जयपुर से लेकर भोपाल और गया से उन्नाव तक...Gen Z तो झांकी थी, पूरी पिक्चर दिखा रहे Gen अल्फा?

 Gen Alpha
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अभिनय आकाश । Aug 20 2026 2:37PM

स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को बुनियादी सुविधाओं के लिए आखिर सड़क पर क्यों उतरना पड़ रहा है? जेन जी के दौर में शिक्षा और परीक्षाओं को लेकर बड़े-बड़े विरोध देखने को मिले। अब जेन एल्फा भी उसी रास्ते पर आगे बढ़ते दिख रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि यह बच्चे छोटे हैं, स्कूल में हैं, लेकिन अपनी मांग को लेकर बिल्कुल साफ हैं।

कहीं क्लॉस रूम में पंखा नहीं चलता, कहीं पीने का पानी नहीं है। कहीं टॉयलेट इस्तेमाल करने लायक नहीं है। कहीं शिक्षक नहीं है तो कहीं मिड-डे मील में कीड़े मिलने की शिकायत है। अब इन सब के खिलाफ स्कूलों के बच्चे आवाज उठा रहे हैं। जेन जी के बाद अब जेन एल्फा भी अपने हक के लिए सड़कों पर उतरते दिख रहे हैं। बीते कुछ हफ्तों में देश के कई राज्यों से स्कूल-कॉलेज के बच्चों के प्रदर्शन की तस्वीर सामने आ रही है। इन प्रोटेस्ट में एक कहानी राजस्थान के जयपुर की है, जहां मूक-बधिर छात्रों ने प्रदर्शन किया और सरकार ने एक्शन भी लिया। वहीं उत्तर प्रदेश में तो जेन एल्फा ने विधायक का काफिला तक रोक दिया। इन सभी जगहों पर मुद्दे अलग-अलग थे। स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को बुनियादी सुविधाओं के लिए आखिर सड़क पर क्यों उतरना पड़ रहा है? जेन जी के दौर में शिक्षा और परीक्षाओं को लेकर बड़े-बड़े विरोध देखने को मिले। अब जेन एल्फा भी उसी रास्ते पर आगे बढ़ते दिख रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि यह बच्चे छोटे हैं, स्कूल में हैं, लेकिन अपनी मांग को लेकर बिल्कुल साफ हैं।

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स्कूल जाने के लिए पक्की सड़क की मांग को लेकर बच्चे कलेक्ट्रेट पहुंचे

11 अगस्त को, उत्तर प्रदेश के हमीरपुर ज़िले की चंदू पुर ग्राम पंचायत के छात्र और ग्रामीण तिरंगा यात्रा के ज़रिए लगभग 5 किलोमीटर दूर अपने स्थानीय कलेक्ट्रेट पहुंचे। बच्चों ने अपने स्कूल तक जाने के लिए पक्की सड़क की मांग की। उन्होंने कहा कि उन्हें कीचड़ से होकर गुज़रना पड़ता है, खासकर बारिश के मौसम में और आज़ादी के बाद से इस इलाके में कोई पक्की सड़क नहीं बनी है। वे ज़िला मजिस्ट्रेट के दफ़्तर के गेट पर बैठ गए और कहा कि जब तक काम शुरू नहीं होगा, वे वहीं डटे रहेंगे। प्रशासन ने बताया कि सड़क बनाने का प्रोजेक्ट, जिसकी लागत लगभग 1 करोड़ रुपये आंकी गई है, कई सालों से अटका हुआ था। एक अधिकारी ने बताया कि वन विभाग से NOC मिल गई है और प्रस्ताव सरकार को भेज दिया गया है; मंज़ूरी मिलने के बाद टेंडर निकाला जाएगा। हालांकि, हमीरपुर के इस विरोध-प्रदर्शन ने बच्चों के इस आंदोलन से जुड़ा एक अहम सवाल भी खड़ा कर दिया। यह आंदोलन कितना बच्चों की अपनी पहल है और कितना उनके आस-पास के बड़ों की वजह से हो रहा है? हमीरपुर के ADM ने आरोप लगाया कि कुछ असामाजिक तत्व बच्चों को आगे करके इस मामले को तूल दे रहे हैं।हालांकि, प्रदर्शनकारी सड़क का काम शुरू करने की मांग करते रहे।

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यूपी, एमपी, महाराष्ट्र, बिहार और राजस्थान में नई पीढ़ी का विरोध-प्रदर्शन

