, फील्ड मार्शल सैयद आसिम मुनीर और उप प्रधानमंत्री मोहम्मद इशाक डार क्षेत्र में तनाव कम करने और शांति को बढ़ावा देने के प्रयास जारी रखेंगे। उन्होंने संकट के समय सऊदी क्राउन प्रिंस की "समझदारी भरी और दूरदर्शी लीडरशिप" की भी तारीफ़ की। शरीफ़ के ऑफ़िस के मुताबिक़, मोहम्मद बिन सलमान ने सऊदी अरब के लिए पाकिस्तान के "मज़बूत समर्थन" और क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए उसकी कोशिशों की तारीफ़ की।

दोनों नेताओं ने लगातार संपर्क में रहने पर सहमति जताई और कहा कि वे जल्द ही मिलने के लिए उत्सुक हैं। शरीफ़ ने सऊदी किंग सलमान बिन अब्दुलअज़ीज़ अल सऊद को भी अपनी शुभकामनाएँ भेजीं।

यह बातचीत मक्का समझौते पर हस्ताक्षर के बाद सऊदी अरब के प्रति पाकिस्तान की सुरक्षा प्रतिबद्धताओं पर उठ रहे सवालों के बीच हुई है। हूतियों के ख़िलाफ़ सैन्य रूप से आगे बढ़ने में इस्लामाबाद की साफ़ हिचकिचाहट रियाद में इस बात को लेकर चिंता पैदा कर सकती है कि पाकिस्तान अपनी रक्षा प्रतिबद्धताओं को किस हद तक सैन्य कार्रवाई में बदलेगा।

यमन में लड़ाई बढ़ने पर सऊदी अरब ने अमेरिका का रुख़ किया
यमन संघर्ष के तेज़ होने के साथ ही सऊदी अरब की सुरक्षा चिंताएँ बढ़ गई हैं। सऊदी-समर्थित सरकारी बलों ने रविवार को ताइज़ प्रांत के मोखा, धुबाब और अन्य इलाक़ों में हूती ठिकानों पर हमले किए, जबकि हूतियों ने पड़ोसी सऊदी अरब की ओर फ़ायरिंग की।

यह ताज़ा तनाव 2022 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से हुए युद्धविराम के बाद से सबसे गंभीर है। ख़बरों के मुताबिक़, सितंबर की शुरुआत से अब तक 82,000 से ज़्यादा लोग विस्थापित हुए हैं, जिससे यमन का पहले से ही गंभीर मानवीय संकट और बढ़ गया है।

इस लड़ाई ने बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य (एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग) में रुकावट की आशंका भी पैदा कर दी है, ऐसे समय में जब अमेरिका-ईरान संघर्ष के बीच होर्मुज़ जलडमरूमध्य से व्यावसायिक शिपिंग दबाव में है।

इस पृष्ठभूमि में, रियाद ने अमेरिकी समर्थन भी मांगा है। हालाँकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हूतियों के ख़िलाफ़ सीधे अमेरिकी सैन्य कार्रवाई से इनकार कर दिया है, जिससे सऊदी अरब के सामने अनिश्चितता बढ़ गई है क्योंकि वह अपने सुरक्षा सहयोगियों की विश्वसनीयता का आकलन कर रहा है।

शरीफ़ की ट्रंप से मुलाक़ात तय
रियाद के साथ शरीफ़ का संपर्क ट्रंप के साथ उनकी संभावित मुलाक़ात से कुछ दिन पहले हुआ है। समाचार एजेंसी पीटीआई की एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, शरीफ़ की ट्रंप से मुलाक़ात 23 सितंबर को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र के दौरान तय है। ख़बरों के मुताबिक़, उन्हें उस शाम राष्ट्राध्यक्षों और सरकार प्रमुखों के लिए ट्रंप और फ़र्स्ट लेडी मेलानिया ट्रंप द्वारा आयोजित रिसेप्शन डिनर में भी आमंत्रित किया गया है। इस बैठक से इस्लामाबाद को वॉशिंगटन और रियाद के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाने का मौका मिल सकता है, भले ही यमन में बढ़ते तनाव के कारण खाड़ी क्षेत्र में अपने अहम सहयोगी देश के प्रति पाकिस्तान की सुरक्षा प्रतिबद्धताओं की नए सिरे से समीक्षा हो रही हो।

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