Abraham Accords में शामिल हुआ Pakistan तो क्यों बदलना पड़ेगा Passport? आप भी जानिए जवाब

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अभिनय आकाश । May 27 2026 2:20PM

अमेरिका द्वारा इस बेहद जटिल पहेली को सुलझाने के लिए किए गए तमाम प्रयासों के बाद, यह अनिवार्य होना चाहिए कि ये सभी देश कम से कम एक साथ अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करें। जिन देशों की चर्चा हो रही है वे हैं सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (जो पहले से ही सदस्य है), कतर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन।

अब्राहम समझौता यह नया चर्चित शब्द बन गया है, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पाकिस्तान समेत कई मुस्लिम बहुल देशों से इस समझौते में शामिल होने का आग्रह किया था। फिलहाल, मुस्लिम देशों से अमेरिकी नेता के इस आग्रह का या तो मौन जवाब मिला है या फिर सीधा इनकार। लेकिन अगर पाकिस्तान इसमें शामिल हो जाता है (जो कि उसने अभी तक नहीं किया है), तो उसे अपना पासपोर्ट फिर से डिजाइन करना होगा। 

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ट्रम्प ने अब्राहम समझौते के बारे में क्या कहा?

25 मई को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पश्चिम एशिया और अन्य मुस्लिम बहुल देशों से ईरान के साथ विकसित हो रहे शांति समझौते के संदर्भ में इज़राइल के साथ सामान्य संबंध स्थापित करने का आह्वान किया। ट्रूथ सोशल पर एक पोस्ट में उन्होंने कहा कि उन्होंने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन के नेताओं से बात की है और उनसे अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करने का आग्रह किया है, जो 2020 में हुए ऐतिहासिक समझौतों का एक समूह है जिसने इजरायल और कई अरब देशों के बीच राजनयिक संबंधों को सामान्य बनाया। अमेरिका द्वारा इस बेहद जटिल पहेली को सुलझाने के लिए किए गए तमाम प्रयासों के बाद, यह अनिवार्य होना चाहिए कि ये सभी देश कम से कम एक साथ अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करें। जिन देशों की चर्चा हो रही है वे हैं सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (जो पहले से ही सदस्य है), कतर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि अधिकांश देशों को ईरान के साथ इस समझौते को पहले से कहीं अधिक ऐतिहासिक घटना बनाने के लिए तैयार, इच्छुक और सक्षम होना चाहिए, हालांकि कुछ देशों को हस्ताक्षर करने से छूट दी जा सकती है। विशेष रूप से ट्रंप ने कहा कि सऊदी अरब और कतर को तुरंत समझौतों पर हस्ताक्षर करने चाहिए और बाकी सभी को भी उनका अनुसरण करना चाहिए। 

देश के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना ने तो इज़राइल के निर्माण को अरब जगत के दिल में छुरा घोंपना तक कहा था। तब से यह नीति कायम है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने हाल ही में कहा हम फिलिस्तीन संघर्ष के दो-राज्य समाधान को स्वीकार किए जाने तक इज़राइल को मान्यता देने के लिए तैयार नहीं हैं। फिलिस्तीन मुद्दे पर हमारी घोषित नीति में कोई बदलाव नहीं आया है। यह सभी के लिए स्पष्ट होना चाहिए कि हमारी सात दशकों पुरानी नीति अपरिवर्तित है। इसके अलावा, अब्राहम समझौते देश में बेहद अलोकप्रिय बने हुए हैं। सितंबर 2020 में जब अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे, तब देश में विरोध प्रदर्शन भी हुए थे।

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ट्रम्प के 'अब्राहम अकॉर्ड्स' पर पाकिस्तान का कड़ा रुख

अमेरिका और ईरान के बीच जारी भीषण तनाव में मध्यस्थता की कोशिशों में जुटे पाकिस्तान ने डोनाल्ड ट्रम्प के 'अब्राहम अकॉर्ड्स' के प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है। ट्रम्प प्रशासन लगातार मुस्लिम बहुसंख्यक देशों पर इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने और इस समझौते में शामिल होने का दबाव बना रहा है, लेकिन पाकिस्तान ने इस पर बेहद सख्त रुख अपनाया है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इस्लामाबाद के इस समझौते में शामिल होने की किसी भी संभावना को साफ तौर पर नकार दिया है। एक स्थानीय टेलीविजन चैनल को दिए इंटरव्यू में ख्वाजा आसिफ ने दो टूक शब्दों में कहा कि व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि पाकिस्तान को ऐसे किसी भी समझौते का हिस्सा नहीं बनना चाहिए, जो हमारी मूल विचारधाराओं के खिलाफ जाता हो। फिलहाल हमारी तरफ से इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है, और न ही किसी ने हमसे इसके लिए संपर्क किया है। 

क्यों है पाकिस्तान का यह सख्त रुख?

