Soul After Death: आत्मिक मूर्छा से होता है शरीर त्याग, परलोक विज्ञान ने बताए आत्मा के रोचक रहस्य

Soul After Death
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परलोक विज्ञान के अनुसार आत्मा मृत्यु के बाद परिजनों से विचारों के माध्यम से संपर्क साधने का प्रयास करती है। सूक्ष्म प्राण से जुड़कर आत्मा समय और स्थान के बंधन से मुक्त हो जाती है। शरीर त्याग के समय व्यक्ति आत्मिक मूर्छा की स्थिति में पहुंचता है, जिसका भान उसे नींद की तरह नहीं होता।

परलोक विज्ञान से जुड़े दो अहम तथ्यों पर विचार किया जा सकता है। पहला यह कि मरणासन्न अवस्था में या मृत्यु के बाद आत्मा अपने निकट के लोगों से संपर्क स्थापित करने की कोशिश करती है और अपना संदेश देने की कोशिश करती है। यह संदेश भावों और विचारों में प्रकट होता है। वहीं दूसरा यह कि आत्मा के लिए काल और स्थान बाधक नहीं है। आत्मा एक ही समय में कई स्थानों पर उपस्थित रह सकती है।

आत्मा के विषय पर विस्तार से अध्ययन करने पर यह पता चलता है कि आत्मा, जिसको चेतना भी कहा जाता है, वह सूक्ष्मतम् तत्व है। इसके लिए स्थान और समय का अपना कोई भी महत्व नहीं होता है। आकाश में सर्वत्र एक समान रूप से एक विशेष तरह की सूक्ष्मतम वायु जिसको ईथर कहा जाता है, वह विद्यमान है। इसमें प्रवेश किए गए शब्द और ध्वनि के लिए स्थान और समय बाधक नहीं होता है।

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इसको उदाहरण के रूप में समझना चाहें, तो रेडियो, टेलीविजन और वायरलेस तरंगों की कार्यपद्धति इसी का उदाहरण है। इसी तरह आत्मा भी उस सूक्ष्मतम वायु, जिसको योगी गण सूक्ष्म प्राण कहते हैं, उससे संयुक्त होकर स्थान और समय से शून्य हो जाती है। इस स्थिति में आत्मा एक ही समय में कई स्थानों का दृश्य देख सकती है।

इसके अलावा आत्मा हजारों मीलों की दूरी को 1 सेकेंड के 100वें हिस्से में तय कर सकती है। आत्मा अपने विचारों और भावों को अपने संबंधी के दिमाग में प्रकट कर सकती है। आत्मा के लिए कुछ भी असंभव नहीं है। आत्मा किसी भी व्यक्ति की गति, विचारों और मति को फौरन समझ सकती है।

शरीर से अलग होते ही आत्मा को सूक्ष्मतम वायु अपनी ओर अट्रैक्ट कर लेती है। तमाम शोध यह बताते हैं कि इसी वजह से मृत व्यक्ति को हल्केपन का अनुभव होता है और उसको ऐसा लगता है, जैसे वह हवा में तैर रहा है।

मृत्यु और आत्मा के बारे में ज्यादा गहराई से जानने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि मूर्छा 3 तरह की होती है। जिसमें शारीरिक मूर्छा, मानसिक मूर्छा और आत्मिक मूर्छा है।

तीसरी तरह की मूर्छा को मृत्यु की मूर्छा कहा जाता है। क्योंकि आत्मिक मूर्छा में शरीर से आत्मा का संबंध टूटता है। आत्मिक मूर्छा में व्यक्ति शरीर का त्याग करता है। जैसे सोते समय व्यक्ति को यह पता नहीं चला पाता है कि वह कब सो गया है। ठीक उसी तरह से व्यक्ति कब मरा, उसको ज्ञात नहीं होता है। सोना और मरना दोनों ही अंजाने में या अज्ञान में घटित होते हैं।

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