Prabhasakshi NewsRoom: Niger में 8 महीने से आतंकवादियों की कैद में फँसे रहे झारखंड के 5 मजदूर रिहा कराये गये

अपहृत मजदूर झारखंड के निवासी थे, जो रोजी रोटी की तलाश में विदेश गए थे। एक मजदूर को शुरुआती दौर में ही छोड़ दिया गया था, लेकिन शेष पांच भारतीय नागरिक लगभग आठ महीने तक आतंकियों के कब्जे में रहे। इस दौरान उनके परिवारों पर गहरा मानसिक और आर्थिक संकट रहा।
पश्चिम अफ्रीका के नाइजर में आठ महीने पहले हथियारबंद आतंकवादियों द्वारा अगवा किए गए झारखंड के पांच भारतीय मजदूरों को आखिरकार सुरक्षित रिहा कर लिया गया है। हम आपको याद दिला दें कि यह अपहरण अप्रैल 2025 में नाइजर के तिल्लाबेरी क्षेत्र में हुआ था, जहां एक भारतीय कंपनी की बिजली परियोजना पर काम कर रहे भारतीय और स्थानीय मजदूरों पर सशस्त्र हमला हुआ था। इस हमले में कई स्थानीय सुरक्षाकर्मियों की जान गई थी और भारतीय मजदूरों को बंधक बना लिया गया था।
अपहृत मजदूर झारखंड के निवासी थे, जो रोजी रोटी की तलाश में विदेश गए थे। एक मजदूर को शुरुआती दौर में ही छोड़ दिया गया था, लेकिन शेष पांच भारतीय नागरिक लगभग आठ महीने तक आतंकियों के कब्जे में रहे। इस दौरान उनके परिवारों पर गहरा मानसिक और आर्थिक संकट रहा। हम आपको बता दें कि मजदूरों की सुरक्षित रिहाई के लिए भारत सरकार ने कूटनीतिक स्तर पर लगातार प्रयास किए। विदेश मंत्रालय, नाइजर स्थित भारतीय दूतावास, संबंधित राज्य सरकार और नियोक्ता कंपनी के बीच लगातार समन्वय बना रहा। झारखंड सरकार ने भी राज्य स्तर पर परिवारों को सामाजिक सहायता, राशन, स्वास्थ्य और अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने की व्यवस्था की। आखिरकार सतत संवाद, दबाव और समन्वित प्रयासों के चलते इन पांचों मजदूरों की सुरक्षित रिहाई संभव हो सकी। अब उन्हें स्वदेश लाने की प्रक्रिया चल रही है।
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देखा जाये तो यह घटना केवल विदेश में फंसे कुछ मजदूरों की कहानी नहीं है, बल्कि यह वैश्विक आतंकवाद, अस्थिर क्षेत्रों में काम कर रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और भारत की विदेश नीति की एक गंभीर परीक्षा भी है। आठ महीने तक आतंकियों की कैद में रहना किसी भी इंसान के लिए नरक से कम नहीं होता। यह घटना बताती है कि जोखिम भरे क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिक आज भी सबसे कमजोर कड़ी बने हुए हैं।
यह घटना चेतावनी है कि विदेशों में कार्यरत श्रमिकों के लिए एक सख्त और बाध्यकारी सुरक्षा नीति बनाई जाए। कंपनियों की जवाबदेही तय हो, जोखिम वाले क्षेत्रों की स्पष्ट सूची बने और वहां भेजे जाने वाले श्रमिकों के लिए विशेष सुरक्षा प्रोटोकॉल लागू हों। यह भी जरूरी है कि विदेश मंत्रालय के साथ खुफिया एजेंसियों और रक्षा प्रतिष्ठानों का तालमेल और मजबूत हो, ताकि संकट आने से पहले ही खतरे को भांपा जा सके। अफ्रीका और अन्य अस्थिर क्षेत्रों में भारत की बढ़ती मौजूदगी तभी टिकाऊ हो सकती है जब उसके नागरिक और श्रमिक सुरक्षित हों। बहरहाल, मजदूर घर लौट रहे हैं, यह खुशी की बात है। लेकिन अगर इस घटना से सबक नहीं लिया गया, तो कल कोई और परिवार इसी पीड़ा से गुजरेगा।
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