2027 से पहले UP में कैसे हुआ बड़ा गेम, 18 फीसदी नाम कटने से राजनीतिक दलों में कोहराम

क्या-क्या और कहां-कहां क्या-क्या तब्दीलियां हुई हैं और स्कैनिंग में क्या-क्या सामने आया। यानी जिन नामों का कोई वजूद नहीं था, कोई अस्तित्व नहीं था जो या तो इस दुनिया में नहीं थे या इस पते पर नहीं रहते थे या एक से ज्यादा जगह वोटर बन बैठे थे उन्हें भी हटाया गया। उनकी भी साफ सफाई हुई है।
उत्तर प्रदेश में एसआईआर के बाद आई ड्राफ्ट वोटर लिस्ट ने सियासत में हलचल जरूर पैदा कर दी है। लेकिन सवाल यह है कि हलचल सच्चाई से है या सियासी बेचैनी से? चुनाव आयोग की प्रक्रिया के बाद उत्तर प्रदेश में करीब 2 करोड़ 89 लाख नाम हटाए गए। जिसमें 46 लाख से ज्यादा मृत मतदाता, 2 करोड़ 17 लाख शिफ्टेड लोग यानी स्थानांतरित लोग और 25 लाख से ज्यादा डुप्लीकेट वोटर शामिल। क्या-क्या और कहां-कहां क्या-क्या तब्दीलियां हुई हैं और स्कैनिंग में क्या-क्या सामने आया। यानी जिन नामों का कोई वजूद नहीं था, कोई अस्तित्व नहीं था जो या तो इस दुनिया में नहीं थे या इस पते पर नहीं रहते थे या एक से ज्यादा जगह वोटर बन बैठे थे उन्हें भी हटाया गया। उनकी भी साफ सफाई हुई है।
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यूपी में कितना बदला है यह आंकड़ा
एसआईआर से पहले जो वोटर थे वो 15 करोड़ 44 लाख थे। एसआईआर में जब नाम कटे तो 2 करोड़ 89 लाख लोगों के नाम आए। अब कुल वोटर 12 करोड़ 55 लाख हैं। वहीं बात करें मृतक वोटर की तो 46 लाख23000 मृतक वोटर का आंकड़ा है। बाहर शिफ्ट हुए लोगों की बात करें यानी स्थानांतरित लोगों की तो 2 करोड़ 17 लाख इनका आंकड़ा है। डुप्लीकेट वोटर पर निगाह डालें तो 25 लाख 47,000 डुप्लीकेट वोटर सामने आ गए हैं। अब आते हैं यूपी के उन 10 जिलों पर जहां सबसे ज्यादा वोट कटे हैं। बात करें लखनऊ की तो 30% वोट कटे लखनऊ। गाजियाबाद की बात करें तो 28% यहां पे भी वोट कटे। बलरामपुर में 26% का आंकड़ा वोट कटने का सामने आया। कानपुर शहर की बात करें 25% से ज्यादा यहां पर भी वोट कटे। मेरठ की बात करें तो करीब 25% और प्रयागराज में 24% से ज़्यादा वोट कटे। गौतम बुध नगर 23स से ज़्यादा वोट कटे। आगरा की बात करें 23% से ज्यादा। यहां भी वोट कटे। शाहजहांपुर में 21स से ज्यादा।
क्यों जरूरी था एसआईआर ?
विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूची को पूरी तरह शुद्ध बनाना है। समय के साथ बड़ी संख्या में मतदाता या तो मृत्यु के बाद भी सूची में बने रहते हैं या फिर स्थायी रूप से दूसरे स्थान पर चले जाते हैं। इसके अलावा एक ही व्यक्ति के नाम कई जगह दर्ज होने से चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं। यह अभियान इसलिए जरूरी था ताकि अपात्र नाम हटें और हर पात्र नागरिक का नाम वोटर लिस्ट में दर्ज हो सके।
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ड्राफ्ट लिस्ट में नाम कैसे देखें
बीएलओ के पास उपलब्ध ड्राफ्ट लिस्ट से या https://voters.eci.gov.in/download-eroll या https://ceouttarpradesh.nic.in/ पर जिला, विधानसभा का नाम सिलेक्ट करने पर बूथो की लिस्ट आ जाएगी। बूथ की सूची डाउनलोड कर नाम देख सकते है। अनकलेक्टेबल (अब्सेंट, शिफ्टेड, डिलीट, डुप्लीकेट) नाम कैसे देखें: https://ceouttarpradesh.nic.in/ASD_SIR2026. aspx पर क्लिक करे। जिला, विधानसभा चयन करने पर बूथ की लिस्ट आएगी। इसे डाउनलोड कर नाम कटने की वजह जान सकते है।
लिस्ट में नाम नहीं तो क्या करें?
