यादों की तारीख में 2020, कोरोना महामारी और वैक्सीनेशन की तैयारी की बात बताता हूं

यादों की तारीख में 2020, कोरोना महामारी और वैक्सीनेशन की तैयारी की बात बताता हूं

पटाखों की आवाजे और आतिशबाजी की रौशनी से जगमग हुई थी दुनिया सारी। आखिर हो भी क्यों न 21वीं सदी अपने किशोरावस्था से निकलकर 20 बरस की जो हुई थी। लेकिन जश्न के शोर में एक खामोश चेतावनी जिसकी गूंज उस वक्त ठीक से लोगों को सुनाई ही नहीं दी।

नया साल आता है और गुजर जाता है। वक्त की रेत पर महज कुछ तारीखें रह जाती हैं। कुछ अपने साथ खुशनुमा मंजर समेटे होती है तो कुछ बेहद ही भयावह और गमगीन कर देने वाली तस्वीर तकदीर पर चस्पा हो जाती है। लेकिन बीते एक बरस को आसानी से भुला पाना बेहद ही मुश्किल है। सदियां बीत गई इंसान खुद को सम्राट मानकर अपना साम्राज्य बढ़ाता चला गया। लेकिन दुनिया ने ये दौर भी देखा जब सलाखों में इंसान और जानवर निडर, बेखौफ होकर सड़कों पर घूमते नजर आए। मशहूर शायर बशीर भद्र ने क्या खूब कहा था कभी 'कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए हिसाब का मर्ज है जरा फासले से मिला करो।' कोरोना ने इंसान को बदलाव पर इस कदर मजबूर किया कि मजबूरी का नाम ही कोरोना हो गया।  

परेशान ट्रंप, चिंतित टूडो, जूझते पुतिन, सोचते मोदी, इजरायल, जर्मनी, ईरान, चीन, इटली, स्पेन में जाती जान। दुनिया में फैला डर, सन्नाटें में शहर, अल्लाह का घर, भगवान का दर, न किसी का आना न किसी का जाना। बच्चों ने पार्क में जाना छोड़ दिया, स्कूलों ने क्लास लगाना छोड़ दिया। छोड़ दिया लोगों ने सिनेमा में जाना, पिकनिक मनाना। सभाएं, आंदोलन, धरना-प्रदर्शन टल गए। एक ही नारा सबसे बलवान 'बचो और बचाओ' सबको क्योंकि मेरा देश महान। कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया को चुनौती दी, एक-एक दिन में सैकड़ों जाने ली। सबसे मुश्किल होता है किसी अदृश्य दुश्मन से लड़ना। क्योंकि आपको मालूम नहीं होता कि उसकी शक्ति क्या है और उस पर कौन सा हथियार काम करेगा। 

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पटाखों की आवाजे और आतिशबाजी की रौशनी से जगमग हुई थी दुनिया सारी। आखिर हो भी क्यों न 21वीं सदी अपने किशोरावस्था से निकलकर 20 बरस की जो हुई थी। लेकिन जश्न के शोर में एक खामोश चेतावनी जिसकी गूंज उस वक्त ठीक से लोगों को सुनाई ही नहीं दी या फिर कहे कि इसके बारे में पता ही न चला। 2019 के आखिरी महीने में चीन ने पहली बार विश्व स्वास्थ्य संगठन को एक खतरनाक बीमारी के बारे में बताया। उसे इस बात का भली-भांति इल्म था कि वो वायरस कहां से निकला है। पर वो इस पर पर्दा डाले बैठा था। संक्रमण के शुरुआती मामले नवंबर-दिसंबर में आए थे। सी-फूड मार्केट के एक विक्रेता के हवाले से बताया गया कि दिसंबर के आखिर तक कई लोग बुखार से पीड़‍ित हो गए थे, लेकिन तब उन्‍हें इसके कारण के बारे में पता नहीं था।  30 दिसंबर को डॉक्टर ली वेनलियांग ने एक ऑनलाइन चैट ग्रुप में लिखा कि अस्पताल में सात लोग एक रहस्यमय बीमारी से पीड़ित हैं। लेकिन एक देश की नासमझी की सजा पूरी दुनिया को भुगतना पड़ा। चीन के वुहान शहर से निकले कोरोना वायरस की चपेट में दुनिया के कई देश आ चुके थे। 

चीन में कोरोना से पहली मौत का मामला 9 जनवरी को आया और 23 जनवरी को चीन में हुबेई प्रांत की राजधानी वुहान को लाॅकडाउन किया गया। लेकिन एक साल के भीतर ही 218 देशों के 17 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। 31 जनवरी को चीन से निकलकर यह वायरस ब्रिटेन पहुंचा और संक्रमण का पहला केस दर्ज किया गया। 

