Ganesh Chaturthi Celebration: फिल्मी या कस्टमाइज्ड मूर्ति से बचें, जानें गणेश चतुर्थी के लिए शास्त्र समम्मत Idol Selection के संबंधी कड़े नियम

Ganesh Chaturthi Celebration
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गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश की मूर्तियों में बढ़ती रचनात्मकता और कस्टमाइजेशन को लेकर शास्त्रों के नियमों का विश्लेषण आवश्यक है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार प्रत्येक देवता का रूप उनकी तत्व शक्ति का प्रतीक है, जिसे मानवीय या फिल्मी स्वरूप देना शास्त्र सम्मत नहीं माना जाता। मूर्ति चयन में शास्त्रीय विधानों और पारंपरिक स्वरूपों का पालन ही आध्यात्मिक फल प्राप्ति के लिए अनिवार्य है। कीवर्ड: गणेश चतुर्थी 2026, गणेश मूर्ति नियम, शास्त्र सम्मत मूर्ति, धार्मिक मान्यताएं।

करोड़ों भक्त गणेश चतुर्थी का बेसब्री से इंतजार करते हैं ताकि वह बप्पा का स्वागत कर सके। हिंदू धर्म में यह सबसे लोकप्रिय त्योहारों में से एक है गणेश चतुर्थी। देशभर धूमधाम से यह त्योहार मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी का पर्व भगवान गणेश की पूजा, उपासना और सेवा का प्रतीक है। इस बार गणेशोत्सव 14 सितंबर 2026, सोमवार के दिन मनाया जाएगा, यह 10 दिनों तक चलेगा। 

पूरे भारत वर्ष में गणेश चतुर्थी के मौके पर जगह-जगह गणपति जी के पंडाल लगाए जाते हैं। वहीं, इन पंडालों में भगवान गणेश की भव्य मूर्तियां स्थापित कराई जाती है। हर साल गणपति बप्पा की मूर्तियों में तरह-तरह की क्रिएटिविटी देखने को मिलती है।

खासकर कई जगहों पर गणेश जी को महादेव के रुप में दर्शाया जाता है, तो कहीं नारायण के रुप में, कही उन्हें साधु-संतों के भेष में तो कहीं प्रसिद्ध फिल्मी पात्रों और मनुष्यों के चेहरे के साथ स्थापित किया जाता है।

कभी किसी ने सोचा है कि, क्या देवमूर्ति को किसी भी रुप में बनाया जा सकता है? क्या भगवान गणेश की कस्टमाइज मूर्तियों की पूजा करने का विधान है और इस पर शास्त्र क्या कहते हैं? आइए आपको बताते हैं पूरी जानकारी।

कस्टमाइज मूर्तियों की पूजा करनी सही या गलत?

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार प्रत्येक देवता की अपनी स्वतंत्र सत्ता, रुप और गुणों को निर्धारित किया गया है। पुराणों में और आगम शास्त्रों में कही भी ऐसा नहीं लिखा है कि किसी भी देवता की मूर्ति में दूसरे देवता का चेहरा लगाना चाहिए। जबकि हर एक देवता का रुप उसकी तत्व शक्ति का प्रकट स्वरुप माना जाता है। ऐसे में किसी भी देवता की मूर्ति का स्वरुप बदलना विकृति कहा जा सकता है। 

खासकर मूर्ति का स्वरुप जैसे शास्त्र में बताया गया है वैसे ही होना अनिवार्य है। किसी भी देवता का रुप जोड़ना, संतों का रुप मिलाना या फिर मनुष्यों का रुप मिलाना इसे वर्जित माना जाता है और यह शास्त्र समम्मत नहीं माना जाता है। 

इसके अतिरिक्त, प्रत्येक देवता के हाथों में कौन-सा आयुध हो, कौन-सी मुद्रा हो ये निश्चित होती है। जैसे भगवान विष्णु के हाथों में शंख, चक्र और गदा होता है, वैसे ही भगवान गणेश के हाथों में पाश, अंकुश, मोदक और अभय मुद्रा होती है।

जब भी आप भगवान गणेश की मूर्ति खरीदें तो पहले इन बातों का जरुर ध्यान रखें कि, मूर्ति शास्त्र के अनुसार न बनी हो तो दैवीय शक्ति का आवेश उस मूर्ति में नहीं होता है।

 इसलिए जब आप गणेश चतुर्थी से पहले भगवान गणेश की मूर्ति खरीदन जाए, तो फैंसी या कस्टमाइज मूर्तियों को खरीदने से बचें। सच्चे मन से श्री गणेश जी की पूजा करें।

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