जिस Blue Sparrow Ballistic Missile से Khamenei मारे गये, उसे Israel से हासिल करने की दिशा में भारत ने बढ़ाये कदम!

भारत की रक्षा खरीद नीति भी लंबे समय से इस सिद्धांत पर आधारित रही है कि किसी बड़े सैन्य सौदे से पहले उस तकनीक की युद्ध में उपयोगिता साबित होनी चाहिए, और ब्लू स्पैरो मिसाइल के हालिया उपयोग ने ऐसी प्रणालियों की क्षमता का एक प्रत्यक्ष उदाहरण पेश कर दिया है।
जिस मिसाइल से ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की तेहरान में मौत हुई, उसी मिसाइल श्रेणी की उन्नत प्रणालियां भारत भी अपनी सैन्य क्षमता में शामिल करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। 28 फरवरी 2026 को तेहरान में खामेनेई के कड़े सुरक्षा वाले परिसर पर किये गये सटीक हमले में ब्लू स्पैरो नाम की वायु से छोड़ी जाने वाली बैलिस्टिक मिसाइल का उपयोग किये जाने की खबर सामने आयी है। इस घटना ने न केवल ईरान और इजराइल के बीच संघर्ष को नया मोड़ दिया बल्कि इस बात पर भी ध्यान केंद्रित कर दिया है कि भारत पिछले कुछ वर्षों से इसी स्पैरो मिसाइल समूह से विकसित प्रणालियों को अपनी गहरी मारक क्षमता का हिस्सा बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यह हमला तेहरान की पाश्चर स्ट्रीट पर स्थित खामेनेई के कड़े सुरक्षा वाले आवासीय परिसर पर किया गया। उस समय वहां ईरान के कई वरिष्ठ सैन्य और राजनीतिक अधिकारी एक महत्वपूर्ण बैठक के लिए मौजूद थे। इस हमले में लगभग तीस सटीक प्रहार किये गये जिनमें कई ब्लू स्पैरो मिसाइलें शामिल थीं। हमले के बाद तेहरान के कई हिस्सों से धुएं के गुबार उठते हुए देखे गये और उसके बाद ईरान के सरकारी मीडिया ने 86 वर्ष के खामेनेई की मौत की पुष्टि कर दी।
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बताया जाता है कि यह हमला एक लड़ाकू विमान से दागी गयी मिसाइल द्वारा किया गया जो अंतरिक्ष की सीमा तक पहुंचकर फिर अत्यधिक गति से नीचे आयी। ब्लू स्पैरो लगभग 1240 मील तक मार करने में सक्षम मानी जाती है। इसकी उड़ान पद्धति अर्ध बैलिस्टिक होती है जो पृथ्वी के वायुमंडल से कुछ समय के लिए बाहर चली जाती है और फिर तीव्र कोण से लक्ष्य पर गिरती है। इस विशेष उड़ान मार्ग के कारण सामान्य वायु रक्षा प्रणालियों के लिए इसे पकड़ना बेहद कठिन हो जाता है और लक्ष्य को लगभग बिना चेतावनी के भेदा जा सकता है।
ब्लू स्पैरो मूल रूप से इजराइल के स्पैरो मिसाइल समूह का हिस्सा है। इस समूह में ब्लैक स्पैरो और सिल्वर स्पैरो जैसी मिसाइलें भी शामिल हैं। शुरुआत में इन्हें दुश्मन की बैलिस्टिक मिसाइलों की नकल करने के लिए विकसित किया गया था ताकि इजराइल अपनी वायु रक्षा प्रणालियों का परीक्षण कर सके। लेकिन समय के साथ इसमें बदलाव किये गये और इसे वास्तविक युद्ध अभियानों के लिए भी सक्षम बनाया गया। लगभग साढ़े छह मीटर लंबी और करीब दो टन वजनी यह मिसाइल आधुनिक लड़ाकू विमानों से छोड़ी जा सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार इस हमले के पीछे कई वर्षों की खुफिया तैयारी थी। इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद और साइबर खुफिया इकाई ने खामेनेई की सुरक्षा व्यवस्था और गतिविधियों पर लंबे समय तक निगरानी रखी। निगरानी में यातायात कैमरों और संचार नेटवर्क की जानकारी भी शामिल थी। खुफिया सूत्रों के मुताबिक खामेनेई अक्सर अपने घर के नीचे बने गहरे बंकर में रात बिताते थे ताकि हवाई हमलों से सुरक्षित रह सकें। इसी कारण हमले की योजना सुबह के समय बनायी गयी जब वह अपने वरिष्ठ कमांडरों के साथ जमीन के ऊपर बैठक में मौजूद थे।
