हनुमान जी भी चिंतित हैं (व्यंग्य)

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विजय कुमार । Dec 26 2018 12:50PM

बचपन में एक बार मैंने हनुमान जी की आंख में आंसू देखे थे। पूछने पर उन्होंने बताया था कि महंगाई लगातार बढ़ रही है; पर लोग प्रसाद के नाम पर सवा रुपये से आगे बढ़ने को तैयार नहीं हैं। इससे वे भूखे रह जाते हैं।

बात बड़ी अजीब सी है। तुलसी बाबा ने हनुमान जी को संकटमोचन बताया है, ‘‘संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमरै हनुमत बलबीरा।’’ लेकिन सबके संकट काटने वाले हनुमान जी इस समय खुद संकट में हैं। छात्र जीवन में मैं हर मंगल को प्रसाद चढ़ाने हनुमान मंदिर जाता था। परीक्षा के दिनों में श्रद्धा कुछ ज्यादा ही हो जाती थी। इसलिए उनके सामने हनुमान चालीस भी पढ़ता था; पर फिर इसका क्रम टूट गया।

बचपन में एक बार मैंने हनुमान जी की आंख में आंसू देखे थे। पूछने पर उन्होंने बताया था कि महंगाई लगातार बढ़ रही है; पर लोग प्रसाद के नाम पर सवा रुपये से आगे बढ़ने को तैयार नहीं हैं। इससे वे भूखे रह जाते हैं। तबसे मैं पांच रु. का प्रसाद चढ़ाता हूं। यद्यपि अब पांच रु. में भी कुछ नहीं आता; पर मेरी जेब की भी सीमा है।

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लेकिन कल जब मैं मंदिर गया, तो हनुमान जी की आंखें फिर गीली मिलीं। उस समय उनसे बात नहीं हो सकी। आज सुबह मैं फिर गया, तो वे फुरसत में थे। 

- बाबा, आप तो दूसरों के कष्ट हरने वाले हो; पर आज आपको दुखी देखकर मुझे रोना आ रहा है। क्या मैं इसका कारण जान सकता हूं ?

- कारण तो कुछ खास नहीं है बेटा; पर ये राजनेता जैसे मेरी परतें उधेड़ रहे हैं, वह सहा नहीं जा रहा। तुमने अखबार में पढ़ा ही होगा कि एक योगी राजनेता ने मुझे दलित, वंचित, शोषित और पीड़ित कहा था। इसके बाद एक नेता ने जाट तो एक ने राजपूत कह दिया। बात यहीं तक नहीं रुकी। एक नेता जी तो मुझे मुसलमान सिद्ध करने पर तुल गये।

- ये तो बड़ी चिन्ता की बात है बाबा।

- इसीलिए तो मैं दुखी हूं। अगर ये प्रतियोगिता नहीं रुकी, तो हो सकता है लोग मुझे किसान, व्यापारी, कर्मचारी और उद्योगपति बताने लगें। कोई कहेगा कि हनुमान तो राम जी के दरबार में कर्मचारी थे। कोई मुझे गदा लेकर खेत की रखवाली करने वाला किसान बताएगा। कोई कहेगा कि हनुमान की गदा बनाने की फैक्ट्री है और इसे बेचने के लिए वे इसका प्रदर्शन कर रहे हैं। हो सकता है लंगोट और खड़ाऊं के कारण कोई मुझे कपड़े या लकड़ी का व्यापारी कहने लगे।

- आपकी चिंता बिल्कुल ठीक है बाबा।

- बस इसी से मैं दुखी हूं। मैं किसी जाति, बिरादरी, वर्ग या राज्य का नहीं, पूरी दुनिया का शुभचिंतक हूं। यदि तुम जनता को ये समझा सको, तो मुझे इस कष्ट से छुटकारा मिले।

मुझे मंदिर से लौटते हनुमान चालीसा की वह पंक्ति ध्यान आ गयी, जिसमें तुलसी बाबा ने कहा है, ‘‘जो सत बार पाठ कर कोई, छूटहि बंदि महा सुख होई।’’ काश, नेतागण बेहूदे बयान देने से पहले एक ही बार हनुमान चालीसा ठीक से पढ़ लें, तो उनकी फजीहत नहीं होगी। जहां तक हनुमान जी की बात है, वे सबके हैं और इस संसार में कौन ऐसा है, जो उनका कुछ बिगाड़ सके ?

-विजय कुमार

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