फडणवीस, ठाकरे ब्रदर्स और शिंदे-पवार हरेक ने BMC चुनाव को बनाया अपनी नाक का सवाल, जानें एशिया के सबसे अमीर निकाय से जुड़ी 10 बड़ी बातें

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अभिनय आकाश । Jan 14 2026 1:09PM

बीएमसी की तिजोरी में करीब 50,000 करोड़ रुपये का फिक्स डिपॉजिट है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, पर्याप्त बजट होने से काम के लिए बजट मिलने में मुश्किल नहीं होती है, जिससे प्रतिनिधि क्षेत्र की अपेक्षाओं को पूरा कर सकते हैं।

कहने को तो 15 जनवरी को महाराष्ट्र के कुल 29 नगर निगमों के चुनाव के लिए वोट डाले जाएंगे। लेकिन उन 29 नगर निगम के चुनाव से ज्यादा चर्चा सिर्फ एक नगर निगम के चुनाव की है और वह है बीएमसी यानी कि बृह मुंबई नगर निगम या बृह मुंबई म्यनिसिपल कॉरपोरेशन। और हर बार की तरह इस बार भी बीएमसी का यह चुनाव लोकसभा या राज्य के विधानसभा चुनाव की तरह ही सुर्खियों में है। वह वजह चाहे करीब 20 साल बाद ठाकरे भाइयों के एक होने की हो या फिर महाराष्ट्र की राजनीति में बदले समीकरणों के बीच हो रहे पहले चुनाव की। इस पर सबकी नजर है और सबकी का मतलब सबकी शीर्ष पर बैठे नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं तक देश के बड़े-बड़े कारोबारियों से लेकर हर खास और आम तक क्योंकि वजह सिर्फ चुनाव नहीं बल्कि इस चुनाव में लगा वो दांव है जिसमें पैसा भी है, पावर भी है और महाराष्ट्र की सियासी शक्ति का संतुलन स्थापित करने की कोशिश भी जिसमें महाराष्ट्र की हर हर सियासी पार्टी अपना-अपना दांव खेल रही है। आज बात उस बीएमसी चुनाव की जिसे महाराष्ट्र की हर एक पार्टी ने अपनी नाक का सवाल बना लिया है।

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28 मनपाओं से ज्यादा है BMC का बजट

महाराष्ट्र में वैसे तो 29 महानगरपालिकाओं के चुनाव हो रहे हैं। लेकिन बीएमसी नतीजों पर सभी की निगाहें हैं। दरअसल, बीएमसी का सालाना बजट सालाना बजट 74,000 करोड़ रुपये से ज्यादा है, जो कि राज्य की 28 अन्य महानगरपालिकाओं के कुल बजट से भी ज्यादा है। बीएमसी के पास मेडिकल कॉलेज, झील और कई ऐसी व्यवस्थाएं हैं, जो कि देश में किसी भी महानगरपालिका के पास नहीं हैं। बीएमसी की तिजोरी में करीब 50,000 करोड़ रुपये का फिक्स डिपॉजिट है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, पर्याप्त बजट होने से काम के लिए बजट मिलने में मुश्किल नहीं होती है, जिससे प्रतिनिधि क्षेत्र की अपेक्षाओं को पूरा कर सकते हैं। गोवा जैसे राज्य तो ढाई साल तक अपना खर्च इस पैसे से चला सकते हैं। क्योंकि गोवा का भी बजट करीब 28,000 करोड़ का ही रहा है। यानी कि 74,000 करोड़ से भी ज्यादा का बजट जिसका हो उसे पाने की कोशिश कौन नहीं करेगा?