हमले से ठीक पहले साइबर इकाइयों ने आसपास के क्षेत्र में मोबाइल संचार को बाधित कर दिया ताकि किसी प्रकार की चेतावनी परिसर तक न पहुंच सके। इसके बाद सुबह करीब साढ़े सात बजे लड़ाकू विमान उड़ान भरकर निर्धारित स्थान तक पहुंचे और लगभग नौ बजकर चालीस मिनट पर मिसाइल प्रहार शुरू हुआ। बाद में पश्चिमी इराक में मिसाइल के अवशेष मिलने की खबर भी सामने आयी जिससे उसके संभावित उड़ान मार्ग का संकेत मिलता है।
इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू भारत की सामरिक तैयारी से भी जुड़ा हुआ है। भारत पिछले कुछ वर्षों से इसी स्पैरो समूह से विकसित मिसाइल प्रणालियों को अपनी वायु सेना की गहरी मारक क्षमता का हिस्सा बनाने की दिशा में काम कर रहा है। भारत पहले ही रॉक्स नामक सटीक प्रहार करने वाली मिसाइल को अपनी सेवा में शामिल कर चुका है। यह प्रणाली स्पाइस मार्गदर्शन तकनीक से लैस है और ऐसे वातावरण में भी लक्ष्य भेद सकती है जहां उपग्रह आधारित मार्गदर्शन बाधित हो।
हम आपको याद दिला दें कि अप्रैल 2024 में अंडमान निकोबार क्षेत्र में सुखोई तीस एमकेआई लड़ाकू विमान से रॉक्स मिसाइल का सफल परीक्षण किया गया था। इसके बाद अगला संभावित कदम गोल्डन होराइजन प्रणाली को अपनाना माना जा रहा है जिसकी अनुमानित मारक दूरी लगभग पंद्रह सौ से दो हजार किलोमीटर बतायी जाती है। इसे सुखोई विमानों के उन्नत संस्करण पर एकीकृत करने का प्रस्ताव दिया गया है।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल, रॉक्स प्रणाली और संभावित गोल्डन होराइजन जैसी मिसाइलों को एक साथ तैनात किया जाता है तो भारत के पास दूर स्थित रणनीतिक लक्ष्यों पर प्रहार करने की अत्यंत प्रभावी क्षमता विकसित हो जायेगी। इस तरह की बहुस्तरीय मारक संरचना भारत को बिना सीमा पार किये दुश्मन के महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की ताकत दे सकती है।
हम आपको यह भी बता दें कि फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजराइल यात्रा को भी इस पूरी रणनीतिक प्रक्रिया से जोड़कर देखा जा रहा है। रक्षा विश्लेषकों के अनुसार इस दौरान संभवतः गोल्डन होराइजन मिसाइल प्रणाली को लेकर महत्वपूर्ण चर्चा हुई। देखा जाये तो ईरान में हुए हालिया हमले ने इस तरह की मिसाइल तकनीक की वास्तविक युद्ध परिस्थितियों में प्रभावशीलता को दुनिया के सामने साबित कर दिया है। भारत की रक्षा खरीद नीति भी लंबे समय से इस सिद्धांत पर आधारित रही है कि किसी बड़े सैन्य सौदे से पहले उस तकनीक की युद्ध में उपयोगिता साबित होनी चाहिए, और ब्लू स्पैरो मिसाइल के हालिया उपयोग ने ऐसी प्रणालियों की क्षमता का एक प्रत्यक्ष उदाहरण पेश कर दिया है।
बहरहाल, ईरान में हुआ यह हमला आधुनिक मिसाइल युद्ध की बदलती प्रकृति का भी संकेत देता है। तेज गति, असामान्य उड़ान मार्ग और अत्यधिक सटीकता वाली मिसाइलें अब पारंपरिक वायु रक्षा प्रणालियों को चुनौती दे रही हैं। भारत के लिए यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश लंबे समय से ऐसी प्रणालियों की तलाश में है जो गहरे और सुरक्षित क्षेत्रों में स्थित उच्च मूल्य वाले लक्ष्यों पर भी सटीक प्रहार कर सकें।
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