राजस्थान में बाघों की संख्या बढ़कर हुई 149, बढ़ती आबादी के साथ सामने आईं नई चुनौतियां

राजस्थान में बाघों की संख्या बढ़कर हुई 149, बढ़ती आबादी के साथ सामने आईं नई चुनौतियां
प्रतिरूप फोटो

राजस्थान के पांच बाघ अभयारण्यों में बाघों की कुल संख्या पिछले वर्ष के 135 से बढ़कर इस वर्ष 149 हो गई है। बाघों की बढ़ती आबादी वन्यजीव संरक्षण की बड़ी सफलता है, लेकिन इसके साथ ही उनके सुरक्षित आवास और गांवों के विस्थापन जैसी नई चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, इस सफलता को बनाए रखने के लिए अब बेहतर वन प्रबंधन और नए क्षेत्रों के विकास की आवश्यकता है।

(अविनाश बाकोलिया) जयपुर, 28 जुलाई कभी महज 18-20 बाघों तक सिमट चुके राजस्थान के जंगल आज फिर उसकी दहाड़ से गूंज रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस (29 जुलाई) के अवसर पर प्रदेश के पांचों बाघ अभयारण्यों में बाघों की संख्या बढ़कर 149 पहुंच जाना वन्यजीव संरक्षण की बड़ी सफलता का प्रतीक है। हालांकि, बाघों की बढ़ती आबादी के साथ उनके लिए पर्याप्त आवास, नए क्षेत्रों का विकास और गांवों के विस्थापन जैसी चुनौतियां भी तेजी से सामने आ रही हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि संरक्षण की इस सफलता को बनाए रखने के लिए अब बाघों के विस्तार के अनुरूप बेहतर प्रबंधन की जरूरत है। प्रदेश में बाघों की लगातार बढ़ती संख्या के कारण राजस्थान को अब ‘बाघस्थान’ कहा जाने लगा है। रणथम्भौर, सरिस्का, धौलपुर-करौली, मुकुंदरा हिल्स और रामगढ़ विषधारी बाघ अभयारण्य में बाघ, बाघिन और शावकों की संख्या इस वर्ष बढ़कर 149 हो गई है, जबकि पिछले वर्ष यह संख्या 135 थी।

मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक के.सी. अरुण प्रसाद ने पीटीआई-को बताया कि इस वर्ष प्रदेश के पांचों बाघ अभयारण्यों में 54 बाघिनों ने 53 शावकों को जन्म दिया है, जबकि वर्ष 2025 में 52 बाघिनों ने 43 शावकों को जन्म दिया था। इस बार सबसे अधिक 28 शावकों का जन्म सरिस्का बाघ अभयारण्य में हुआ है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में सबसे अधिक 72 बाघ (बाघ, बाघिन और शावक) रणथम्भौर बाघ अभयारण्य में हैं, जबकि पिछले वर्ष यहां इनकी संख्या 66 थी।

वहीं, सरिस्का में बाघों की संख्या बढ़कर 56 हो गई है, जो पिछले वर्ष 50 थी। वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि बाघों की बढ़ती संख्या इस बात का संकेत है कि प्रदेश के जंगल सुरक्षित हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि बाघ किसी भी वन पारिस्थितिकी तंत्र के शीर्ष शिकारी होते हैं और उनकी मौजूदगी पूरे जंगल के स्वस्थ होने का प्रमाण मानी जाती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, करीब दो दशक पहले राजस्थान में बाघों का अस्तित्व संकट में था और प्रदेश में केवल 18 से 20 बाघ ही बचे थे। आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है और राजस्थान देश के प्रमुख बाघ आवासों में शामिल हो गया है। वर्तमान में पांचों बाघ अभयारण्यों में वयस्क बाघ-बाघिनों की संख्या करीब 96 है, जबकि शावकों को मिलाकर कुल संख्या 149 तक पहुंच गई है।

