मेरी दावेदारी भी लिख लें (व्यंग्य)

By विजय कुमार | Publish Date: Feb 21 2019 6:12PM
मेरी दावेदारी भी लिख लें (व्यंग्य)
Image Source: Google

अब आज की बात करें। लोकसभा के चुनाव सिर पर हैं। इसलिए हमारे शर्मा जी बहुत व्यस्त हैं। वे हर पार्टी के दफ्तर में जाकर विवाह की भेंट की तरह अपनी दावेदारी लिखा रहे हैं। कई जगह तो लोग उन्हें पहचानते भी नहीं हैं; फिर भी वे अपना आवेदन प्रस्तुत कर देते हैं।

किसी भी विवाह या जन्मदिन समारोह में जाएं, तो वहां कुछ राशि भेंट देना एक परम्परा है। कहीं इसे व्यवहार कहते हैं, तो कहीं शुभकामना या आशीर्वाद। मेजबान कुछ संकोच से ‘‘इसकी क्या जरूरत थी ?’’ कहकर उसे जेब में रख लेता है। कुछ जगह कुछ बुजुर्ग मेज-कुर्सी डालकर बैठे रहते हैं। वे मेहमान की भेंट रजिस्टर में लिख लेते हैं। एक जगह जब एक सज्जन पांच सौ रु. देने लगे, तो उनका बेटा बोला, ‘‘पापा, हम तो तीन लोग हैं। सौ रु. डाइट के हिसाब से तीन सौ ही तो हुए।’’ 
 
खैर, ये तो हंसी की बात हुई; पर किसी समय इस परम्परा का रूप दूसरा था। विवाह के समय गांव के लोग दूध, दही, सब्जी, घी आदि भेज देते थे। बिस्तर भी घरों से आ जाते थे। इससे वह शादी किसी के लिए बोझ नहीं बनती थी; पर अब सब जगह लिफाफे का चलन है।
 


 
अब आज की बात करें। लोकसभा के चुनाव सिर पर हैं। इसलिए हमारे शर्मा जी बहुत व्यस्त हैं। वे हर पार्टी के दफ्तर में जाकर विवाह की भेंट की तरह अपनी दावेदारी लिखा रहे हैं। कई जगह तो लोग उन्हें पहचानते भी नहीं हैं; फिर भी वे अपना आवेदन प्रस्तुत कर देते हैं। कुछ पत्रकारों से उनकी पक्की सैटिंग है। वे उनका नाम अखबार में छाप देते हैं। इस तरह बड़ी से लेकर छोटी तक, हर पार्टी में उनका नाम पहुंच गया है।
 
मुझे किसी काम से शर्मा जी से मिलना था। कई बार मैं उनके घर गया; पर वे नहीं मिले। रविवार को अचानक वे पकड़ में आ गये। पता लगा कि वर्षा और ठंड के बावजूद वे एक छोटी पार्टी के बड़े नेता जी से मिलने चले गये। भीगने से उन्हें बुखार हो गया। इसलिए अब घर रहना मजबूरी है।


 
कुछ देर में शर्मा मैडम अदरक और तुलसी की चाय ले आयीं। शर्मा जी ने चाय के साथ कुछ गोलियां लीं और फिर लेट गये। मौका ठीक समझ कर शर्मा मैडम ने उनकी शिकायत का पिटारा खोल दिया। 
 
-भाई साहब, आप ही इन्हें समझाइये। 15-20 पार्टियों के दफ्तर में जाकर लोकसभा चुनाव का आवेदन कर आये हैं। पुरानी पार्टियों को तो छोड़िये, जिस पार्टी का ठीक से गठन भी नहीं हुआ है, वहां भी हो आये हैं। दिन भर पार्टी दफ्तरों में धक्के खा रहे हैं। 


 
 
मैं शर्मा जी की ओर मुड़ा- शर्मा जी, आपको क्या हो गया है ? चुनाव लड़ना भले लोगों का काम नहीं है। 
 
-जी नहीं। भले लोग चुनाव नहीं लड़ते, इसीलिए बुरे लोग चुनाव जीतते हैं।
 
-पर नगर में वार्ड का चुनाव हो, तो वहां आप जैसे समाजसेवी के जीतने की कुछ संभावना भी है। लोकसभा का चुनाव तो बड़े-बड़े लोग लड़ते हैं। 
 
-ये तो मुझे भी पता है; पर लोकसभा की दावेदारी करूंगा, तो कल कम से कम वार्ड के लिए तो लोग मेरे नाम पर विचार करेंगे। बचपन में दस रु. मांगता था, तो पिताजी दो रु. देते थे। राइफल का लाइसेंस मांगें, तो सरकार बड़ी मुश्किल से रिवाल्वर देती है। बस इसीलिए मैं लोकसभा की दावेदारी कर रहा हूं। आज की मेहनत कल शहरी चुनाव के समय काम आएगी।
 
मेरी बुद्धि ने उनके आगे समर्पण कर दिया। कल उनका हालचाल पूछने फिर गया, तो वे नहीं मिले। मैं समझ गया कि वे अपनी दावेदारी लिखाने के अभियान पर हैं। भगवान उन्हें सद्बुद्धि दे।
 
-विजय कुमार

रहना है हर खबर से अपडेट तो तुरंत डाउनलोड करें प्रभासाक्षी एंड्रॉयड ऐप   



Disclaimer: The views expressed here are solely those of the author in his/her private capacity and do not necessarily reflect the opinions, beliefs and viewpoints of Prabhasakshi and do not in any way represent the views of Prabhasakshi.

Related Story

Related Video