ढपोर शंख (व्यंग्य)

By विजय कुमार | Publish Date: Apr 12 2019 1:17PM
ढपोर शंख (व्यंग्य)
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एक गांव में एक किसान रहता था। दिन भर खेत में परिश्रम और शाम को भगवान का भजन। कोई साधु-संत आ जाए, तो वह उसे भगवान का प्रतिनिधि समझकर घर पर ही ठहरा लेता था। संतोषी स्वभाव होने के कारण थोड़े में भी उसका गुजारा ठीक से हो रहा था।

कल शाम को मैं बरामदे में बैठा था कि शर्मा जी आ गये। हम भावी लोकसभा चुनाव पर चर्चा करने लगे। कांग्रेस ने कई ऐसी घोषणाएं की हैं, जिनका पूरा होना असंभव है। खासकर 72,000 रु. प्रतिवर्ष देने की घोषणा। पूर्वोत्तर में घुसपैठियों का खुला समर्थन और आतंकग्रस्त क्षेत्र में सैनिकों की रक्षा के लिए बने ‘अफस्पा’ कानून को हटाने की बात भी बहुत खतरनाक है। मैं इनका विरोध कर रहा था, जबकि शर्मा जी अपने कुतर्कों से इन्हें ठीक सिद्ध करने का प्रयास कर रहे थे।
तभी पड़ोसी गुप्ता जी का बेटा संजू आ गया और कहानी सुनाने की जिद करने लगा। मैंने उसे टालने की कोशिश की; पर उसने जिद पकड़ ली। मैंने देखा उसके हाथ में एक चाबी का छल्ला था, जिससे एक छोटा शंख जुड़ा था। इससे मुझे ‘ढपोर शंख’ की कहानी याद आ गयी और मैंने वही सुना दी।


 
एक गांव में एक किसान रहता था। दिन भर खेत में परिश्रम और शाम को भगवान का भजन। कोई साधु-संत आ जाए, तो वह उसे भगवान का प्रतिनिधि समझकर घर पर ही ठहरा लेता था। संतोषी स्वभाव होने के कारण थोड़े में भी उसका गुजारा ठीक से हो रहा था। एक बार एक साधु बाबा गांव में आये, तो किसान ने उन्हें कुछ दिन अपने घर ठहरने को कहा। वे मान गये। किसान ने उनकी अच्छी सेवा की। उन्होंने चलते समय एक चमत्कारी शंख देकर उसे कहा कि जब किसी चीज की जरूरत हो, तो इससे मांग लेना।
 
किसान लालची नहीं था। उसने शंख रख लिया। कई दिन बाद उसे मां की बीमारी के लिए अचानक पैसे की जरूरत पड़ गयी। उसने शंख निकाला, अच्छे से धोकर उसकी पूजा की और हजार रु. की जरूरत बतायी। अचानक एक थैली ऊपर से गिरी, जिसमें हजार रु. थे। किसान बहुत खुश हुआ। उसने मन में साधु बाबा को बहुत धन्यवाद दिया। इस प्रकार उसकी हर जरूरत पूरी होने लगी।
 
पर ऐसी बातें छिपी नहीं रहती। किसान की पत्नी ने एक दिन अपनी पड़ोसन को यह बता दिया। फिर क्या था, जंगल की आग की तरह बात सब तरफ फैल गयी। गांव में एक सेठ भी रहता था। बहुत ही लालची और स्वार्थी। उसने सोचा किसी तरह वह शंख हथिया ले; पर किसान ने वह शंख नहीं दिया। कुछ दिन बाद वह साधु बाबा फिर आ गयेे। अबकी बार सेठ ने उन्हें अपने घर ठहराकर बहुत सेवा की और वैसा ही एक शंख मांगा। साधु बाबा ने चलते समय उसे भी एक शंख पकड़ा दिया। 


सेठ की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने शंख की पूजा की और पांच हजार रु. मांगे। तुरंत आवाज आयी, ‘‘पांच से क्या होगा, दस मांगो।’’ सेठ ने कहा, ‘‘ठीक है महाराज, दस ही दे दीजिए।’’ शंख बोला, ‘‘दस नहीं, बीस मांगो।’’ सेठ खुशी से कांपते हुए बोला, ‘‘जैसी आपकी मरजी महाराज। बीस ही दे दो।’’ शंख ने फिर कहा, ‘‘बीस क्यों, चालीस मांगो।’’ अब सेठ का माथा ठनका, ‘‘महाराज आप बोल तो रहे हैं; पर देते कुछ नहीं।’’ इस पर शंख हंसा, ‘‘अहम् ढपोर शंख। वदामि, न ददामि। (मैं ढपोर शंख हूं। बोलता तो हूं; पर देता कुछ नहीं।) सेठ ने गुस्से में उसे धरती पर दे मारा। शंख के टुकड़े-टुकड़े हो गये।
कहानी सुनकर संजू खूब हंसा; पर शर्मा जी तमतमा गये, ‘‘वर्मा, तुम कहानी के बहाने कांग्रेस के घोषणापत्र पर टिप्पणी कर रहे हो, ये ठीक नहीं है।’’ इतना कहकर वे चलते बने। मैं समझ नहीं पाया कि ‘ढपोर शंख’ की कहानी से उनके दिल को चोट क्यों लगी ?
 
- विजय कुमार

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