Assam के बोंगाईगांव में 204 साल बाद मिला दुर्लभ Ardisia Colorata पौधा

Assam के बोंगाईगांव में 204 साल बाद मिला दुर्लभ Ardisia Colorata पौधा
प्रतिरूप फोटो
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गुवाहाटी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने असम के अभयपुरी क्षेत्र में सर्वेक्षण के दौरान अति दुर्लभ फूलदार झाड़ी आर्डिसिया कोलोराटा की दोबारा खोज की है। ब्रिटिश बागवानी विशेषज्ञ जॉर्ज लोडिजेस ने 1821 में पहली बार इसका विवरण दिया था, जिसके बाद यह भारत के वनस्पति रिकॉर्ड से लगभग गायब हो गया था। नम व घने जंगलों में उगने वाले इस पौधे के केवल 12 नमूने ही मिले हैं।

असम के बोंगाईगांव जिले में 204 साल से अधिक समय बाद दुर्लभ फूलदार झाड़ी ‘आर्डिसिया कोलोराटा’ को फिर से खोजा गया है। राज्य के वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री जयंत मल्ला बरुआ ने मंगलवार को यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि गुवाहाटी विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के शोधकर्ताओं मानस बरुआ और नीलाक्षी देवी ने 2020 से 2025 के बीच असम में किए गए वनस्पति सर्वेक्षणों के दौरान अभयपुरी क्षेत्र में इस प्रजाति को फिर से खोजा।

बरुआ ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा कि यह करीब 204 वर्षों में भारत से इस प्रजाति के मिलने का पहला पुष्ट मामला है। शोधकर्ताओं ने इस पौधे को इससे मिलती-जुलती एक अन्य प्रजाति से अलग पहचानने के लिए इसके फूलों, पत्तियों और ऐतिहासिक विवरणों का अध्ययन किया। मंत्री ने कहा, ‘‘वनस्पति विज्ञान से जुड़ी पत्रिका ‘फेडेस रेपर्टोरियम’ में प्रकाशित उनके निष्कर्षों से वैज्ञानिक नामकरण को लेकर कई पीढ़ियों से चली आ रही भ्रम की स्थिति भी स्पष्ट हुई है।’’ उन्होंने बताया कि ब्रिटिश बागवानी विशेषज्ञ जॉर्ज लोडिजेस ने 1821 में पहली बार इस पौधे का विवरण दिया था।

इसके बाद भारतीय वनस्पति साहित्य में इसका उल्लेख लगभग गायब हो गया था। बरुआ ने कहा, ‘‘शोधकर्ताओं ने अभयपुरी के इस क्षेत्र में इस पौधे के केवल 12 नमूनों का पता लगाया। इससे इसकी दोबारा खोज का वैज्ञानिक महत्व और इसके प्राकृतिक आवास की रक्षा की आवश्यकता, दोनों उजागर होती हैं।’’ उन्होंने बताया कि यह सदाबहार झाड़ी छायादार और नम वन क्षेत्रों में उगती है तथा इसमें गुलाबी, लालिमा लिए हुए या बैंगनी रंग के फूल आते हैं।

बरुआ ने कहा, ‘‘आर्डिसिया कोलोराटा की दोबारा खोज असम के शोध समुदाय के लिए गर्व का क्षण है और यह याद दिलाती है कि हर जंगल में ऐसी कहानियां छिपी हैं, जिन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेजकर रखना जरूरी है।’’

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