आर्थिक रूप से निर्भरता नही

बीएमसी की आर्थिक शक्ति के चलते कई बड़े प्रॉजेक्ट्स करने में बीएमसी को किसी प्रकार की आर्थिक मदद की जरूरत नहीं पड़ती है। जबकि अन्य महानगरपालिकाओं के सामने यह चुनौती है। बीएमसी में चुने गए नगरसेवकों को नए प्रॉजेक्ट्स कराने के लिए लंबी खींचतान और संघर्ष नहीं करना पड़ता है। कोस्टल रोड, सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट जैसे हजारों करोड़ रुपये के प्रॉजेक्ट्स भी बीएमसी आसानी से पूरे कर रही है। दरअसल, बीएमसी की कमाई का एक बड़ा हिस्सा डिवेलपमेंट प्लान यानी बिल्डरों के प्रीमियम से आ जाता है। फिर प्रॉपर्टी टैक्स, जीएसटी लागू होने से होने वाली टैक्स की भरपाई भी आय का बड़ा स्रोत है।

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बीएएमसी में जीत का मतलब

सिर्फ यह 74000 करोड़ के खर्च की ताकत या 84000 करोड़ के सरप्लस का ही हाथ में आना नहीं होता बल्कि एक ऐसी पावर भी आती है जिससे जीतने वाला मुंबई पर राज करता है और उसे यह ताकत देता है म्यनिसिपल कॉरपोरेशन एक्ट 1888 ये एक्ट कहता है कि देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में विकास से जुड़े जो भी काम होंगे उसकी इजाजत बीएएमसी ही देगा। यानी कि मुंबई में कोई नई इमारत बनानी हो, उसका नक्शा पास करवाना हो या फिर गली सड़क, नाली खरंजा बनवाना हो, सबके लिए बीएएमसी से परमिशन लेनी ही होगी।

पैसा पावर और सियासी रसूख

अगर लोकसभा के लिहाज से देखें तो लोकसभा की कुल छह सीटें अकेले बीएमसी के दायरे में आती हैं। अब विधानसभा में बढ़त बीजेपी की अगुवाई वाली महायुती की है तो उसके पास 36 में से 22 सीटें हैं। जबकि लोकसभा में बढ़त मिली थी महा विकास आघाड़ी को तो उसके पास लोकसभा की कुल चार सीटें हैं। यानी कि बीएमसी के पास पैसा भी है, पावर भी है और सियासी रसूख भी है। बीएमसी में जीत का मतलब इन तीन अहम चीजों को हासिल करना भी है। लिहाजा वो बात चाहे महाराष्ट्र की पार्टियों जैसे दोनों शिवसेना, दोनों एनसीपी और मनसे की हो या फिर दोनों राष्ट्रीय पार्टियों यानी कि बीजेपी और कांग्रेस की हर कोई हर हाल में बीएमसी में ज्यादा से ज्यादा सीटें चाहता है।

इन चेहरों ने खूब बटोरी सुर्खिंयां

दिनेश वाघमारे (राज्य चुनाव आयुक्त): चुनाव की घोषणा से लेकर आचार संहिता के उल्लंघन तक हर सवाल के जवाब के लिए लोग राज्य चुनाव आयुक्त दिनेश वाघमारे की तरफ नजरें हैं। इन चुनावों को करना राज्य चुनाव आयोग के लिए बड़ी चुनौती थी, क्योंकि महाराष्ट्र में दो बड़ी पार्टियों में बंटवारा हो चुका था और पार्टियों की संख्या बढ़ गई थी। मनपा, नगरपरिषद, नगरपंचायत, जिला परिषद समेत सभी चुनाव एक साथ कराने के लिए संसाधन जुटाना भी बड़ी चुनौती थी।

राहुल नार्वेकर, अध्यक्ष, विधानसभा: राहुल नार्वेकर के परिवार के 3 सदस्यों को बीजेपी ने टिकट दिया। बीजेपी पर 'अतिवाद' के भी आरोप लगे। टिकट मिलने की खुशी खत्म ही नहीं हुई थी कि नामांकन के आखिरी दिन कई इच्छुक द्वारा नामांकन में अड़चन पैदा करने और व्यवस्था को प्रभावित करने के कथित आरोप भी उन पर लगे। राज्य चुनाव आयोग को इस पर रिपोर्ट मांगनी पड़ी। नार्वेकर के भाई मकरंद की संपत्ति में करीब 2000% से ज्यादा की बढ़ोतरी पर भी जमकर सवाल उठे।

