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साहित्य जगत

बाग़ से गायब होता बाग़ (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Publish Date: Jun 5 2018 10:47AM

बाग़ से गायब होता बाग़ (व्यंग्य)
Image Source: Google

सुबह की सैर स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभदायक मानी जाती है। सेवानिवृत होने के बाद मैंने पड़ोस में स्थित सवा सौ साल से भी पुराने बाग में नियमित सैर करना शुरू किया है। बेमौसमी बारिश से डरता हूं तभी छतरी लेकर ही बाग में जाता हूँ। हालांकि पहाड़ी क्षेत्र है मगर पेड़ काट देने के कारण गर्मी हर जगह खूब उगने लगी है। बाग में रोज़ाना आने के कारण यहां के सूखते, कबाड़ भरे तालाब, पेड़, पौधों, पक्षियों व रास्तों से मेरा परिचय गाढ़ा होने लगा है। आजकल बाग में ज्यादा फूल नहीं हैं, पौधे बिना पानी झाड़ीनुमा होकर बेहोश निढाल हैं हालांकि बाग़ के बीच में तालाब है। शहर का अपना बाग़ होते हुए वक़्त खराब होने के कारण फूल व पौधे उगाना मुश्किल हो गया है तभी तो बाहर से आने वाले विक्रेता फूल पौधे यहाँ महंगे दामों पर बेच रहे हैं।

सरकारी कर्मचारियों द्वारा न निकाली जा सकने वाली घास अब बुरी लगनी बंद हो गई है। क्यारियों के आसपास कितनी ही जगह पत्थर, कूड़ा व लकड़ी के टुकड़े पड़े हैं, झाड़ियां झुरमुट हो रही हैं, बाग़ के चारों ओर सुरक्षा दीवार बनाई गई है जिस के निकट रहने वाले, समझदार शहरी लोग अपने घरों का कूड़ा कचरा भी बाग़ के अन्दर गिराते देखे जा सकते हैं। ख़ूबसूरत बाग़ में सुन्दर प्राचीन शिवालय है जिसके आसपास भी लोग कूड़ा रख या फेंक कर दिल से भक्ति करते हैं। निकट ही चलाई जा रही कैंटीन से चिप्स वगैरा खरीदकर रैपर्ज़ पूरे सैर मार्ग के आस पास व क्यारियों में बोते हैं। बाग़ के एक हिस्से में बढ़िया कचरा इकट्ठा करना शुरू कर दिया है।
 
अन्दर की अनेक दीवारों पर देशव्यापी ‘स्वच्छ भारत स्वस्थ भारत’ के अंतर्गत दिए गए हरेभरे निर्देश मोटे मोटे अक्षरों में आकर्षक रंगों में ख़ूबसूरत लिखाई में लिखे गए हैं। इस लिखावट के सामने ही पुराने पेड़ की काटी शाखाएँ सजाई हुई हैं। और हां एक स्वयं सेवी संस्था के बड़े बड़े नष्ट न होने वाली फ्लेक्स बैनर व स्वागत पट मंदिर को व्यवसायिक रूप देने में लगे हैं। एक भक्त ने बताया कि हर बरस यहां धूमधाम से डीजे वाला बढ़िया प्रोग्राम होता है। मंदिरों में जगह कम है इसलिए अनेक सच्ची भक्त मंडलियाँ शुद्ध भक्ति के लिए यहां भांग के पकौड़े, घोटा इत्यादि का भोग बनवाती हैं और यहाँ उन्मुक्त पर्यावरण में युवाओं में भक्ति रस का संचार होता है।
 
यहाँ बच्चे और युवा क्रिकेट व फुटबाल खेलते हैं क्योंकि खेलने के मैदान में खेल कर मज़ा नहीं आता। अनेक पुरानी अनुपयोगी जर्जर इमारतें हरियाली को निगल रही हैं। बाग में एक तरफ पारंपरिक शैली में, बुज़ुर्गों के लिए वाशरूम रहित एक हाल, एक साल से बनाया जा रहा है। लेकिन एक तुच्छ बिल्डिंग के उद्घाटन के लिए कोई समझदार राजनीतिज्ञ नहीं मानेगा इसलिए बाग़ में ईंट रेट सीमेंट लोहे के सालों साल टिके रहने वाले विशाल पेड़ लगाए जा रहे हैं ताकि नए चुने गए पार्षदों व पुराने धाकड़ों के ख़ास ठेकेदारों को ईमानदारी से, बाग़ में आम जनता की सेवा के माध्यम से, शहर सेवा के रास्ते देश के विकासपथ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का स्वर्णिम अवसर मिले।
 
बाग़ के एक कोने में बने सदियों पुराने टायलेट से हमेशा नाक खराब कर देने वाली तीखी सड़ांध आती है इस बहाने लोग अपना रुमाल अच्छे से प्रयोग करते हैं। उन्हें नए रुमाल खरीदने की प्रेरणा मिलती है। कुछ महिलाओं ने बताया कि यहां लेडीज़ टायलेट नहीं है हालांकि घुमने वालों में बच्चे और महिलाएं बहुत हैं। दूसरी तरफ विरली किस्म के पीले बांसों को काट फेंककर, कमरे का निर्माण किया जा रहा है। बताते हैं पक्के बांस हवा में गिर गए और नए बांसों का पौधारोपण असंभव कार्य है। एक छोटे बंद कमरे के बाहर लिखे से पता चला कि वहां कभी कछुए रखे गए थे। ईमानदार ठेकेदार ने यहाँ बढ़िया अप्राकृतिक झरना बनाया है जो कई महीने से बंद है और पड़ोस में एक पुराना बंद फव्वारा भी है जो खंडहर बन रहा है। बाग़ में कई जगह पुरानी किश्तियाँ, लोहे के ढांचे, लकड़ी इत्यादि पड़ी है जिनको बेचना फालतू काम है तभी बाग़ का यह हिस्सा हर शाम को रोमांस का अड्डा बनता जा रहा है। स्पष्ट है अफसरों के पास बाग़ की देखभाल से ज़्यादा ज़रूरी दूसरे काम हैं। मेरे लिए बाग़ में जाकर बाग़ ढूंढना नया अनुभव रहा।
 
-संतोष उत्सुक  
 

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