डुगची की गैर राजनीतिक बातें (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Publish Date: May 10 2019 3:27PM
डुगची की गैर राजनीतिक बातें (व्यंग्य)
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उस दिन पहचान वाले के अनजान गांव में उनके किसी रिश्तेदार का स्कूटर ठीक करने अपना स्कूटर लेकर गया। सड़क टूटी, वापसी में अंधेरे में स्कूटर खडा़ करते पता नहीं चला और ढांक से नीचे गिर गया। निकालना मुश्किल रहा। फोन पर एमएलए हो चुके जनाब ने पहचाना नहीं।

चुनाव का मौसम आता है तो वह दिमाग में घुस जाता है। क्षेत्र का बढ़िया स्कूटर मकैनिक राजू या मोहन न होकर डुगची क्यूं है पता नहीं। इन दिनों डुगची बताता है कि वह भी वोट डालना पसन्द नहीं करता करोड़ों उदास ‘भारतीय’ व ‘अभारतीय’ मतदाताओं की तरह। वह मानता है उसके वोट डालने या न डालने से देश प्रदेश या इलाके का कुछ नहीं संवरे या बिगड़ेगा। पिछले चुनाव में सत्तर लोगों ने समझाया कि कभी एक वोट से हार या जीत इतिहास लिख देती है। इस बार वोट ज़रूर देना, मगर छोटे मोटे प्रलोभन भी डुगची का अटल इरादा नहीं बदल सके। वे प्रलोभन दूसरे घर चले गए। कई पार्टियों के जुझारू, ईमानदार, कर्मठ कार्यकर्ताओं ने उसकी वोट को नोट बनाने की कोशिश की मगर डुगची भी कम जुझारू, ईमानदार, कर्मठ नहीं। स्कूटी ठीक करवाने गया, इस बार भी सरकार सफल होने के बावजूद पुराना डुगची ही दिखा। रश नहीं था, तभी चाय का आग्रह स्वीकारा।  
भाजपा को जिताए

पूछा कहां के रहने वाले हो डुगची। जवाब भारतमनोजकुमार का था, भारत का हूं सर। मातापिता गांव में होंगे, जवाब बिना पेंच, पता नहीं कौन हैं हमारे मांबाप। नाम किसने रखा, पता नहीं सरजी उपरवाले का बच्चा हूं। मेरा नाम कईयों को अजीब लगा बोले बकवास है बदलो। दिल ने कहा गज़ब नाम है, किसी का नहीं होगा क्यूं बदलूं। कोई धर्म, जात, एरिया नहीं। कभी लगता हिन्दू हूं फिर लगता थोड़ा मुसलमान भी हूं, तभी सिख जैसा महसूस होता कुछ ईसाई सा लगता। पूछा एरिया से जो एमपी हैं इनके बारे क्या ख्याल है। सरजी तब से जानता हूं जब एमएलए भी नहीं थे। हम जैसे कितनों ने रातदिन एक करके जिताया मगर एमएलए होकर ज़रा सा काम नहीं करवाए। 
उस दिन पहचान वाले के अनजान गांव में उनके किसी रिश्तेदार का स्कूटर ठीक करने अपना स्कूटर लेकर गया। सड़क टूटी, वापसी में अंधेरे में स्कूटर खडा़ करते पता नहीं चला और ढांक से नीचे गिर गया। निकालना मुश्किल रहा। फोन पर एमएलए हो चुके जनाब ने पहचाना नहीं। समझाया जब आप एमएलए नहीं थे दुकान के पास छोटे मकान में थे, हमने काम छोड़  प्रचार किया। अपने ग्राहकों को भी कहा। बोले, क्या चाहते हो। कहा स्कूटर के पास रात रूकना मुश्किल है। कोई चुरा न ले, पुलिसवाले की डयूटी लगवा दें। पहिए की तरह बात को घुमाया बोले पुलिस इसलिए नहीं होती। मुझे रात भर वहीं रहना पड़ा सुबह अनजान ट्रक ड्राइवर ने मदद की। यही ‘महा पा.. जब आम आदमी थे एक दिन स्कूटर पर बिना हैल्मेट पकडे़ गए। जेब में फटा हुआ नोट न था। हमने पुलिस में पहचान निकाल बचाया। ऐसे ‘मैले लुच्चे आदमी' पर कीमती वोट तो क्या टायर का टुकड़ा भी वेस्ट न करूं। क्या डुगची ने 'एमएलए' को 'मैले... और 'एमपी' को 'महा...’ कहा। उसकी बातें नाम की तरह निराली हैं।


 
- संतोष उत्सुक

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