नए वोटर है: फॉर्म-6 भरना होगा। आखिरी SIR में माता-पिता के विवरण के साथ घोषणा पत्र देना होगा। SIR में माता-पिता का नाम नहीं है तो आयोग की ओर से तय 13 डॉक्युमेट में कुछ जमा करने होंगे।
विदेश मे हैं: कही की नागरिकता नहीं है तो फॉर्म 6A भरना होगा। पासपोर्ट की फोटोकॉपी लगानी होगी।
नाम पर आपत्ति : लिस्ट में किसी नाम के जोड़ने या हटाने पर आपत्ति है तो फॉर्म 7 भरना होगा।
फॉर्म कहां जमा होंगे
BLO के पास, तहसील स्थित वोटर रजिस्ट्रेशन सेंटर पर https://voters.eci.gov.in/ या ECINET ऐप पर ऑनलाइन आवेदन सबमिट कर सकते है। पता बदल गया है, विवरण गलत है, नए वोटर कार्ड चाहिए या दिव्यांग के रूप में मैप करना चाहते है तो फॉर्म 8 भरना होगा।
बंगाल में विवाद
चुनाव से जुड़ी जरूरी प्रक्रिया होने के बावजूद एसआईआर को लेकर कई विवाद चलते रहे हैं। दुर्भाग्य से दूसरे चरण में जिन राज्यों में ड्राफ्ट रोल आ चुका है, वहां भी विवाद थमने का नाम नहीं ले रहे। खासकर बंगाल में सबसे ज्यादा असंतोष है। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अब SIR में इस्तेमाल होने वाले सॉफ्टवेयर पर सवाल उठाए हैं। उनकी पार्टी TMC उन वोटर्स की मैपिंग में भी गड़बड़ी बता रही है, जिनके नाम लिस्ट में नहीं है।
चुनाव आयोग ने डेटा जारी कर बताया है कि इन नामों को किन-किन वजहों से काटा गया। यह स्पष्टीकरण अच्छी बात है, लेकिन जिनके नाम नहीं हैं, उन्हें उनके मताधिकार को हासिल करने के लिए हरसंभव मदद की जानी चाहिए। इसमें राजनीतिक दलों की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे दावे-आपत्तियां दाखिल कराने, नाम चेक करने में आम लोगों की मदद करें। बिहार SIR से जुड़े मुद्दों पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों की निष्क्रियता पर हैरानी जताई थी और पूछा था कि पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं व जनता के बीच इतनी दूरी क्यों है। लगभग 21 साल पहले हुए SIR की यादें भी अब धुंधली है, क्योंकि तब इतना शोर नहीं मचा था। शायद इसकी वजह बदली राजनीतिक परिस्थितियां हैं। अब यह शोर चुनावी उत्सव पर भारी न पड़े, जनता का सिस्टम पर से भरोसा न कम हो - इसकी जिम्मेदारी चुनाव आयोग पर है।
पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित की?
निर्वाचन आयोग ने इस पूरी प्रक्रिया में राजनीतिक दलों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की। प्रदेशभर में 5.76 लाख से अधिक बूथ लेवल एजेंटों ने गणना और सत्यापन प्रक्रिया में हिस्सा लिया। इसके अलावा 1,546 से अधिक बैठकों के जरिए दलों को हर चरण की जानकारी दी गई। आयोग ने साफ किया है कि बिना निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के मतदाता सूची से कोई नाम नहीं हटाया जाएगा, ताकि निष्पक्षता बनी रहे। एसआईआर कोई नई कवायद नहीं है बल्कि मतदाता सूची की वो शुद्धिकरण प्रक्रिया है जो हर लोकतांत्रिक व्यवस्था की बैकबोन होती है। सबसे बड़ी बात यह अंतिम सूची नहीं है। यह ड्राफ्ट लिस्ट है। यह एक मसौदा सूची है जिसे अभी तैयार किया गया है। हर नागरिक को अधिकार 6 फरवरी तक दावा आपत्ति दर्ज करें।
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