E20 पेट्रोल को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका, सादे पेट्रोल का विकल्प देने की मांग

विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए ऑटोमोबाइल निर्माताओं से स्थिति स्पष्ट करने और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने की मांग की है। सरकार जहां पर्यावरण और विदेशी मुद्रा बचाने के लिए एथॉल ब्लेंडिंग को बढ़ावा दे रही है, वहीं यह विवाद नीति बनाम उपभोक्ता सुरक्षा की जंग बन गया है।
देश में E20 (20% एथिल अल्कोहल मिश्रित) पेट्रोल की अनिवार्य उपलब्धता के खिलाफ वाहन चालकों ने बिना मिश्रण वाले सादे पेट्रोल का विकल्प देने की मांग की है। इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें उपभोक्ताओं को अपनी पसंद का ईंधन चुनने का अधिकार देने की अपील की गई है। वाहन चालकों और विशेषज्ञों का दावा है कि E20 ईंधन से पुराने वाहनों के इंजन, पाइपलाइन और माइलेज पर बुरा असर पड़ रहा है। विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए ऑटोमोबाइल निर्माताओं से स्थिति स्पष्ट करने और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने की मांग की है। सरकार जहां पर्यावरण और विदेशी मुद्रा बचाने के लिए एथॉल ब्लेंडिंग को बढ़ावा दे रही है, वहीं यह विवाद नीति बनाम उपभोक्ता सुरक्षा की जंग बन गया है।
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ग्राहक रेगुलर पेट्रोल क्यों नहीं ले रहे हैं?
प्रीमियम फ्यूल की बढ़ती मांग के पीछे अप्रैल 2025 में पूरे भारत में E20 पेट्रोल को लागू करने की योजना है। सरकार ने कच्चे तेल के आयात को कम करने, ऊर्जा सुरक्षा को बेहतर बनाने, गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण को घटाने और खेती से मिलने वाले कच्चे माल से इथेनॉल का उत्पादन बढ़ाने की अपनी रणनीति के तहत, तय समय से कई साल पहले ही 20% इथेनॉल मिलाने का लक्ष्य हासिल कर लिया था। हालांकि सरकार का हमेशा से यही कहना रहा है कि E20 पेट्रोल उन गाड़ियों के लिए सुरक्षित है जिन्हें इसके इस्तेमाल के लिए बनाया या मंज़ूरी दी गई है, फिर भी पुरानी पेट्रोल कारों और दोपहिया वाहनों के कई मालिक इसके लंबे समय तक पड़ने वाले असर को लेकर चिंता जताते रहे हैं। कई ग्राहकों का मानना है कि इथेनॉल-मिला पेट्रोल गाड़ियों की माइलेज (फ्यूल एफिशिएंसी) पर बुरा असर डालता है। चूंकि आम पेट्रोल के मुकाबले इथेनॉल में प्रति लीटर कम ऊर्जा होती है, इसलिए गाड़ी चलाने वालों का कहना है कि पूरे देश में इस बदलाव के बाद उन्हें माइलेज में साफ़ कमी महसूस हुई है।
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क्या E20 का असर पुरानी गाड़ियों पर पड़ रहा है?
माइलेज की चिंता के अलावा, इथेनॉल की नमी सोखने की क्षमता (हाइग्रोस्कोपिक नेचर) के कारण लंबे समय तक इस्तेमाल से फ्यूल सिस्टम में जंग लगने का डर भी पैदा हो गया है। माना जाता है कि पुरानी गाड़ियों के रबर सील, होज़ और गैस्केट, जिन्हें शुरू में ज़्यादा इथेनॉल वाले मिश्रण के लगातार संपर्क में रहने के हिसाब से नहीं बनाया गया था, उनके भी समय से पहले खराब होने का खतरा ज़्यादा होता है। इन चिंताओं की वजह से 2023 से पहले की पेट्रोल गाड़ियों के कई मालिकों ने प्रीमियम फ़्यूल, खासकर इथेनॉल-फ़्री XP100 आज़माना शुरू कर दिया है। उन्हें उम्मीद है कि इससे माइलेज बेहतर होगा या लंबे समय में होने वाली टूट-फूट कम होगी, जबकि सरकार का कहना है कि E20 उन गाड़ियों के लिए सुरक्षित है जो इसके अनुकूल हैं।
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