Supreme Court में केंद्र ने बताया, पूर्व पुलिस अधिकारी को मिलेगा Gallantry Medal

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केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय को सूचित किया कि वर्ष 2003 के अभियान में दो डकैतों को मार गिराने वाले मध्य प्रदेश के पूर्व पुलिस अधिकारी विवेक सिंह चौहान को ‘वीरता के लिए राष्ट्रपति पदक’ देने की आधिकारिक मंजूरी मिल गई है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया कि गृह मंत्रालय के प्रस्ताव पर राष्ट्रपति की सहमति मिल चुकी है और इसे जल्द ही भारत के राजपत्र में अधिसूचित किया जाएगा। इस निर्णय के बाद मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में लंबित अवमानना कार्यवाही को भी वापस ले लिया जाएगा।

केंद्र ने शुक्रवार को उच्चतम न्यायालय को बताया कि 2003 में एक अभियान के दौरान दो डकैतों को मार गिराने वाले पूर्व पुलिस अधिकारी विवेक सिंह चौहान को ‘वीरता के लिए राष्ट्रपति पदक’ दिए जाने की मंजूरी दे दी गई है। शीर्ष अदालत ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के उस निर्देश का पालन नहीं किए जाने पर जुलाई में केंद्र के प्रति नाराजगी जताई थी जिसमें पूर्व पुलिस अधिकारी चौहान को यह पदक देने को कहा गया था। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ को बताया कि इस संबंध में फैसला ले लिया गया है और राष्ट्रपति ने चौहान को ‘वीरता के लिए राष्ट्रपति पदक’ दिए जाने को मंजूरी दे दी है।

केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन की ओर से दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही पीठ ने कहा, ‘‘सॉलिसिटर जनरल ने अदालत के समक्ष गृह मंत्रालय द्वारा 20 अगस्त 2026 को जारी एक पत्र रखा है, जिसके अनुसार ‘वीरता के लिए राष्ट्रपति पदक’ दिए जाने को मंजूरी दे दी गई है और इसे भारत के राजपत्र में उचित समय पर अधिसूचित किया जाएगा।’’ मेहता ने पत्र के संबंधित हिस्से को पढ़ते हुए कहा कि मंत्रालय ने दिशानिर्देशों के अनुसार प्रस्ताव पर विचार किया, जिसके बाद राष्ट्रपति ने 24 जून 2003 की कार्रवाई के लिए चौहान को ‘वीरता के लिए राष्ट्रपति पदक’ देने की मंजूरी दी और जल्द ही इसे भारत के राजपत्र में अधिसूचित किया जाएगा। पीठ ने शुक्रवार को कहा कि इस घटनाक्रम के मद्देनजर याचिका पर अब आगे विचार करने की जरूरत नहीं है। चौहान की ओर से पेश वकील ने शीर्ष अदालत से कहा कि उच्च न्यायालय में लंबित अवमानना कार्यवाही वापस ले ली जाएगी।

गृह सचिव ने उच्च न्यायालय के उस आदेश के खिलाफ शीर्ष अदालत का रुख किया था, जिसमें ‘वीरता के लिए राष्ट्रपति पदक’ देने के निर्देश का पालन नहीं करने पर सचिव को अवमानना का प्रथम दृष्टया दोषी माना गया था। अवमानना की कार्यवाही केंद्र द्वारा उच्च न्यायालय के नौ दिसंबर 2024 के उस निर्देश का कथित तौर पर पालन नहीं किए जाने के कारण शुरू हुई थी, जिसमें सरकार से चौहान को एक महीने के भीतर वीरता पदक देने को कहा गया था। चौहान 2003 में ग्वालियर जिले के घाटीगांव थाने के प्रभारी थे।

उन्होंने एक गांव में डकैतों की मौजूदगी की सूचना मिलने के बाद उनके खिलाफ अभियान का नेतृत्व किया था। इस मुठभेड़ में दो डकैत मारे गए थे और चौहान भी घायल हो गए थे। मजिस्ट्रेट जांच में उन्हें दोषमुक्त किए जाने के बाद समय से पहले पदोन्नति और ‘वीरता के लिए राष्ट्रपति पदक’ देने की सिफारिश की गई थी।

कई वर्षों तक चली कानूनी लड़ाई के बाद उच्च न्यायालय ने 2018 में राज्य सरकार को पुरस्कार के लिए उनका नाम केंद्र को भेजने का निर्देश दिया था। मध्य प्रदेश सरकार ने 2019 में उनके नाम की सिफारिश की, लेकिन गृह मंत्रालय ने उसी वर्ष बाद में दावे को खारिज कर दिया। इसके बाद उच्च न्यायालय से लेकर उच्चतम न्यायालय तक फिर कानूनी लड़ाई चली और उच्च न्यायालय में अवमानना की कार्यवाही भी शुरू हुई।

अवमानना कार्यवाही के दौरान केंद्र ने अनुपालन रिपोर्ट दाखिल कर कहा था कि राष्ट्रपति ने चौहान को वीरता पदक देने की मंजूरी दे दी है। उच्च न्यायालय ने इस फैसले को ‘‘अपर्याप्त’’ बताते हुए कहा था कि ‘वीरता पदक’ और ‘वीरता के लिए राष्ट्रपति पदक’ अलग-अलग सम्मान हैं। अदालत ने कहा था कि ‘वीरता के लिए राष्ट्रपति पदक’ उच्च श्रेणी का सम्मान है, जबकि ‘वीरता पदक’ एक साथ कई कर्मियों को दिया जाता है।

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