'वंदे मातरम्' के अपमान से Congress के तुष्टिकरण की पोल खुली, Nehru से लेकर Rahul Gandhi तक एक ही पैटर्न?

‘वंदे मातरम्’ के हाल ही में किए गए अपराध और अपमान के संदर्भ में कांग्रेस के प्रवक्ता और आधिकारिक व्यक्तव्य जो कह रहे हैं उसमें वे गांधी जी, नेताजी सुभाषचंद्र, गुरुदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर आदि का नाम लेते हुए इस गीत के विभाजन को उनकी से हुआ बता रहे हैं। यह एक भ्रमजाल और झूठ का पहाड़ है।
एक बंगाली कहावत है -
“मायेर स्तबेर अर्धेक ग्रहण, अर्धेक बर्जन, ए कैमन सन्तानेर भक्ति?”
मातृभूमि के स्तुति गीत को आधा स्वीकारना और आधा त्यागना, यह किस प्रकार की संतान की भक्ति है? भद्र बंगाल की सौ वर्षों की व्यथा, वेदना ही इस लोकोक्ति रूप में प्रकट हुई है।
भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम का शायद ही कोई दूसरा गीत “वन्दे मातरम्” जितना भावात्मक, राजनीतिक और ऐतिहासिक रहा हो। बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय जी की यह रचना केवल साहित्य नहीं अपितु वह स्वदेशी आन्दोलन, क्रांतिकारियों और राष्ट्रीय जागरण का उद्भट उद्घोष बनी थी।
15 अगस्त, 2026 को कांग्रेस के केंद्रीय कार्यालय दिल्ली में कारित घृणित कृत्य से कांग्रेस का इस्लामिक डीएनए पुनः सिद्ध हो गया है। वंदे मातरम् के इस अपमान के समय नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, दशक भर कांग्रेस अध्यक्ष रही सोनिया गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे उपस्थित थे। दुस्साहस और दुर्भाग्य का विषय यह है कि इन तीनों ने ही वंदे मातरम् के अपमान के इस दुष्कृत्य को प्रारंभ किया था।
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इस दुर्भाग्यजनक घटना के बाद कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं ने देश को स्पष्टीकरण देना प्रारंभ किया कि - “सोनिया गांधी ने वंदे मातरम् का अपमान नहीं किया बल्कि वे बुजुर्ग खड़गे जी को खड़े होने के कारण असहज होता देखकर उनके लिए कुर्सी मंगा रही थी”। यहीं से कांग्रेस नेतृत्व की मूढ़ता, राष्ट्र अनास्था व मुस्लिम तुष्टिकरण के पक्ष में दुराग्रह रखने के चरित्र की पुनरावृत्ति दिखाई पड़ती है।
इस घटनाक्रम के अंतरतत्व को समझिए। कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं को अपने नेतृत्व द्वारा ‘वंदे मातरम्’ का यह अपमान बुरा लगा इसलिए ही उन्होंने बिना केंद्र या प्रदेश नेतृत्व के कहे ही इस घटना पर कांग्रेस नेतृत्व का बचाव प्रारंभ कर दिया था। हजारों कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया पर लाखों पोस्ट डाली और कांग्रेस नेतृत्व का बचाव किया। यह ‘वंदे मातरम्’ और ‘मुस्लिम तुष्टिकरण की कांग्रेसी प्रवृत्ति’ के विरोध का प्रतीक था। इस मनोभाव को कांग्रेस के इटालियन नेतृत्व ने समझने का प्रयास ही नहीं किया।
कांग्रेस ने इस घटना पर अपने कार्यकर्ताओं की भावनाओं को नहीं समझा तो भी कोई बात नहीं होती। कांग्रेस ने तो अपनी हठधर्मिता, अड़ियलपन, मति मूढ़ता की हद तो तब दिखा दी जब उसने अपनी राष्ट्रीय वर्किंग कमेटी में ‘वंदे मातरम्’ को पूर्ण रूप में नहीं गाने के लिए प्रस्ताव ही पारित कर दिया।
‘वंदे मातरम्’ के हाल ही में किए गए अपराध और अपमान के संदर्भ में कांग्रेस के प्रवक्ता और आधिकारिक व्यक्तव्य जो कह रहे हैं उसमें वे गांधी जी, नेताजी सुभाषचंद्र, गुरुदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर आदि का नाम लेते हुए इस गीत के विभाजन को उनकी से हुआ बता रहे हैं। यह एक भ्रमजाल और झूठ का पहाड़ है।
गांधी जी तो इस बात के पक्षधर थे कि यह गीत संपूर्ण देश को जोड़ने वाला प्राणतत्त्व है और इसे इसके पूर्ण वैभव के साथ संपूर्णतः स्वीकार किया जाना चाहिए। गांधी जी ने इसके समर्थन में अपनी स्पष्ट राय रखी थी, किंतु जवाहरलाल नेहरू ने तुष्टिकरण की अपनी राजनैतिक कुटिलताओं और प्राथमिकताओं के चलते गांधी जी की एक न चलने दी।
इतिहास यह भी है कि, यह दुखद एतिहासिक पृष्ठ रहस्यमयी भी है। रहस्य यह कि - “अंततः वह कौन सी कमजोर नस थी,, जिसके आधार पर नेहरू जी ऐसे निर्णय भी गांधी जी से करवा लेते थे जिनके लिए गांधी जी कभी भी तैयार नहीं थे”।