संजय राउत, (सांसद उद्धव सेना): बीएमसी चुनाव की सुगबुगाहट के बीच संजय राउत की बीमारी की खबर काफी चर्चा में रही। उन्होंने खुद ही सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूरी बना ली। उद्धव सेना के लिए यह किसी झटके से कम नहीं था। एक तरफ राज ठाकरे से गठबंधन की चर्चा और दूसरी तरफ मीडिया में उठ रहे सवाल, इनका जवाब देने के लिए पार्टी के पास कोई दमदार चेहरा नहीं था। हालांकि, चुनाव आते ही राउत सक्रिय हो गए और विविध मंचों से पार्टी के लिए प्रचार किया।

प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल: कांग्रेस द्वारा अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा के बावजूद वंचित बहुजन आघाडी के साथ कांग्रेस का गठबंधन कराने में हर्षवर्धन सपकाल की अहम भूमिका रही। लंबे समय से वंचित को साथ लाने के लिए कोशिश कर रही कई दिग्गज नेताओं से इतर लो प्रोफाइल सपकाल यह युति करा पाए। हालांकि, इस दौरान वर्षा गायकवाड की गैर-मौजूदगी और सीट बंटवारे में हुई गफलत से कांग्रेस द्वारा कई सीटों पर उम्मीदवार न देने से पार्टी की खूब किरकिरी भी हुई।

नवाब मलिक अध्यक्ष (एनसीपी): महायुति में अजित पवार द्वारा साथ चुनाव न लड़ने की वजह नवाब मलिक रहे हैं। बीजेपी ने मलिक के पास कमान रहते हुए गठबंधन न करने की घोषणा कर दी थी। जिसके बाद अजित की पार्टी अकेले ही 94 सीटों पर मैदान में उतर गई, जिसमें से 22 मुस्लिम प्रत्याशियों ने नामांकन भरा है। विपक्ष के मुस्लिम वोटों की उम्मीद को इससे बड़ा झटका लगा। मलिक के परिवार के भी तीन सदस्यों के टिकट पाने पर भी सवाल उठे।

सभी के सामने अपनी अपनी चुनौती

भारतीय जनता पार्टी

देशभर में विस्तार के मत्र पर चल रही बीजेपी ने बीएमसी चुनाव में पहली बार पार्टी का मेयर बनाने का सकल्प लिया है। पिछली बार महज दो सीटों से पिछड़ने वाली बीजेपी ने चुनाव की तैयारियों में कोर-कसर नहीं छोड़ी है। शिवसेना (शिंदे) के साथ युति कर पार्टी ने विधानसभा चुनावों की सफलता को दोहराने का पूरा रोडमैप बनाया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उप-मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की साझा मौजूदगी में चुनाव प्रचार अभियान शुरू कर पार्टी कार्यकर्ताओं को मिलकर ठाकरे बंधुओं के मुकाबले का संदेश दे रही है। मुबई बीजेपी अध्यक्ष अमित साटम और पूर्व अध्यक्ष आशीष शेलार की जमीनी सक्रियता के अलावा सभी विधायकों को काम दिया गया है। पार्टी की तरफ से शिवसेना को दी गई 90 सीटें ही एक्स फैक्टर मानी जा रही है, इनके नतीजे सीधे मेयर की कुर्सी का गणित बनाएंगे।

शिवसेना (उद्धव)

