मोदी के सामने जो हुआ उसे कभी नहीं भूलेगा भारत, बड़ा खेल शुरू !

अंग्रेजों ने जब इसे बनाया था तब यहां पर सिर्फ अंग्रेजों को एंट्री मिलती थी। भारतीयों का आना बंद था। लेकिन जब अंग्रेज चले गए तो इस क्लब पर भारत के अमीरों ने कब्जा जमा लिया और यहां पर एंट्री सिर्फ अमीरों के लिए रखी गई।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने खड़े व्यक्ति पीएम मोदी की सबसे बड़ी ताकत है। पीएम मोदी अगर इन्हें नहीं बुलाते तो देश को इनके बारे में जानकारी ही नहीं मिलती। आपने कई रसूखदार लोगों को अकड़ में कहते सुना होगा कि सरकार उनकी है लेकिन सिस्टम हमारा है। अब पीएम मोदी ने उसी सिस्टम पर स्ट्राइक कर दी है। पीएम मोदी के घर के बेहद नजदीक एक क्लब है जिसे जिम खाना क्लब कहा जाता है। इसके बारे में आप पिछले कुछ दिनों से सुन रहे होंगे। पीएम मोदी के आवास के बेहद नजदीक जिस जमीन पर यह जिमखाना क्लब बना है, उस जमीन को खाली करने का आदेश इस क्लब को दे दिया गया है। यह क्लब पीएम आवास से इतना नजदीक है कि सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। प्रधानमंत्री का घर 11 एकड़ में बना हुआ है। जबकि बगल में बना जिमखाना क्लब 27 एकड़ में बना है।
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अंग्रेजों ने जब इसे बनाया था तब यहां पर सिर्फ अंग्रेजों को एंट्री मिलती थी। भारतीयों का आना बंद था। लेकिन जब अंग्रेज चले गए तो इस क्लब पर भारत के अमीरों ने कब्जा जमा लिया और यहां पर एंट्री सिर्फ अमीरों के लिए रखी गई। सोशल मीडिया पर कई लोगों का कहना है कि गोरे अंग्रेजों के बाद इस क्लब पर भारत के तथाकथित अमीर भूरे अंग्रेजों का कब्जा हो गया। इस क्लब के मेंबर खुद को दिल्ली के पावर सर्किट का हिस्सा बताते हैं। यह तथाकथित अमीर लोग दिखाते हैं कि सरकार मोदी चला रहे हैं। लेकिन सिस्टम हम चलाएंगे। आप यह जानकर हैरान हो जाएंगे कि हजारों करोड़ों की जमीन पर बना यह क्लब साल में ₹1000 का ही किराया देता है। इस क्लब के मेंबर खुद को बेस्ट बोलते हैं। यानी इस क्लब के 2ाई हजार मेंबर खुद को बाकी भारतीयों से अलग मानते हैं। 150 करोड़ भारतीयों से अपने आप को सुपीरियर समझते हैं। भारत में बेस्ट और सुपीरियर कौन है? वह इस शख्स ने बता दिया है। इन्हें राष्ट्रपति भवन में पद्मश्री सम्मान दिया जा रहा है। आप यह जानकर चौंक जाएंगे कि यह एक रिटायर्ड बस कंडक्टर हैं। यह जिम खाना के मेंबर तो शायद जिंदगी में कभी ना बन पाए, लेकिन इन्होंने जो काम किया है, वह जिमखाना के तथाकथित अमीर लोग जिंदगी भर नहीं कर पाएंगे।
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यह हैं कर्नाटक के 75 वर्षीय पूर्व बस कंडक्टर अंके गड़ा। भारत के सबसे बड़े मुफ्त पुस्तकालयों में से एक पुस्तक माने की स्थापना की है। जिसके लिए इन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। 20 साल की उम्र में बस कंडक्टर के रूप में काम करते हुए अंक गड़ा ने अपनी कमाई से किताबें खरीदनी शुरू कर दी। जिसके बाद एक विशाल पुस्तकालय की नींव पड़नी शुरू हो गई। अंक गड़ा ने जिंदगी भर अपनी आय का लगभग 80% हिस्सा पुस्तकों के संग्रह में लगाया। अंक के गड़ा ने 20 लाख से भी ज्यादा पुस्तकों वाला विशाल निशुल्क सार्वजनिक पुस्तकालय स्थापित कर दिया। इन्होंने अपनी जीवन भर की कमाई से जो किताबें जुटाई उन्हें मुफ्त में पढ़ने के लिए लोगों को दे दिया। अंक गड़ा का समर्पण इतना प्रबल था कि उन्होंने अपनी किताबों के कलेक्शन को बढ़ाने के लिए मैसूर स्थित अपना घर तक बेच दिया।
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