वायरस का नाम कोविड-19

11 फरवरी को तेजी के साथ लोगों को संक्रमित करते इस वायरस का नाम कोविड-19 रखा गया। 

इटली हुआ बेहाल

चीन से निकलकर अन्य देशों में पांव पसार रहे इस वायरस ने इटली को अपनी आगोश में इस कदर लिया कि इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि वहां के अखबारों के पन्ने देश में कोरोना से होने वाली मौतों के लिए शोक-संदेशों से पटे पड़े रहे। अखबारों में 10-10 पेज के शोक संदेश छपे। सुपर मुल्क कहे जाने वाले अमेरिका की तो इस वायरस ने ऐसी गत की कि आज भी कोरोना से होने वाली मौत के मामले में वो पहले पायदान पर काबिज है। वैसे तो 28 जनवरी को ही भारत में लगभग 450 लोगों को निगरानी में रखा गया था। उस वक्त सरकार का दावा था कि सबसे ज्यादा लोग केरल के हैं और चीन से लौटे थे। 30 जनवरी को भारत के केरल से कोरोना का पहला मामला सामने आया। फिर भारत समते दुनिया के अन्य देश भी धीरे-धीरे इसकी मार से बेहाल होने लगे। 11 मार्च 2020 को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस बीमारी को महामारी घोषित कर दिया। 

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जनता कर्फ्यू और लाॅकडाउन 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील पर 22 मार्च की सुबह सात बजे से रात नौ बजे तक देशभर में जनता कर्फ्यू लगाया गया। 25 मार्च को भारत में संपूर्ण लाॅकडाउन घोषित किया गया और यहां कि 130 करोड़ की आबादी घरों में कैद हो गई। 

एक तरफ दुनियाभर के डॉक्टर विश्व के सबसे बड़े दुश्मन के बारे में जानकारियां इकट्ठी कर रहे थे। दूसरी तरफ उसका शिकार बन रहे लोगों की तादाद बढ़ती जा रही थी। 60 के दशक में जब सोवियंत संघ ने अंतरिक्ष मिशन को सफलता पूर्वक अंजाम दिया उस वक्त अमेरिका शीत युद्ध को हारा हुआ महसूस कर रहा था। कोरोना के दौर में वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया भी रेस सरीखे हो गई। लगने लगा कि इसमें फर्स्ट आने वाले को विश्व शक्ति वाला तमगा हासिल हो जाएगा। अमेरिका के स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक प्रोग्राम की शुरुआत की। वैक्सीन के विकास और उत्पादन के लिए शुरू की गई पहल को ऑपरेशन रैप स्पीड नाम दिया गया। यही नहीं व्यापक वित्तीय मदद और इसके चारों ओर व्याप्त गोपनीयता की वजह से इसे नया मैनहट्टन प्रोजेक्ट भी कहा गया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पहले परमाणु बम बनाने की परियोजना का यही नाम था। आमतौर पर कोई भी टीका तैयार करने में 10 से 15 साल का वक़्त लगता है। लेकिन कोरोना की दहशत में 2020 में दुनित ने वैक्सीन की ऐसी दौड़ लगाई की सारे रिकॉर्ड ध्वस्त हो गए। अमेरिका ने फाइजर और माॅर्डना वैक्सीन को मंजूरी दी। 60 के दशक में आसमानी जंग में अपना लोहा मनवाने वाले रूस ने 11 अगस्त 2020 को स्पूतनिक-वी वैक्सीन को मंजूरी दी। इस वैक्सीन को  पहली रूसी सैटेलाइट स्पूतनिक का नाम दिया गया। जिसे 1957 में रूसी अंतरिक्ष एजेंसी ने लांच किया था।

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ब्रिटेन में दी जा रही कोरोना की वैक्सीन

8 दिसंबर 2020 से ब्रिटेन में कोरोना के टीकाकर का कार्यक्रम शुरू हो गया। ब्रिटेन सरकार ने इसे अपने इतिहास का सबसे बड़ा टीकाकरण कार्यक्रम घोषित किया है। ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा टीकाकरण में 80 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों, स्वास्थ्य सेवा कर्मचारियों और फ्रंटलाइन वर्कर्स को प्राथमिकता दिया जा रहा है। ब्रिटेन के उत्तरी आयरलैंड में 90 साल की महिला को कोरोना का पहला वैक्सीन दिया गया। 

कोरोना वैक्सीन और भारत

कोरोना महामारी के दौर में इससे पार पाने के लिए वैक्सीन की खोज में पूरी दुनिया लगी थी वहीं भारत में भी वैक्सीन की खोज का काम अंतिम चरण में है। पीएम मोदी ने नवंबर के आखिरी हफ्ते में देश की 3 प्रमुख लैब का दौरा किया और वहां वैक्सीन की खोज को लेकर जानकारी हासिल की। वहीं भारत में सीरम इंस्टीट्यूट की एस्ट्राजेनेका कोवशील्ड वैक्सीन अंतिम परीक्षण के दौर से गुजर रही है और इसके आपातकाल उपयोग के लिए भारत सरकार से अनुमति मांगी गई है। हैदराबाद स्थित कंपनी भारत बायोटेक भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के सहयोग से कोवैक्सीन नाम की वैक्सीन बना रही है जो अभी क्लिनिकल ट्रायल के तीसरे चरण में है। इसके अलावा कैडिलैक हेल्थकेयर की जायकोव-डी वैक्सीन का भी परीक्षण किया जा रहा है। 

खास बात ये है कि भारत में बन रही वैक्सीन का इंतजार केवल देशवासियों को ही नहीं बल्कि दुनिया के कई देश भी भारत के भरोसे पर हैं। वैक्सीन के मामले में भारत की बादशाहत कायम होने वाली है। दुनिया के 64 देशों के राजदूत वैक्सीन को लेकर भारत के दौरे पर भी आए। कोरोना वैक्सीन की तैयारियों और इसके वितरण पर खुद पीएम मोदी नजर बनाए हुए हैं।- अभिनय आकाश






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