पाकिस्तान की इस तीखी प्रतिक्रिया के पीछे उसकी दशकों पुरानी विदेश नीति है। पाकिस्तान, इजरायल को एक संप्रभु देश के रूप में मान्यता नहीं देता है और दोनों देशों के बीच कोई राजनयिक संबंध नहीं हैं। पाकिस्तान हमेशा से 1967 से पहले की सीमाओं के आधार पर एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य के गठन का पुरजोर समर्थन करता आया है, जिसकी राजधानी पूर्वी यरुशलम हो। देश के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने इजरायल के गठन को "अरब दुनिया के दिल में घोंपा गया खंजर" करार दिया था, और पाकिस्तान आज भी इसी रुख पर कायम है।

सात दशकों की नीति में कोई बदलाव नहीं

हाल ही में पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने भी देश के इस रुख को दोहराते हुए साफ किया कि जब तक फिलिस्तीन विवाद के समाधान के लिए 'टू-स्टेट सॉल्यूशन' को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर लिया जाता, तब तक पाकिस्तान इजरायल को मान्यता देने का सोच भी नहीं सकता। यह बात हर किसी को स्पष्ट होनी चाहिए कि हमारी सात दशक पुरानी नीति में कोई बदलाव नहीं आया है। राजनीतिक बयानों से इतर, अब्राहम अकॉर्ड्स को लेकर पाकिस्तान की जनता में भी भारी आक्रोश है। सितंबर 2020 में जब पहली बार इस समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे, तब पाकिस्तान की सड़कों पर इसके खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसक विरोध प्रदर्शन देखे गए थे। साफ है कि घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दोनों मोर्चों पर पाकिस्तान के लिए इस समझौते का हिस्सा बनना नामुमकिन नजर आता है।

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पाकिस्तान ने प्रस्ताव क्यों खारिज किया?

पाकिस्तान लगातार इस बात से इनकार करता रहा है कि वह इज़राइल को मान्यता देता है। उसका कहना है कि राजनयिक संबंध तभी स्थापित हो सकते हैं जब 1967 से पहले की सीमाओं पर आधारित एक स्वतंत्र फ़िलिस्तीनी राज्य का गठन हो जाए और पूर्वी यरुशलम उसकी राजधानी हो। 2020 में अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद से यह मुद्दा इस्लामाबाद के लिए और भी संवेदनशील हो गया है। जहां संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन जैसे करीबी खाड़ी सहयोगी इज़राइल के साथ सामान्यीकरण की ओर बढ़ रहे हैं, वहीं पाकिस्तान घरेलू राजनीतिक संवेदनशीलता और फ़िलिस्तीन के प्रति अपने दीर्घकालिक समर्थन के कारण इससे दूर रहा।  यह विरोध नया नहीं है। 2020 में, तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने इस समझौते को खारिज कर दिया था। पाकिस्तान को कई तरह के दबावों का भी सामना करना पड़ता है। देश वित्तीय सहायता, धन प्रेषण और सुरक्षा सहयोग के लिए खाड़ी देशों पर बहुत अधिक निर्भर है, जबकि घरेलू धार्मिक समूह इज़राइल को मान्यता देने का कड़ा विरोध करते हैं। 2025 की शुरुआत में पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने इस अटकल को खारिज कर दिया था कि इस्लामाबाद इस समझौते में शामिल हो सकता है। डार ने विदेश कार्यालय में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा फिलिस्तीन संघर्ष के दो-राज्य समाधान को स्वीकार किए जाने तक हम इजरायल को मान्यता देने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने आगे कहा कि समझौतों पर हस्ताक्षर करना पाकिस्तान की उस लंबे समय से चली आ रही मांग को छोड़ने के बराबर होगा जिसमें वह अल-कुद्स अल-शरीफ को राजधानी बनाकर एक फिलिस्तीनी राज्य की मांग कर रहा है।

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