28 जुलाई को उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। किशनपुर कस्बे के सर्वोदय इंटर कॉलेज के करीब 1,500 छात्र अपनी क्लास से बाहर निकल आए और कॉलेज की सुविधाओं के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन किया। उनकी मांगों में सही डेस्क और बेंच, टॉयलेट, पीने का पानी, मिड-डे मील और लाइब्रेरी व कंप्यूटर लैब जैसी सुविधाओं की कमी को दूर करना शामिल था। स्कूल प्रशासन को झुकना पड़ा। अधिकारियों ने कहा कि मांगों को पूरा किया जाएगा, जिसमें हर क्लास में चार पंखे लगाना, बिजली की वायरिंग ठीक करना और मिड-डे मील की व्यवस्था करना शामिल है। बच्चे बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहे थे, और लगभग हर जगह यही पैटर्न देखने को मिला। बिहार में गया के सिमुआरा मिडिल स्कूल के करीब 40-50 छात्र SDM से सीधे बात करने के लिए लगभग चार किलोमीटर पैदल चलकर उनके ऑफिस पहुंचे। जूनियर अधिकारियों से नहीं, बल्कि सीधे बड़े अधिकारी से। उनकी शिकायतों में खाने लायक मिड-डे मील देना, गंदे टॉयलेट की सफाई, क्लास में पंखे, टूटी बेंच बदलना और खराब हैंडपंप की मरम्मत करवाना शामिल था। प्रशासन ने जांच के आदेश दिए और हेडमास्टर को शिकायतों को दूर करने के लिए समय-सीमा दी। राजस्थान के बाड़मेर में, छात्रों ने टीचर की खाली पोस्ट को लेकर सरकारी स्कूलों के गेट पर ताला लगा दिया। यह विरोध तब तक जारी रहा जब तक ज़िला शिक्षा अधिकारी ने छात्रों को भरोसा नहीं दिलाया कि तुरंत तीन टीचर तैनात किए जाएंगे। जालौर में भी छात्रों ने टीचर की कमी को लेकर इसी तरह विरोध किया। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में एक रेजिडेंशियल स्कूल के छात्रों ने मेस के खाने की क्वालिटी को लेकर विरोध किया। उनका आरोप था कि दाल और सब्ज़ी में बार-बार कीड़े मिल रहे थे। वहीं, महाराष्ट्र में छात्रों ने टॉयलेट, पानी की सप्लाई और टीचर के स्कूल न आने को लेकर विरोध किया। कई छात्रों ने बोर्ड परीक्षा से पहले टीचर की मांग की। अलग-अलग राज्य, लेकिन बुनियादी सुविधाओं के लिए एक जैसा संघर्ष। जेन अल्फा अपने शिक्षण संस्थानों को जवाब देने के लिए मजबूर करने के वास्ते एकजुटता का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे शिकायत करने के पारंपरिक तरीके से आगे बढ़कर अपनी समस्याओं को सड़कों पर ला रहे हैं।

डेफ एंड म्यूट के छात्रों ने किया प्रदर्शन

जयपुर के सरकारी सेठ आनंदी लाल पोदार हायर सेकेंडरी स्कूल फॉर डेफ एंड म्यूट के छात्रों ने स्कूल की बदहाल हालत के खिलाफ प्रदर्शन किया। बच्चों की शिकायतें सिर्फ एक दो नहीं थी। स्कूल के टॉयलेट खराब थे। पीने के पानी में दिक्कत थी। की बिल्डिंग की हालत जजर थी और कई दूसरी बुनियादी सुविधाएं भी ठीक नहीं थी। स्टूडेंट्स ने साइन लैंग्वेज के जरिए अपनी बात रखी और सोशल मीडिया में इस प्रोटेस्ट से जुड़े कई वीडियो भी वायरल हुए। स्कूल में 12वीं तक के छात्र पढ़ते हैं। यहां 17 क्लासरूम्स हैं। 592 छात्र हैं और शिक्षकों के 76 पद मंजूर हैं। लेकिन बच्चों की शिकायत थी कि स्कूल की हालत लगातार खराब होती जा रही है। टॉयलेट इतने खराब थे कि उनका इस्तेमाल करना भी मुश्किल हो गया था। पीने के पानी की व्यवस्था भी ठीक नहीं थी। स्कूल की दीवारों और क्लासरूम में दरारें थी जिससे बच्चों की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े हो रहे थे। स्कूल बस भी खराब हालत में थी। सफाई के नाम पर जगह-जगह कचरा पड़ा था। मामला सामने आने के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के प्रतिनिधि स्कूल पहुंचे। 

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हमीरपुर, उन्नाव के बाद अब बस्ती में रोका एलएलए का काफिला

