भारत के नागरिकों के बौद्धिक, नैतिक और आध्यात्मिक विकास के लिए आवश्यक हैं मौलिक अधिकार

भारत के नागरिकों के बौद्धिक, नैतिक और आध्यात्मिक विकास के लिए आवश्यक हैं मौलिक अधिकार

जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था तब कई तरह की रूढ़िवादी रीति रिवाज समाजिक बुराइयों के तौर पर प्रचलित थे। महिलाओं को सामाजिक रुप से काफी कमजोर माना जाता था, पिछड़ी जातियों के साथ काफी भेदभाव होते थे।

जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था तब कई तरह की रूढ़िवादी रीति रिवाज समाजिक बुराइयों के तौर पर प्रचलित थे। महिलाओं को सामाजिक रुप से काफी कमजोर माना जाता था, पिछड़ी जातियों के साथ काफी भेदभाव होते थे। जमीदार वर्ग किसानों को कर्ज के नाम पर ठग रहा था। ऐसी अनगिनत समस्याएं थी जिसकी वजह से समाज का एक तबका आगे बढ़ता जा रहा था एक एक तबका पूरी तरह से पिछड़ता जा रहा था। क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों से एक लंबी जंग लड़ी और भारत को अंग्रेजों से 15 अगस्त 1947 में आजाद करवाया। भारत का संविधान बनाते वक्त भारत को एक लोकतांत्रिक, पंथनिरपेक्ष देश घोषित किया गया। भारत के संविधान में हर धर्म, जाति, समुदाय, संस्कृति के लोगों का समानता के अधिकार दिए गये ताकि उनका पूर्ण विकास हो सके। आज इस आर्टिकल में हम आपको बताने जा रहे है भारत के मौलिक अधिकारों के बारे में। 

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मौलिक अधिकारों को छह श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है। इन मौलिक अधिकारों की परिकल्पना भारतीय संविधान के भाग III (अनुच्छेद 12 से 35) में की गई है।

स्वतंत्रता का अधिकार

समानता का अधिकार

शोषण के खिलाफ अधिकार

धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार

सांस्कृतिक-शैक्षिक अधिकार

संवैधानिक उपचार का अधिकार

मौलिक अधिकार वे अधिकार हैं जो भारत के नागरिकों के बौद्धिक, नैतिक और आध्यात्मिक विकास के लिए आवश्यक हैं। चूंकि ये अधिकार व्यक्तियों के अस्तित्व और सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक हैं, इसलिए उन्हें 'मौलिक अधिकार' कहा जाता है। इनमें व्यक्तिगत रूप से सबसे सारे अधिकार शामिल हैं, जैसे कानून के समक्ष समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता, सभा की स्वतंत्रता (शांतिपूर्ण सभा), धर्म की स्वतंत्रता (धर्म का अभ्यास करने की स्वतंत्रता), संवैधानिक उपचारों का अधिकार। मौलिक अधिकार सार्वभौमिक रूप से सभी नागरिकों पर लागू होते हैं, चाहे वे किसी भी जाति, जन्मस्थान, धर्म, यौन अभिविन्यास, समुदाय लिंग आदि किसी भी पहचान के हों।

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भारतीय दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता और अन्य कानून न्यायपालिका के अधीन इन अधिकारों का उल्लंघन होने पर दंड निर्धारित हैं। मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामले में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय से अनुच्छेद 32 के अनुसार सीधे अंतिम न्याय के लिए संपर्क किया जा सकता है। अधिकारों का मूल है इंग्लैंड के बिल ऑफ राइट्स, यूनाइटेड स्टेट्स बिल ऑफ राइट्स और फ्रांस के डिक्लेरेशन ऑफ मैन ऑफ राइट्स सहित कई स्रोत हैं। भारतीय संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त छह मौलिक अधिकार हैं। 





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