Matrubhoomi: महात्मा गांधी के खिलाफ जाने से भी नहीं कतराई थीं सुचेता कृपलानी, अपने साथ रखती थीं साइनाइड

Matrubhoomi: महात्मा गांधी के खिलाफ जाने से भी नहीं कतराई थीं सुचेता कृपलानी, अपने साथ रखती थीं साइनाइड
प्रतिरूप फोटो

साल 1963 में उत्तर प्रदेश कांग्रेस दो धड़ों में बंट गई थी। उस वक्त एक धड़ा कमलापति त्रिपाठी के साथ था तो दूसरा चंद्रभानु गुप्ता के साथ था। उस वक्त चंद्रभानु गुप्ता (सीबी गुप्ता) यह नहीं चाहते थे कि उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री कमलपति त्रिपाठी गुट का बने। ऐसे में मुख्यमंत्री के चेहरे की तलाश जारी थी।

भारत की आजादी में जितना बड़ी भूमिका पुरुषों ने निभाई है, उतनी ही भूमिका महिलाओं ने भी निभाई है। भले ही उनकी भूमिकाओं के रास्ते अलग-अलग रहे हों लेकिन जब-जब जरूरत पड़ी है तो कभी रानी लक्ष्मीबाई, नायकी देवी रानी जैसी वीरांगनाओं ने हाथों में हथियार लेकर इस धरा की रक्षा की है तो कभी कमलादेवी जैसी महिलाओं ने महिलाओं के उत्थान का रास्ता तैयार किया और सुचेता कृपलानी ने तो स्वतंत्रता की चाहत में सलाखों के पीछे रास्ते तक गुजारी है। ऐसे में आज हम आपको स्वतंत्रता की चाहत रखने वाली और महिलाओं के परचम को बुलंद करने वाली भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी की कहानी बताने जा रहे हैं।

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सुचेता कृपलानी एकलौती ऐसी महिला मुख्यमंत्री थीं जो साइनाइड लेकर घूमती थीं और तो और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के खिलाफ जाने से भी नहीं कतराई थीं।

कौन हैं सुचेता कृपलानी ?

हरियाणा के अंबाला शहर में सम्पन्न बंगाली ब्राह्मण परिवार में जन्मीं सुचेता कृपलानी की शुरुआती पढ़ाई कई स्कूलों में हुई क्योंकि उनके पिता सरकारी चिकित्सक थे और हर दो-तीन साल में उनका तबादला हो जाता था। सुचेता कृपलानी की इतिहास में काफी रुचि थी। जिसको देखते हुए उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से इतिहास में स्नातक की डिग्री हासिल की।

कॉलेज खत्म होने के बाद सुचेता कृपलानी स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने चाहती थीं लेकिन पिता और बहन की मृत्यु के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। जिसके बाद उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ाना शुरू कर दिया था। साल 1936 में सुचेता कृपलानी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुख्य नेता जेबी कृपलानी के साथ सात जन्मों के बंधन में बंध गईं। उनके इस कदम का राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के साथ-साथ उनके घरवालों ने भी विरोध किया लेकिन उन्होंने अपने मन की सुनी और जेबी कृपलानी (आचार्य कृपलानी) के साथ अपने जीवन को आगे बढ़ाया।

मुख्यमंत्री पद के लिए नाम ऐसे आया था सामने

साल 1963 में उत्तर प्रदेश कांग्रेस दो धड़ों में बंट गई थी। उस वक्त एक धड़ा कमलापति त्रिपाठी के साथ था तो दूसरा चंद्रभानु गुप्ता के साथ था। उस वक्त चंद्रभानु गुप्ता (सीबी गुप्ता) यह नहीं चाहते थे कि उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री कमलपति त्रिपाठी गुट का बने। ऐसे में मुख्यमंत्री के चेहरे की तलाश जारी थी। तभी चंद्रभानु गुप्ता स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा रहे आचार्य कृपलानी से मिलने गए। तब उन्होंने चंद्रभानु गुप्ता को सुचेता कृपलानी का नाम सुझाया था और उन्हें यह नाम पसंद भी आया क्योंकि सुचेता कृपलानी किसी भी गुट में शामिल नहीं थीं। यहीं से उनके मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हुआ था।

साल 1967 में दिए एक इंटरव्यू में सुचेता कृपलानी ने बताया था कि मुख्यमंत्री पद के लिए चंद्रभानु गुप्ता को मेरे नाम का सुझाव दिया गया था। जिसको सुनकर मुझे हंसी भी आई थी। जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी ने मेरे नाम का विरोध भी किया था। क्योंकि उन्हें पता था कि यह महिला अपने पति की ही तरह न तो झुकती है और न ही चापलूसी करती है।

सुचेता कृपलानी साल 1963 से लेकर 1967 तक उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रही। उस वक्त उनके कार्यकाल के दौरान एक ऐसी घटना हुई जिससे सभी प्रभावित थे लेकिन सुचेता कृपलानी डटी रहीं। दरअसल, सरकारी कर्मचारियों ने पेमेंट को लेकर हड़ताल की थी और यह 62 दिन तक चली थी फिर भी सुचेता कृपलानी डिगी नहीं और पेमेंट नहीं बढ़ाया था। साल 1967 में फिर से चुनाव हुए और इस बार चंद्रभानु गुप्ता प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। जिसके बाद साल 1971 में सुचेता कृपलानी ने राजनीति से संन्यास ले लिया। 

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महिला सशक्तिकरण के लिए किया था काफी काम

देश में महिलाओं की आवाज को बुलंद करने के लिए कोई भी संगठन मौजूद नहीं था। ऐसे में सुचेता कृपलानी ने एक महिला संगठन बनाया चाहती थी और फिर साल 1940 में सुचेता कृपलानी ने अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की स्थापना की। इसके बाद साल 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय होने के कारण उन्हें एक साल के लिए जेल जाना पड़ा था। साल 1946 में सुचेता कृपलानी संविधान सभा की सदस्य चुनी गई और 1949 में उन्हें संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक प्रतिनिधि के रूप में चुना गया था।

सुचेता कृपलानी का कद लगातार बढ़ता ही जा रहा था। साल 1947 में भारत के आजाद हो जाने के बाद सुचेता कृपलानी राजनीति में सक्रिया हो गईं। तभी तो हरियाणा में जन्मीं, दिल्ली से पढ़ाई करने वाली सुचेता कृपलानी उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनी थीं।





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