शिवसेना (उद्धव) के पास इस चुनाव में नतीजे देने के अलावा कोई ठोस पर्याय नहीं है। 2022 में महाराष्ट्र में हुई बगावत के चलते सरकार और पार्टी गवाने के बाद उद्धव ठाकरे के लिए यह सबसे बड़ी परीक्षा है। बीएमसी की स्थायी समिति पर लंबे समय तक पार्टी का कब्जा रहा। पार्टी में टूट के बाद कैडर में जोश भरने के लिए इस चुनाव में उद्धव खुद मैदान में मोर्चा संभाल रहे है। मनसे की स्थापना के बाद से पहली बार दोनों भाइयों (राज और उद्धव) ने युति करके मुकाबला करने का फैसला किया है। उद्धव ने पार्टी का आधार स्तंभ यानी शाखाओ का दौरा शुरू कर दिया है। बेटे आदित्य भी अपनी प्रगतिशील छवि के जरिए युवाओं को लुभाने की कोशिश कर रहे है। पार्टी को मराठी मतदाताओं के अलावा मुस्लिमों वोटर्स पर काफी भरोसा है। लोकसभा चुनाव में विपक्षी एकता के तहत मिली जीत का स्वाद पार्टी विधानसभा में दोहरा नहीं सकी थी। इसीलिए, केवल वोटो के गणित की संख्या से मेयर बनाने की मुश्किल चुनौती सामने कायम है।

कांग्रेस

कांग्रेस अपनी जन्मस्थली पर ही जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रही है। 2014 में मुबई से पार्टी के सफाए के बाद से ही यहा फिर से कांग्रेस वह मुकाम हासिल नहीं कर पाई है। किसी समय महानगर की 6 में से 5 लोकसभा सीटें पार्टी के पास थीं। इस बार पार्टी ने संगठन में जोश भरने के लिए अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया था, लेकिन अंत में वचित बहुजन आघाडी को 62 सीटें दे दी। हर बार की तरह उम्मीदवारों की लिस्ट भी देर से जारी की। काग्रेस को मुस्लिम और दलित वोटों के अलावा अन्य वोटों पर भरोसा है। काग्रेस 50 से ज्यादा सीटें जीतने का ख्वाब देख रही है, लेकिन मुस्लिम वोटों के लिए UBT के अलावा सपा, एनसीपी (अजित पवार) और एआईएमआईएम जैसी पार्टियां भी मैदान में है।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी

मुंबई में एनसीपी का वजूद पार्टी की 1999 में स्थापना के बाद से ही कभी मजबूत नहीं रहा है। बगावत के बाद स्थिति और बदल गई है। शरद पवार फिलहाल ठाकरे बंधुओं के साथ गठबंधन कर 11 सीटों पर मैदान में है, जबकि अजित पवार अकेले 94 सीटों पर उम्मीदवार उतार चुके है। इनमें बड़ी सख्या में मुस्लिम उम्मीदवार भी है। एनसीपी (AP) के चुनाव की पूरी कमान मलिक परिवार पर है और पार्टी इस बार सीटों की संख्या बढ़ाकर सत्ता बनाने की स्थिति में आना चाह रही है। ठाकरें बंधुओं के साथ गठबंधन के चलते पार्टी को चुनावों में अच्छे मुकाबले की उम्मीद बंधी हुझर है।

समाजवादी पार्टी

मुबई में उत्तर भारतीयों और मुस्लिमों के एक बड़े वर्ग की पसंदीदा रही समाजवार्टी पार्टी फिलहाल आतरिक खीचतान में उलझी हुई है। पार्टी हर हाल में पिछला चुनावी प्रदर्शन दोहराना चाह रही है। पार्टी के 2 विधायकों में से एक रईस शेख लंबे समय तक बीएमसी के मुद्दे पर पार्टी का प्रभावी चेहरा रहे है, लेकिन उनकी और प्रदेश अध्यक्ष विधायक अबू आसिम आजमी से अदावत अब जग-जाहिर हो चुकी है। इसका नुकसान भी पार्टी को उठाना पड़ सकता है। खींचतान के बीच सपा को स्थाई समिति में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए 7-8 सीटें जीतनी ही होगी।

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