चुनावी राज्यों में कोरोना संकट के लिए चुनाव आयोग जिम्मेदार? आखिर निर्णय लेने में क्यों हुई देरी

चुनावी राज्यों में कोरोना संकट के लिए चुनाव आयोग जिम्मेदार? आखिर निर्णय लेने में क्यों हुई देरी

नए आदेश के मुताबिक शाम 7:00 बजे से लेकर सुबह 10:00 बजे तक किसी भी तरह का चुनाव प्रचार बंद रहेगा। लेकिन चुनाव आयोग ने यह सब तब किया जब मामले बिगड़ते गए। चुनाव आयोग ने अपने सख्त निर्देश में कहा की सभी नेता और स्टार प्रचारक अपनी सभाओं में कोविड-19 मानकों का पालन करेंगे और राजनीतिक दलों की ओर से कोई उल्लंघन हुआ तो उनके खिलाफ क्रिमिनल केस होगा।

भारत में इस वक्त कोरोना वायरस संक्रमण की दूसरी लहर जारी है। मामले लगातार बढ़ते जा रहे है। इन सबके बीच पश्चिम बंगाल में मतदान की प्रक्रिया भी जारी है। अब सवाल यह उठ रहे है कि क्या कोरोना महामारी के बीच चुनाव आयोग विधानसभा चुनाव के दौरान अपनी भूमिका निभाने में फेल हो गया? क्या चुनाव आयोग ने कोरोना संक्रमण न फैले, इस को लेकर निर्णय करने में देर कर दिया? क्या चुनाव आयोग को चुनावी राज्यों में होने वाली रैलियों की इजाजत ही नहीं देनी चाहिए थी या फिर इस पर पहले ही रोक लगा देनी चाहिए थी? क्या चुनाव आयोग ने जो कदम बाद में उठाएं, उसे पहले ही उठा लेना चाहिए था? कोरोना के दूसरे लहर ने इन तमाम सवालों को फिलहाल उत्पन्न किया है। आज तो मद्रास हाई कोर्ट ने भी यह कह दिया कि कोरोना वायरस की दूसरी लहर के लिए चुनाव आयोग ही जिम्मेदार है। जाहिर सी बात है कि जिस तरह से चुनावी राज्यों में भी कोरोना वायरस का संकट बढ़ा है उससे कहीं ना कहीं चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल जरूर उठेंगे।

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हालांकि यह बात भी सच है कि चुनाव आयोग ने कागजी तौर पर कोरोना वायरस प्रोटोकॉल के अंतर्गत कई गाइडलाइंस तैयार किए थे और उसे जारी भी किया गया था। पॉलिटिकल पार्टियों को भी इन गाइडलाइंस को मानने के लिए कहा गया था। हालांकि, जमीन पर कुछ इसका असर नहीं देखने को मिला। चुनावी राज्यों में बेधड़क रैलियां होती रही। चाहे छोटे नेता हो या फिर बड़े नेता हो, सभी की रैली में हजारों-लाखों में भीड़ जुटी रही थी। रैलियों में मास्क के का इस्तेमाल नहीं हो रहा था। सामाजिक दूरी की बात ही छोड़िए। लेकिन यह बात भी है कि जब चुनाव आयोग की ओर से पांच राज्यों की चुनावी तारीखों का ऐलान किया जा रहा था तब भारत में कोरोना वायरस संकट कंट्रोल में था। चुनावी प्रक्रिया जैसे जैसे आगे बढ़ी वैसे वैसे कोरोना वायरस  का संकट भी बढ़ता रहा। हालात खराब होने और चौतरफा आलोचना के बाद चुनाव आयोग निर्णय लेने की स्थिति में आया।

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पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार के दौरान कोविड बचाव नियमों के उल्लंघन का संज्ञान लेते हुए निर्वाचन आयोग ने राज्य में तत्काल प्रभाव से पदयात्रा, रोड शो और वाहन रैलियों के आयोजन पर रोक लगा दी। साथ ही कहा कि किसी भी जनसभा में 500 से अधिक लोगों को अनुमति प्रदान नहीं की जाएगी। आदेश में कहा गया कि आयोग ने पाया है कि कई राजनीतिक दल एवं उम्मीदवार अभी भी जनसभा के दौरान सुरक्षा नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं।  इसके अलावा यह भी कहा गया कि जहां चुनाव होने हैं वहां चुनाव प्रचार 48 घंटे की जगह अब 72 घंटे पहले बंद हो जाएगा। नए आदेश के मुताबिक शाम 7:00 बजे से लेकर सुबह 10:00 बजे तक किसी भी तरह का चुनाव प्रचार बंद रहेगा। लेकिन चुनाव आयोग ने यह सब तब किया जब मामले बिगड़ते गए। चुनाव आयोग ने अपने सख्त निर्देश में कहा की सभी नेता और स्टार प्रचारक अपनी सभाओं में कोविड-19 मानकों का पालन करेंगे और राजनीतिक दलों की ओर से कोई उल्लंघन हुआ तो उनके खिलाफ क्रिमिनल केस होगा।

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चुनाव आयोग ने यह कदम तब उठाया जब उसे कलकत्ता हाई कोर्ट से फटकार मिली। साथ ही साथ अब  मद्रास हाई कोर्ट ने भी उसे चेताया है। कोरोना संक्रमण के कारण कई नेता बीमार हो गए हैं तो कई मौत के शिकार भी हो गए हैं। अब यह सवाल जरूर उठाएंगे कि क्या चुनाव आयोग कोविड-19 प्रोटोकॉल को पालन कराने में विफल रहा। ममता बनर्जी की ओर से भी आखरी चरण के चुनाव को एक पेज में समेटने की वकालत की गई थी। लेकिन आयोग ने इसे खारिज कर दिया। इसके लिए भी आयोग की आलोचना की गई थी। कोरोना वायरस संकट के दौरान बिहार में भी चुनाव कराने को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठे जरूर थे। लेकिन उस समय कोरोना वायरस की आंच कमजोर दिखाई दे रही थी।





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