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में 28 जुलाई को करीब 1500 स्टूडेंट्स स्कूल से बाहर निकल आए। किशनपुर के सर्वोदय इंटर कॉलेज में छठी से 12वीं तक के छात्रों ने 5 से 6 घंटे तक धरना दिया। उनकी शिकायत थी कि क्लासरूम में बिजली और पंखे नहीं है। कहीं पंखों से करंट लगने की शिकायत है। डेस्क बेंच कम है। टॉयलेट गंदे हैं। पीने का पानी सुरक्षित नहीं है। मिड डे मील तय मेन्यू के हिसाब से नहीं मिलता और स्कूल में लाइब्रेरी, कंप्यूटर लैब और खेल की सुविधाएं भी नहीं है। प्रिंसिपल ने बाद में ज्यादातर मांगे मानने की बात कही। यूपी के ही पीलीभीत के जवाहर नवोदय विद्यालय में भी 10वीं और 11वीं और साथ ही साथ 12वीं के छात्रों ने प्रदर्शन किया। हमीरपुर, उन्नाव के बाद अब बस्ती में MLA का काफिला स्कूली बच्चों ने रोक लिया. बच्चों ने विधायक से जर्जर सड़क बनवाने की मांग की। इस पर विधायक ने अफसरों से बात कर जल्द ही सड़क बनवाने का आश्वासन देकर शांत कराया है।

जेन ज़ी से सीख रही है  जेन अल्फा 

हाल के इन विरोध-प्रदर्शनों में हिस्सा लेने वाले अधिकांश बच्चे इतने छोटे हैं कि उन्हें अभी वोट देने का अधिकार भी नहीं है। उनके पास कोई औपचारिक राजनीतिक ताकत नहीं है। वे किसी चुनाव के जरिए सरकार नहीं बदल सकते और ज्यादातर मामलों में, जिन संस्थानों के खिलाफ वे खड़े हैं, उन पर भी उनका प्रभाव बेहद सीमित है। इसके बावजूद, उन्होंने प्रभाव डालने का एक नया जरिया विजिबिलिटी का ढूंढ निकाला है और इसे असरदार बनाने के लिए सोशल मीडिया उनका सबसे मजबूत हथियार बनकर उभरा है। सड़क पर तख्तियां थामे मार्च करते या किसी सरकारी दफ्तर के बाहर धरने पर बैठे स्कूली बच्चों के समूह को नजरअंदाज करना प्रशासन के लिए बेहद मुश्किल हो जाता है, खासकर तब जब इन प्रदर्शनों के वीडियो इंटरनेट पर तेजी से वायरल होने लगते हैं। ये बच्चे जेन ज़ी को बिल्कुल इसी तौर-तरीके और भाषा का इस्तेमाल करते हुए देखकर बड़े हो रहे हैं, और ऐसा लगता है कि जेन अल्फा ने यह सबक वक्त से पहले ही सीख लिया है। सड़क की मांग को लेकर कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन कर रहे बच्चों का वीडियो री-शेयर करते हुए सीजेपी (CJP) प्रदर्शन के नेताओं में से एक, सौरव दास ने लिखा शाबाश जेन अल्फा! हमें यही करने की जरूरत है अपने भविष्य की जिम्मेदारी खुद संभालना।

जेन अल्फा की मांगें क्यों अहम हैं

उनकी मांगों से कुछ खास बातें भी पता चलती हैं। पहले की पीढ़ियों के छात्र अक्सर खराब इंफ्रास्ट्रक्चर, टीचरों की कमी, सुविधाओं की कमी और अनियमित सेवाओं को रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा मानकर स्वीकार कर लेते थे। आज विरोध करने वाले बच्चे क्लासरूम में पंखे न होने, टीचर न होने और स्कूल तक सड़क न होने जैसी चीज़ों को सामान्य मानने को तैयार नहीं हैं। वे ऐसे भारत में बड़े हो रहे हैं जहाँ फ़ोन पर ही यह जानकारी मिल जाती है कि दूसरी जगहों पर चीज़ें कैसे काम करती हैं। वे देख सकते हैं कि वे किन चीज़ों से वंचित रह रहे हैं, और इसीलिए, 'अल्फा' पीढ़ी में गुस्सा है। इन बच्चों के आस-पास मौजूद बड़े लोग ज़ाहिर तौर पर इनमें से कुछ विरोध-प्रदर्शनों को आकार देंगे। लेकिन इससे जेन अल्फा की शिकायतें कम वास्तविक नहीं हो जातीं।

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