विश्व पर्यावरण दिवस पर दिल्ली टीचर्स यूनिवर्सिटी का संदेश: “संकल्प से कर्म और कर्म से परिवर्तन"

DTU World Environment Day
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कार्यक्रम का शुभारंभ हरिजन सेवक संघ परिसर में वृक्षारोपण अभियान से हुआ, जिसमें विभिन्न प्रजातियों के पौधे लगाए गए और उनके संरक्षण का संकल्प लिया गया। इसके साथ ही स्वच्छता अभियान, पोस्टर निर्माण प्रतियोगिता तथा पर्यावरण जागरूकता गतिविधियों का आयोजन किया गया, जिनमें विद्यार्थियों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर दिल्ली टीचर्स यूनिवर्सिटी (DTU) ने हरिजन सेवक संघ परिसर तथा विश्वविद्यालय परिवार के सहयोग से पूर्वाह्न सत्र (सुबह के सत्र) में पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक उत्तरदायित्व और सतत विकास को समर्पित विविध कार्यक्रमों का आयोजन किया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के शिक्षकों, अधिकारियों, कर्मचारियों तथा विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लेते हुए प्रकृति संरक्षण और जनहित के लिए कार्य करने का संकल्प लिया।

कार्यक्रम का शुभारंभ हरिजन सेवक संघ परिसर में वृक्षारोपण अभियान से हुआ, जिसमें विभिन्न प्रजातियों के पौधे लगाए गए और उनके संरक्षण का संकल्प लिया गया। इसके साथ ही स्वच्छता अभियान, पोस्टर निर्माण प्रतियोगिता तथा पर्यावरण जागरूकता गतिविधियों का आयोजन किया गया, जिनमें विद्यार्थियों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।

इस अवसर पर कर्मयोगी विनोबा भावे के सहयोगी रहे वरिष्ठ समाजसेवी श्री लक्ष्मी जी ने पर्यावरण दिवस को केवल एक औपचारिक आयोजन न मानकर “संकल्प दिवस” के रूप में मनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जब तक व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित नहीं होगा, तब तक वास्तविक विकास संभव नहीं है। उन्होंने श्रमदान, आत्मानुशासन और सामाजिक संवेदनशीलता को पर्यावरण संरक्षण का आधार बताया।

हरिजन सेवक संघ के श्री संजय कुमार राय ने उपस्थित सभी प्रतिभागियों का धन्यवाद करते हुए प्रतिदिन “एक सद्भावनापूर्ण कार्य (One Act of Kindness)” करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि स्वच्छता, श्रम के प्रति सम्मान और आत्मनिर्भरता ही एक बेहतर समाज और स्वच्छ पर्यावरण की नींव हैं।

कार्यक्रम के द्वितीय चरण का मुख्य आकर्षण भारत के प्रसिद्ध पर्यावरण चिंतक एवं “जल पुरुष” डॉ. राजेंद्र सिंह का ऑनलाइन व्याख्यान रहा। “भविष्य की पीढ़ियों के लिए सततता (Sustainability for Future Generations)” विषय पर बोलते हुए उन्होंने जलवायु परिवर्तन, जल संकट और पर्यावरणीय चुनौतियों पर गंभीर चिंता व्यक्त की।

डॉ. राजेंद्र सिंह ने कहा कि आज पूरी दुनिया “क्लाइमेट इमर्जेंसी” (जलवायु आपातकाल) के दौर से गुजर रही है। बढ़ता तापमान, अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़ और जल स्रोतों का लगातार समाप्त होना मानवता के सामने बड़ी चुनौती है। उन्होंने अपने सर्व सेवा संघ और देशभर में किए गए जल संरक्षण अभियानों के अनुभव साझा करते हुए बताया कि विज्ञान और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को साथ लेकर ही पर्यावरणीय संकट का समाधान संभव है।

उन्होंने विशेष रूप से इंडीजीनस नॉलेज (पारंपरिक एवं स्थानीय ज्ञान) के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हमारे गांवों, किसानों और स्थानीय समुदायों के पास प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने का सदियों पुराना अनुभव है। यदि आधुनिक विज्ञान और स्थानीय ज्ञान का समन्वय किया जाए तो पर्यावरण संरक्षण के अधिक प्रभावी और टिकाऊ रास्ते विकसित किए जा सकते हैं।

जल संकट पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि भारत के अनेक क्षेत्रों में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है, नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं और वर्षा जल का पर्याप्त संरक्षण नहीं हो पा रहा है। उन्होंने वर्षा जल संचयन, जल स्रोतों के पुनर्जीवन, सामुदायिक सहभागिता तथा जल के विवेकपूर्ण उपयोग को संकट के प्रमुख समाधान के रूप में प्रस्तुत किया।

डॉ. सिंह ने युवाओं से आह्वान किया कि वे केवल पर्यावरण के दर्शक न बनें, बल्कि उसके संरक्षक और नेतृत्वकर्ता बनें। उन्होंने कहा कि प्रत्येक नागरिक यदि जल, वृक्ष और भूमि संरक्षण के लिए छोटे-छोटे प्रयास भी नियमित रूप से करे तो बड़ा परिवर्तन संभव है।

इस अवसर पर उन्होंने एक प्रेरक संदेश देते हुए कहा- “प्रकृति हमारी विरासत नहीं, आने वाली पीढ़ियों की अमानत है।”

उन्होंने आगे कहा- “जब हम पानी बचाते हैं, तब हम केवल जल नहीं, बल्कि जीवन, संस्कृति और भविष्य को भी बचाते हैं।”

कार्यक्रम के समापन पर विश्वविद्यालय की जनसंपर्क एवं आउटरीच गतिविधियों से संबद्ध डॉ. सरोज मलिक ने सभी प्रतिभागियों एवं हरिजन सेवक संघ परिवार का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि शिक्षा संस्थानों और सामाजिक संगठनों के संयुक्त प्रयासों से विद्यार्थियों में सेवा, श्रम, पर्यावरणीय चेतना तथा सामाजिक जिम्मेदारी के संस्कार विकसित किए जा सकते हैं। उन्होंने सप्ताह में कम से कम एक दिन श्रमदान आधारित गतिविधियों के आयोजन का सुझाव भी दिया।

दिल्ली टीचर्स यूनिवर्सिटी के कुलपति एवं विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपने संदेश में कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल एक दिवस तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि यह हमारी जीवनशैली, सामाजिक दायित्व और मानवीय मूल्यों का अभिन्न हिस्सा है। विश्वविद्यालय शिक्षण, अनुसंधान और सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से पर्यावरणीय चेतना, सतत विकास और सामाजिक उत्तरदायित्व के मूल्यों को निरंतर बढ़ावा देता रहेगा।

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर विश्वविद्यालय ने “संकल्प से कर्म और कर्म से परिवर्तन” का संदेश देते हुए सभी नागरिकों से प्रकृति संरक्षण, जल बचाने, वृक्ष लगाने, स्वच्छता अपनाने और सामाजिक सहभागिता को जीवन का हिस्सा बनाने का आह्वान किया। कार्यक्रम का समापन पर्यावरण संरक्षण, जल सुरक्षा और मानवीय संवेदनाओं को मजबूत करने के सामूहिक संकल्प के साथ हुआ।

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