Prabhasakshi NewsRoom: TMC और DMK के बुरे हश्र से दिल्ली में विपक्षी एकता पड़ी कमजोर, संसद में NDA की राह हुई आसान

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इस बीच विपक्षी दलों के गठबंधन के भीतर भी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। लोकसभा में सरकार के संवैधानिक संशोधन विधेयक को रोकने में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और द्रविड मुनेत्र कषगम की साझा रणनीति निर्णायक रही थी।

केंद्र में सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के लिए पिछले कुछ समय से संसद के भीतर और बाहर विपक्ष की एकजुटता सबसे बड़ी चुनौती बनती दिख रही थी। विशेषकर महिला आरक्षण कानून में संशोधन से जुड़े विधेयक पर लोकसभा में सरकार को झटका मिलने के बाद यह माना जा रहा था कि विपक्षी दल मिलकर सरकार के महत्वाकांक्षी विधायी कार्यक्रम को रोक सकते हैं। लेकिन अब राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदलती दिखाई दे रही हैं। विपक्ष के दो प्रमुख क्षेत्रीय दलों तृणमूल कांग्रेस और द्रविड मुनेत्र कषगम के भीतर पैदा हुए संकट ने सत्ता पक्ष को नई मजबूती देने के संकेत दिए हैं।

पश्चिम बंगाल में पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस अपने गठन के बाद के सबसे गंभीर संकट से गुजर रही है। पार्टी के भीतर पहली बार खुला विभाजन सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस के कुल अस्सी विधायकों में से 58 विधायकों के एक बड़े समूह ने ममता बनर्जी की पसंद के खिलाफ जाकर ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता चुन लिया। वर्ष 1998 में स्थापित पार्टी में यह पहला बड़ा विभाजन माना जा रहा है। माना जा रहा है कि यह असंतोष केवल नेतृत्व शैली तक सीमित नहीं है, बल्कि ममता बनर्जी के राजनीतिक उत्तराधिकारी माने जा रहे उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव को लेकर भी नाराजगी गहराती जा रही है।

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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस घटनाक्रम का असर केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रहेगा। लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के 28 और राज्यसभा में 13 सांसद हैं। अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या पार्टी अपने सांसदों को एकजुट रख पाएगी या फिर बंगाल में विधायकों की तरह दिल्ली में सांसदों में भी टूट देखने को मिल सकती है। पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर चुप्पी साध रखी है, लेकिन अंदरखाने चिंता गहरी बताई जा रही है। एक वरिष्ठ नेता ने स्वीकार किया कि इस समय पार्टी के लिए सबसे महत्वपूर्ण चुनौती संसद और उसके बाहर अपने सांसदों को एकजुट बनाए रखना है।

इस बीच विपक्षी दलों के गठबंधन के भीतर भी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। लोकसभा में सरकार के संवैधानिक संशोधन विधेयक को रोकने में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और द्रविड मुनेत्र कषगम की साझा रणनीति निर्णायक रही थी। इन दलों के कुल 185 सांसदों ने सदन की एक तिहाई से अधिक संख्या जुटाकर सरकार की राह रोकी थी। लेकिन अब तृणमूल कांग्रेस के भीतर संकट और तमिलनाडु में बदलते राजनीतिक समीकरणों ने विपक्षी एकता को कमजोर कर दिया है।

तमिलनाडु में द्रविड मुनेत्र कषगम और कांग्रेस के संबंधों में भी खटास आ गयी है। विधानसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस ने द्रविड मुनेत्र कषगम से दूरी बनाते हुए विजय के नेतृत्व वाली तमिलगा वेत्रि कषगम सरकार के साथ जाने का फैसला किया। इसके बाद द्रविड मुनेत्र कषगम के सामने नई राजनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है। अब उसकी सीधी टक्कर तमिलगा वेत्रि कषगम से मानी जा रही है, जो कांग्रेस की सहयोगी है। भारतीय जनता पार्टी के भीतर यह आकलन किया जा रहा है कि ऐसे हालात में द्रविड मुनेत्र कषगम केंद्र सरकार के प्रति अपनी पुरानी आक्रामक नीति में नरमी ला सकता है और अधिक व्यवहारिक रुख अपना सकता है।

इस बीच, तृणमूल कांग्रेस के संकट ने राष्ट्रीय राजनीति में भी हलचल बढ़ा दी है। आठ जून को लंबे अंतराल के बाद विपक्षी गठबंधन की बैठक प्रस्तावित है। सूत्रों के अनुसार ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी इस बैठक में शामिल होकर विपक्षी दलों का समर्थन जुटाने की कोशिश करेंगे। हालांकि द्रविड मुनेत्र कषगम ने अब तक बैठक में शामिल होने की पुष्टि नहीं की है, जिससे विपक्षी एकता को लेकर और सवाल खड़े हो गए हैं।

उधर, तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी उथलपुथल के बीच पार्टी नेतृत्व लगातार बैठकों में जुटा हुआ है। ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी और अन्य वरिष्ठ नेताओं ने हालात पर चर्चा कर आगे की रणनीति तय करने के लिए लंबी बैठकें की हैं। पार्टी के सामने सबसे बड़ी चिंता संसद के आगामी मानसून सत्र को लेकर है, जहां विपक्ष की भूमिका पहले जैसी मजबूत नहीं दिख रही। अब तृणमूल कांग्रेस को संसद में अपनी रणनीति और जनसंपर्क दोनों को नए सिरे से तय करना होगा।

देखा जाये तो विपक्षी दलों की कमजोर होती एकजुटता और हाल के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की मजबूत स्थिति ने केंद्र सरकार का आत्मविश्वास बढ़ाया है। सरकार अब एक साथ चुनाव कराने जैसे महत्वाकांक्षी विधायी कार्यक्रमों को नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ाने की तैयारी में है। साथ ही विपक्ष के भीतर बढ़ती दरारों का राजनीतिक लाभ उठाने की रणनीति भी बनाई जा रही है। महाराष्ट्र के कुछ विपक्षी सांसदों के पाला बदलने की चर्चाओं ने भी इन अटकलों को और बल दिया है।

बहरहाल, राजनीतिक हलकों में अब यह माना जा रहा है कि यदि विपक्ष अपने आंतरिक मतभेदों को जल्द दूर नहीं कर पाया तो संसद में सरकार को घेरने की उसकी क्षमता कमजोर पड़ सकती है। आने वाले दिनों में तृणमूल कांग्रेस और द्रविड मुनेत्र कषगम की दिशा ही यह तय करेगी कि विपक्ष दोबारा मजबूत एकजुटता कायम कर पाता है या भारतीय जनता पार्टी के लिए राष्ट्रीय राजनीति की राह और आसान हो जाती है।

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