गृह मंत्रालय का बड़ा फैसला: Forensic Infrastructure विस्तार के लिए 5 नई लैब को मिला Electronic Evidence Examiner दर्जा

Forensic Infrastructure
प्रतिरूप फोटो
AI Image

केंद्र सरकार ने डिजिटल फोरेंसिक अवंसरचना को सुदृढ़ करने हेतु पांच नई प्रयोगशालाओं को इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य परीक्षक के रूप में नामित किया है जिसमें बीएसएफ की विशेष विंग अब ड्रोन फोरेंसिक का विश्लेषण करेगी। यह विस्तार नए आपराधिक कानूनों के तहत त्वरित न्याय सुनिश्चित करने और डिजिटल साक्ष्यों की वैज्ञानिक जांच क्षमता बढ़ाने की एक महत्वपूर्ण रणनीतिक पहल है। कीवर्ड्स: डिजिटल फोरेंसिक, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, बीएसएफ एसआईडब्ल्यू, साइबर अपराध जांच।

 डिजिटल फॉरेंसिक ढांचे को बड़ी मजबूती प्रदान करते हुए केंद्र सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की जांच के लिए पांच नए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य परीक्षक घोषित किए हैं जिनमें सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की विशेष और प्रतिष्ठित ‘स्पेशल इंस्ट्रूमेंट्स विंग’ (एसआईडब्ल्यू) भी शामिल है। अधिकारियों ने यह जानकारी दी। अधिकारियों ने कहा कि इस कदम का उद्देश्य डिजिटल अपराधों से जुड़े मामलों में तेजी से बढ़ रहे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की जांच की देश की क्षमता को और मजबूत करना है। सूत्रों के अनुसार एसआईडब्ल्यू इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के एक विशेष क्षेत्र ‘ड्रोन फॉरेंसिक’ की जांच की जिम्मेदारी संभालेगी।

सूत्रों ने बताया कि ड्रोन फॉरेंसिक के लिए एसआईडब्ल्यू को नामित किया जाना इस बात का संकेत है कि ड्रोन से जुड़े साक्ष्यों का महत्व लगातार बढ़ रहा है। सूत्रों ने कहा कि चूंकि सुरक्षा एजेंसियां सीमा पार से ड्रोन के जरिए होने वाली मादक पदार्थों और हथियारों की तस्करी, निगरानी तथा अन्य गैरकानूनी गतिविधियों जैसी चुनौतियों का सामना करती हैं, ऐसे में इन मामलों में मिलने वाले इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की वैज्ञानिक जांच और भी अहम हो गई है।

सूत्रों के मुताबिक ‘कंप्यूटर (मीडिया) फॉरेंसिक और मोबाइल डिवाइस फॉरेंसिक्स’ से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की जांच और विश्लेषण का कार्य मुंबई के न्याय सहायक प्रयोगशाला संचालनालय(डीएफएसएल), गोवा के राष्ट्रीय फॉरेंसिक विज्ञान विश्वविद्यालय (एनएफएसयू) तथा केंद्रीय गृह मंत्रालय के अपराध विज्ञान सेवा निदेशालय के तहत कार्यरत कोलकाता के केंद्रीय अपराध विज्ञान प्रयोगशाला (सीएफएसएल) द्वारा किया जाएगा। सूत्रों ने बताया कि जयपुर में राज्य अपराध विज्ञान प्रयोगशाला का ‘साइबर फॉरेंसिक डिवीजन’ ‘कंप्यूटर (मीडिया) फॉरेंसिक्स’ से जुड़े मामलों की जांच संभालेगा।

हालांकि, इसमें ‘फ्लॉपी डिस्क’ और ‘मोबाइल डिवाइस फॉरेंसिक’ को शामिल नहीं किया जाएगा। उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79ए के तहत इन प्रयोगशालाओं को इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य परीक्षक (एक्जामिनर ऑफ इलेक्ट्रोनिक एविडेंस) के रूप में नामित किया है। उन्होंने कहा कि यह विस्तार सरकार के उस व्यापक प्रयास का हिस्सा है, जिसके तहत मान्यता प्राप्त डिजिटल फॉरेंसिक सुविधाओं का एक बड़ा नेटवर्क तैयार किया जा रहा है क्योंकि जांच एजेंसियां अब मोबाइल फोन, कंप्यूटर, स्टोरेज डिवाइस, सीसीटीवी सिस्टम, क्लाउड प्लेटफॉर्म और अन्य डिजिटल स्रोतों से प्राप्त इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड पर तेजी से निर्भर हो रही हैं।

गृह मंत्रालय नए आपराधिक कानूनों के तहत जल्द न्याय सुनिश्चित करने के लिए फॉरेंसिक बुनियादी ढांचे के विस्तार पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। इन नए कानूनों का उद्देश्य प्राथमिकी दर्ज होने से लेकर उच्चतम न्यायालय तक मामले में फैसले की प्रक्रिया को तीन साल की समय-सीमा के भीतर पूरा करना है।

गृह मंत्री अमित शाह ने भी शीघ्र न्याय दिलाने में वैज्ञानिक साक्ष्यों के महत्व पर जोर दिया है। राष्ट्रीय अपराध विज्ञान अवसंरचना विस्तार योजना को 19 जून, 2024 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंजूरी दी थी। इस योजना के तहत 2024-25 से 2028-29 तक की अवधि के लिए 2,254.43 करोड़ रुपये का वित्तीय प्रावधान किया गया है। इसका उद्देश्य देश में फॉरेंसिक जांच की सुविधाओं और बुनियादी ढांचे को मजबूत करना है।

डिस्क्लेमर: प्रभासाक्षी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।


All the updates here:

अन्य न्यूज़