गांधी जी वंदेमातरम् विभाजन हेतु असहमत थे। गांधी जी बंग-भंग हेतु भी सहमत नहीं थे। गांधी जी ने कहा था कि “इस देश का विभाजन मेरी लाश पर होगा”। गांधी जी स्वतंत्रता पश्चात् कांग्रेस को विसर्जित करने हेतु भी संकल्पित थे। गांधी जी ने कहा था कि स्वतंत्रता पश्चात् हम एक बूँद की स्याही लेंगे और यह लिख देंगे - “इस देश में गौहत्या वैसा ही दंड होगा जैसा मानव हत्या के लिए होता है”। स्वच्छता, हिंदी राष्ट्रभाषा, ग्रामवासी भारत आदि हेतु भी गांधी जी प्रतिबद्ध थे। कांग्रेस ने सात दशकों की सत्ता में इन विषयों को त्याज्य रखा। ‘भारत में रामराज स्थापना’ को कांग्रेस का लक्ष्य बनाया था किंतु ‘नेहरू-गांधी कांग्रेस’ मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए श्रीराम को ही कल्पना सिद्ध करने के प्रयास में लग गई। कांग्रेस स्वयं को सेकुलर सिद्ध करने के अनथक प्रयास करने लगी थी और ‘रामेश्वरम् रामसेतु’ के विध्वंस, विनाश, भंजन, खंडन हेतु मशीनें समुद्रतट पर भेज चुकी थी। ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ हेतु कांग्रेस ने न जाने कितने ही कांड इस देश में किया और सतत-निरंतर किए हैं। आश्चर्य और दुस्साहस का विषय यह है कि ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ के लिए देश भर से लताड़े जाने के बाद भी कांग्रेस नेतृत्व इस बात को समझ ही नहीं रहा है। हाँ, कांग्रेस का जमीनी कार्यकर्ता इस बात कोई समझ भी रहा है और वह कांग्रेस की ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ की नीति के विरोध में भी है, तब ही तो ‘कार्यकर्ता बेचारे’ ने सोशल मीडिया पर लाखों की संख्या में आकर यह कहा था कि “सोनिया जी वंदे मातरम् का गान रोक नहीं रही थी बल्कि खड़गे जी के लिए कुर्सी बुला रही थी”। ‘वंदे मातरम्’ और ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ की यह कांग्रेस कार्यकर्ता की नैसर्गिक प्रतिक्रिया थी जिसे कांग्रेस नेतृत्व ने स्वीकार करना चाहिए थे किंतु कांग्रेस ने ‘राम पथ’ को नहीं बल्कि ‘रोम पथ’ को चुना हुआ है।
26 अक्टू.- 1 नव. 1937 की कलकत्ता कांग्रेस कार्यसमिति में ‘वंदे मातरम्’ गान के विभाजन की अनुशंसा और कुछ नहीं बल्कि एक ‘इमोशनल राष्ट्रीय ब्लैक मेल’ था। यह देश विभाजन में अपना हित देखने वाले नेताओं द्वारा निर्मित ‘ब्लैकमेल’ था।
आदरणीय बंकिम बाबू ने जब भारतमाता को केवल एक भौगोलिक भू-भाग के रूप में नहीं, बल्कि साक्षात् देवी और जननी के रूप में देखा, तो उनके मानस में 'सोनार बांग्ला' और संपूर्ण भारतवर्ष का एक ऐसा दिव्य चित्र उभर आया, जिसने औपनिवेशिक दास्तां के अंधकार को चीरकर रख दिया।
विडंबना, वंचना, विसंगति, विचित्र, यह है कि जिस गीत ने स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों, क्रांतिकारियों और हुतात्माओं को हँसते-हँसते फाँसी के फंदों को जयमाल मान लेने की असीम शक्ति दी, उसी महान कृति को स्वतंत्रता के पश्चात राजनीति और तुष्टिकरण के बवंडर में उलझा दिया गया। मुस्लिम तुष्टिकरण के मकड़जाल ने वंदेमातरम् को कोई एक सौ वर्षों तक, उसके पूर्ण गान से वंचित रखा।
प्रश्न यह है कि यदि प्रथम दो छंद पहले से ही कई कांग्रेस सभाओं में प्रचलित थे, तो 1937 में उसे औपचारिक रूप से सीमित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? वस्तुतः कांग्रेस, मुस्लिम तुष्टिकरण का समायोजन कर रही थी।
कांग्रेस द्वारा गांधी जी, गुरुदेव रबिंद्रनाथ व नेताजी की ढाल लेकर ‘वंदे मातरम्’ का विरोध ग़लत है। इतिहासकार एस. मुखर्जी ने अपनी पुस्तक Muslim Politics के पृष्ठ क्र. 53 पर इसे कांग्रेस द्वारा मुसलमानों को संतुष्ट करने के लिए गीत को “mutilate” (अंगभंग) करने जैसा बताया है। इतिहासकार ए. जी. नूरानी ने “Vande Mataram: A Historical Lesson”, Economic and Political Weekly, Vol. 8, 9 जून 1973, पृष्ठ क्र. 1039–1043 में लिखा है कि “वन्दे मातरम् का विभाजन केवल एक पक्ष की कायरता थी”।
इतिहासकार सब्यसाची भट्टाचार्य ने भी अपनी पुस्तक Vande Mataram: The Biography of a Song में देश के अनेक अग्रणी मुस्लिम नेताओं द्वारा ‘वंदे मातरम्’ पूर्णतः आनंदपूर्वक गाने की घटनाओं का विस्तृत उल्लेख किया है।
यही सत्य है शेष कांग्रेस के झूठ का पहाड़!
- डॉ. प्रवीण दाताराम
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