जेल नंबर-3 में लटकाए जाएंगे निर्भया के गुनहगार, डेथ वारंट जारी होने के बाद अब क्या?

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अभिनय आकाश । Jan 9 2020 6:14PM

क्यूरेटिव याचिका तब दाखिल की जाती है, जब किसी दोषी की पुनर्विचार याचिका खारिज हो जाए। इसके लिए भी इनके पास 7 दिन का वक्त है। लेकिन याचिकाकर्ता को यह बताना होता है कि वह किस आधार पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती दे रहा है।

दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने निर्भया मामले के चारों दोषियों के लिए डेथ वारंट जारी कर दिए हैं। इस डेथ वारंट के मुताबिक पवन गुप्ता, अक्षय कुमार, विनय शर्मा और मुकेश को 22 जनवरी की सुबह सात बजे फांसी दी जाएगी। इन चारों ने 16 दिसंबर 2012 की रात को एक 23 साल की पैरामेडिकल स्टूडेंट जो अपने दोस्त के साथ बस में चढ़ी थी उसके साथ बलात्कार किया उसको जख्मी किया और इतनी बर्बरता की कि वो मर गई। इस बस में ड्राइवर के अलावा पांच और लोग थे। इन छह लोगों ने स्टूडेंट का गैंगरेप किया। बाद में दिल्ली पुलिस ने छह लोगों को पकड़ा। ये मामला कोर्ट में चला और 6 दोषी थे। एक नाबालिग था उसे सुधार गृह भेजा गया और बाद में वो रिहा हो गया। एक था राम सिंह जिसने आत्महत्या कर ली थी। उसके बाद बचे चार दोषी जिनकी फांसी पर फैसला आ गया है। 

डेथ वारंट होता क्या है और इसमें किन चीजों को लिखा जाता है

कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर-1973, यानी दंड प्रक्रिया संहिता- 1973 (CrPC) के तहत 56 फॉर्म्स होते हैं। इसी में एक फॉर्म होता है, फॉर्म नंबर- 42, इसी फॉर्म नंबर-42 को ही डेथ वारंट कहा जाता है। इसके ऊपर लिखा होता है- वारंट ऑफ एक्जेक्यूशन ऑफ अ सेंटेंस ऑफ डेथ। इसे ब्लैक वारंट भी कहा जाता है। ये जारी होने के बाद ही किसी व्यक्ति को फांसी दी जाती है। डेथ वारंट जारी होने के समय से फांसी के समय कम से कम दो हफ्ते का समय तय होता है। ये शत्रुधर चौहान मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से बदलाव आया। 

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क्या क्य़ा उपाय हो सकते हैं। डेथ वारंट को चुनौती दी जाए। कानूनी विकल्पों के बारे में सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अश्विनी कुमार दुबे बताते हैं कि दो अन्य विकल्प दोषियों के पास बचे हैं। 

क्यूरेटिव याचिका

क्यूरेटिव याचिका तब दाखिल की जाती है, जब किसी दोषी की पुनर्विचार याचिका खारिज हो जाए। इसके लिए भी इनके पास 7 दिन का वक्त है। लेकिन याचिकाकर्ता को यह बताना होता है कि वह किस आधार पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती दे रहा है। क्यूरेटिव पिटीशन दाखिल होने पर सुप्रीम कोर्ट अपनी सुविधा के हिसाब से उस पर सुनवाई की तारीख देगी। सुप्रीम कोर्ट चाहे तो अगले ही दिन इस पर सुनवाई कर सकता है या फिर आगे की कोई तारीख दे सकता है।

राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका

अगर दोषियों की पुनर्विचार याचिका भी खारिज हो जाती है, तो ये चारों राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दाखिल कर अपनी जान बख्शने की गुहार लगा सकते हैं। राष्ट्रपति के पास दया याचिका भेजने का जो तरीका है, वो ये है कि गुनहगार पहले दया याचिका पर खुद दस्तखत करेंगे। इसके बाद ये याचिका तिहाड़ जेल प्रशासन दिल्ली सरकार को भेजेगा। दिल्ली सरकार अपनी राय के साथ इसे गृह मंत्रालय को भेजेगी। गृह मंत्रालय अपनी राय के साथ इसे राष्ट्रपति भवन भेजेगा। दया याचिका पर राष्ट्रपति जो भी फैसला लें उनके दस्तखत के बाद ये ठीक उसी तरीके से वापस तिहाड़ जेल पहुंचेगा।इसके बाद यह फैसला पूरी तरह से राष्ट्रपति के ऊपर है कि वह इनकी फांसी की सजा को बरकरार रहने दें या फिर उसे उम्रकैद में तब्दील कर दें। राष्ट्रपति मंत्रिमंडल की सलाह पर इस बारे में फैसला लेते हैं। राष्ट्रपति के रिजेक्शन के बाद किसी के पास पावर नहीं होती है। राष्ट्रपति के रिजेक्शन के बाद सुप्रीम कोर्ट मामले को टच नहीं करेगा। यही संविधान की विशेषता है। 

मौका माहौल और देश के मूड को देखते हुए राष्ट्रपति से रहम की कोई गुंजाइश भी नजर नहीं आ रही। लिहाजा ये मान कर चलिए कि 22 जनवरी को निर्भया के चारों गुनहगार यानी मुकेश, पवन, अक्षय विनय के नाम ब्लैक वारंट जारी हो जाएगा। ब्लैक वारंट यानी मौत का वारंट। इस वारंट में ये भी लिखा है कि कैदी को फांसी पर तब तक लटकाया जाए, जब तक उसकी मौत न हो जाए। कोर्ट की ओर से जारी हुआ डेथ वारंट सीधा जेल प्रशासन के पास पहुंचता है। आरोपियों को फांसी होने के बाद कैदी की मौत से जुड़ा डेथ सर्टिफिकेट डॉक्टरों की ओर से दिया जाता है, उसके बाद इसे वापस कोर्ट में जमा किया जाता है। इसके अलावा डेथ वारंट भी वापस किया जाता है।  

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फांसी ये वो शब्द है जिसे सुनते ही गुनहगारों की रूह कांप जाती है। फांसी वो मंजिल है जहां हर गुनहगार के गुनाह का हिसाब होता है। आजाद भारत में अब तक 57 गुनहगार फांसी के फंदे पर झूल चुके हैं। आने वाले वक्त में कई गुनहगार इस फांसी के फंदे की कतार में है। लेकिन आपको पता है कि ये फांसी दी कैसे जाती है। फांसी से पहले जेल में क्या होता है। 

ब्लैक वारंट यानी मौत का पैगाम

फांसी की प्रक्रिया शुरू होती है ब्लैक वारंट से। भारत के राष्ट्रपति जैसे ही किसी की दया याचिका खारिज करते हैं। वैसे ही जेल प्रशासन कोर्ट से ब्लैक वारंट की मांग करते हैं। 