अकेले रणथम्भौर में लगभग 50 वयस्क बाघ-बाघिन और 22 शावक हैं। वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि बाघों के जन्म और उनके जीवित रहने की दृष्टि से रणथम्भौर देश के सबसे सफल बाघ अभयारण्यों में शामिल है। पर्यटन और बाघ देखने के लिए लोगों के आने के लिहाज से भी रणथम्भौर अन्य अभयारण्यों से आगे है।

वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, रणथम्भौर का जंगल शुष्क वन क्षेत्र है। घने जंगलों की तुलना में यहां बाघों को देखना अपेक्षाकृत आसान होता है, इसलिए यह देशी-विदेशी पर्यटकों की पहली पसंद बना हुआ है। अधिकारियों ने कहा कि करीब 1,500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले रणथम्भौर बाघ अभयारण्य में फिलहाल लगभग 700 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में ही बाघों का सक्रिय विचरण है।

रणथम्भौर के उपवन संरक्षक मानस सिंह ने बताया कि यहां की सबसे बड़ी ताकत समृद्ध शिकार प्रजातियां हैं। सांभर, चीतल और अन्य शाकाहारी वन्यजीवों की पर्याप्त उपलब्धता तथा विकसित घासभूमि बाघों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करती है। विशेषज्ञों ने कहा कि रणथम्भौर में बाघों के जीवित रहने की दर लगभग 80 प्रतिशत है, जो देश के प्रमुख बाघ अभयारण्यों में सबसे बेहतर मानी जाती है।

उन्होंने कहा कि रणथम्भौर का इतिहास बाघिन ‘मछली’ (टी-16) के बिना अधूरा माना जाता है। करीब दो दशक तक रणथम्भौर पर राज करने वाली इस प्रसिद्ध बाघिन ने 18 शावकों को जन्म दिया। उसके वंशजों ने सरिस्का, मुकुंदरा और रामगढ़ विषधारी जैसे अन्य बाघ अभयारण्यों को आबाद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वर्ष 2008 में जब सरिस्का बाघविहीन हो गया था, तब रणथम्भौर की बाघिन ‘मछली’ के वंशजों के पुनर्वास से वहां फिर बाघों की वापसी हुई। उसकी स्मृति में भारत सरकार ने 2013 में डाक टिकट जारी किया। रणथम्भौर के जोगी महल में उसका स्मारक भी बनाया गया है तथा वन विभाग ने उसके नाम पर ‘मछली पुरस्कार’ की शुरुआत की है।

बाघों की संख्या में वृद्धि वन विभाग के लिए नयी चुनौती भी लेकर आई है। रणथम्भौर में उपलब्ध आवास अब सीमित पड़ने लगा है। विशेषज्ञों ने कहा कि वर्तमान आवास क्षमता 40 से 50 बाघों के लिए उपयुक्त मानी जाती है, जबकि यहां कुल संख्या 72 तक पहुंच चुकी है।

वन विभाग के एक अधिकारी बताया कि एक वयस्क नर बाघ को 40 से 50 वर्ग किलोमीटर, जबकि एक बाघिन को लगभग 20 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की आवश्यकता होती है। उन्होंने कहा कि यही कारण है कि लगभग तीन वर्ष की आयु के बाद युवा बाघ अपना नया क्षेत्र तलाशने के लिए जंगल से बाहर निकलने लगे हैं। वन्यजीव विशेषज्ञ एवं टाइगर वॉच के धर्मेन्द्र खांडल ने बताया कि क्षेत्र की तलाश में रणथम्भौर के बाघ कई बार मुकुंदरा हिल्स, रामगढ़ विषधारी और यहां तक कि मध्यप्रदेश के जंगलों तक पहुंच जाते हैं।

उन्होंने कहा कि अन्य बाघ अभयारण्यों में गांवों का विस्थापन अभी पूरी तरह नहीं हो पाया है, और बाघों के लिए पर्याप्त और सुरक्षित आवास उपलब्ध कराने के लिए गांवों का नियोजित पुनर्वास तथा बेहतर वन प्रबंधन बेहद जरूरी है। खांडल ने कहा कि रणथम्भौर के साथ-साथ कैलादेवी अभयारण्य को भी बाघों के लिए पूरी तरह अनुकूल बनाने की दिशा में तेजी से काम करने की आवश्यकता है।

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