ब्लैक वारंट  

फांसी की तारीख 

फांसी की जगह

फांसी का समय 

लिखा होता है। जिसके बाद फांसी की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। फांसी में सबसे पहला काम होता है जल्लाद को ढूंढ़ना और फांसी का फंदा तैयार करवाना। फांसी का फंदा एक तरह की खास रस्सी मनीला रस्सी से तैयार होता है। पूरे भारत में बिहार की बक्सर जेल में ये रस्सी तैयार की जाती है। इस रस्सी से बना फंदा जब जेल पहुंच जाता है। तो सबसे पहला काम होता है फांसी का ट्रायल। इसके लिए फांसी पर चढ़ाए जाने वाले इंसान की लंबाई, वजन आर गर्दन का नाप लिया जाता है। फिर एक सैंड बैग रस्सी पर झुलाया जाता है। जिस जेल में फांसी का इंतजाम होता है वहां एक फांसी घर भी होती है। इसी में फांसी देने वाले कैदी को रखा जाता है। तिहाड़ जेल की बात करें तो 1945 में बननी शुरू हुई थी जो तेरह साल बाद 1958 में बनकर तैयार हुई। लेकिन फांसी घर का नक्शा अंग्रेजों के दौर में ही तैयार हो चुका था। तिहाड़ जेल में फांसी घर बनाया गया जिसे फांसी कोठी कहा जाता है। ये फांसी कोठी तिहाड़ जेल में गेट नं 3 में कैदियों के बैरक से कुछ दूर जगह बनी है जहां कैदियों को अकेले रखा जाता है। 24 घंटे में महज आधे घंटे के लिए उन्हें बाहर निकाला जाता है। इस डेथ सेल की निगरानी तमिलनाडु की स्पेशल पुलिस करती है। जिनका काम इस डेथ सेल में रह रहे कैदियों पर नजर रखना होता है। इस डेथ सेल में कैदियों को पैजामे में नाड़ा भी पहनने नहीं दिया जाता है कि वो कहीं इससे खुदकुशी न कर लें। 

तिहाड़ जेल में 31 जनवरी 1982 को रंगा-बिल्ला को इकट्ठे फांसी दी गई थी। वहीं पुणे की यडरवदा जेल में 27 नवंबर 1983 को जोशी अभ्यंकर मर्डर केस में चार दोषियों को भी एकट्ठे फांसी दी जा चुकी है। 

फांसी के दिन कैदी को सुबह चार बजे उठा दिया जाता है। फिर उसे नहाने और नए कपड़े पहनने को कहा जाता है। फिर कैदी को सिर्फ चाय के लिए पूछा जाता है। फांसी का वक्त करीब आने पर कैदी को बाहर निकाला जाता है। उस वक्त कैदी के आसपास बारह गार्ड होते हैं। कैदी का चेहरा ढंका होता है, ताकि वो अपने आसपास चल रहे फांसी की प्रक्रिया को न देख सके। 

जेल मैन्युअल के मुताबिक वहां मौजूद लोगों में एक डॉक्टर, डिविजनल मजिस्ट्रेट (जिनकी निगरानी में सारी फांसी की प्रक्रिया पूरी की जाती है), जेलर और डिप्टी सुपरिटेंडेट जेलर के अलावा 10 कॉन्स्टेबल और दो हेड कॉन्स्टेबल भी मौजूद होते हैं। 

जल्लाद कैदी के हाथ पैर बांधता है और उसके मुंह पर काला कपड़ा पहनाता है। फिर तय समय पर जेलर रूमाल नीचे गिराता है। जिसके बाद जल्लाद लिवर खींच देता है और कैदी फांसी के तख्ते पर झूल जाता है। इसके आधे घंटे बाद डॉक्टर के कैदी की नब्ज चेक करने के बाद लाश को नीचे उतार लिया जाता है।  

एक फैसले पर न्याय के आसरे सजा-ए-मौत को लेकर या उस आवाज को सुनने को लेकर तालियां अदालत में जरूर बजीं। लेकिन जिस वक्त ये हादसा हुआ था और जिस वक्त आज हम खड़े हैं इस दौरान हर रोज करीब 90 रेप के मामले दर्ज होते हैं। तो आइए इस सच को भी टटोल लेते हैं। लाखों चीखें और उस पर इस देश के भीतर सन्नाटा है। 

सजा ए मौत फैसला यही आया साल साल बाद। पवन, विनय, अक्षय और मुकेश को सजा ए मौत के फैसले पर मुहर लगाते हुए कहा कि पटियाला हाउस कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सतीश कुमार अरोड़ा ने अपने आदेश में कहा कि दोषियों को कानून के तहत उपलब्ध सभी उपायों का इस्तेमाल करने का मौका दिया गया। अब डेथ वारंट जारी करने में देरी करने जैसा कुछ नहीं है।

जिसके बाद देश तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। ये तालियां न्याय मिलने की थीं। ये तालियां रेप के खिलाफ गुस्से की थी। ये तालियां भरोसे की थीं। ये तालियां रेप के खिलाफ संघर्ष करते लोगों को उम्मीद मिलने की भी थीं। 

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बरस दर बरस रेप की घटनाओं में इजाफा होता गया और दोषियों की रिहाई भी बढ़ती गई। यानी थाने में बलात्कार की घटनाएं दर्ज होती रही और अदालतों से आरोपी छूटते रहे। आलम यह है कि 2013 में 1 हजार 636 रेप हुए और सजा सिर्फ 35 फीसदी को हुई। 2014 में 2 हजार 166 रेप हुए औऱ सजा 34 फीसदी को हुई। 2015 में रेप की घटनाएं और बढ़ी और 2 हजार 199 में सजा 29 फीसदी को हुई। यानी दिल्ली में ही कन्विकशन रेट घटता चला गया लेकिन त्रासदी इतनी भर नहीं कि रेप विक्टम को न्याय नहीं मिल रहा है। मुश्किल तो ये है कि देश में हर 16 मिनट में एक रेप का केस दर्ज होता है। हर घंटे 4 रेप और हर दिन 90 रेप की घटनाएं होती हैं। निर्भया कांड के बीते सात बरस का सच यही है कि औसतन हर वर्ष देश में 33 हजार बलात्कार के मामले थाने में दर्ज हो रहे हैं। रेप की घटना पर न्याय को लेकर समाज कितना संवेदनशील है ये इससे भी समझा जा सकता है कि इससे पहले 15 साल पहले 2004 में धनंजय चटर्जी को रेप और हत्या पर सजा ए मौत दी गई थी। 15 साल बाद निर्भया मामले में सजा ए मौत का फैसला आया है। कह सकते हैं कि हमने एक उपल्बधि पाई है। धनंजय चटर्जी 2004 में जब फांसी दी गई तो 14 साल बीत गए थे फांसी के मामले को निपटाते-निपटाते। इस दौर में सात सालों में ये मामला निपट गया। 

भारत में सजा-ए-मौत विरले से विरले मामलों में ही दिए जाने का प्रावधान है। वर्ष 2014 की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पिछले 10 वर्षों के दौरान 1300 से ज्यादा अपराधियों को फांसी की सजा सुनाई गई उनमें से केवल पांच लोगों को ही फांसी के फंदे पर लटकाया गया। सजा पाने और फांसी पर लटकाए जाने वाले लोगों की संख्या में एक बहुत बड़ा अंतर है।


22 वर्षों में केवल इन्हें मिली फांसी

पिछले 22 वर्षों के दौरान सिर्फ पांच लोगों को फांसी के फंदे पर लटकाया गया। जिसमें 1999 में ऑटो शंकर, 2004 में धनंजय चटर्जी, 2012 में अजमल कसाब और 2013 में अफजल गुरु और 2015 में याकूब मेमन को फांसी पर लटकाया गया। एक अनुमान के अनुसार भारत में हर साल तकरीबन सवा सौ लोगों को फांसी की सजा मिलती है, मगर वो अमल में नहीं लाई जाती। जिसकी वजह है इस सजा की लंबी प्रक्रिया और उसके बाद के विकल्प।

भारत में सजा-ए-मौत का इतिहास इस बात का गवाह है। सर्वोच्च अदालत से मौत की सजा पाने वाले अपराधी भी फांसी के फंदे तक नहीं जा पाते। जिसकी वजह है कानून में दोषियों को मिलने वाले विकल्प और मानव अधिकार संरक्षण संबंधी प्रावधान। बहरहाल, अब देखना दिलचस्प होगा कि सजा-ए-मौत पाने के बाद निर्भया मामले के चारों दोषी अब किस विकल्प का इस्तेमाल करेंगे।

- अभिनय आकाश

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