Sambhal Violence: Supreme Court से NSA रद्द होने के बाद मुरादाबाद जेल से रिहा हुआ अफरोज

संभल हिंसा मामले के मुख्य आरोपियों में शामिल मोहम्मद अफरोज ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत रद्द होने के बाद शीर्ष अदालत के फैसले को ऐतिहासिक बताया है। मुरादाबाद जेल से 20 महीने बाद घर लौटे अफरोज की रिहाई के साथ ही शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया था।
संभल हिंसा के आरोपी मोहम्मद अफरोज ने करीब 20 महीने जेल में बिताने के बाद घर लौटने पर बुधवार को कहा कि उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (रासुका) के तहत उसकी हिरासत रद्द कर उसके साथ इंसाफ किया है। उसने अदालत के इस फैसले को ‘‘ऐतिहासिक’’ बताया। मुरादाबाद जेल से रिहा होकर मंगलवार देर रात संभल के दीपा सराय स्थित अपने घर पहुंचे अफरोज ने बुधवार शाम संवाददाताओं से कहा कि उसकी रिहाई से उसके परिवार, मोहल्ले और संभल के लोगों में खुशी है तथा उसके घर में ईद जैसा माहौल है।
अफरोज ने कहा, उच्चतम न्यायालय ने हमारे साथ इंसाफ किया है। न्यायालय से हमारी उम्मीदें और बढ़ गई हैं और यह उसका ऐतिहासिक फैसला है। जेल में बिताए समय को ‘‘बेहद तकलीफदेह’’ बताते हुए अफरोज ने कहा कि इस दौरान उसका परिवार आर्थिक रूप से टूट गया।
उसने कहा कि उसके दो भाई लगातार मामले की पैरवी में लगे रहे और बड़े भाई ने उसके बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी संभाली। इससे पहले, अफरोज के बड़े भाई शाहरोज ने उत्तर प्रदेश सरकार से 2024 के संभल हिंसा मामले की निष्पक्ष जांच कराने की अपील की। शाहरोज ने कहा कि करीब 20 महीने बाद परिवार को राहत मिली है और उसके भाई के खिलाफ कोई इलेक्ट्रॉनिक या ऑडियो-वीडियो साक्ष्य नहीं मिला था।
उसने दावा किया कि अफरोज को हिंसा से जुड़े सभी छह आपराधिक मामलों में जमानत मिल चुकी है। उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत अफरोज की एहतियाती हिरासत रद्द करते हुए राज्य सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था। अदालत ने कहा कि स्वतंत्र पुष्टि करने वाली सामग्री के अभाव में पुलिस के समक्ष कथित इकबालिया बयान किसी आरोपी की एहतियाती हिरासत का अकेला आधार नहीं हो सकता।
इस बीच, जिला शासकीय अधिवक्ता राहुल दीक्षित ने बुधवार शाम संवाददाताओं से कहा कि अफरोज संभल हिंसा मामले में मुख्य आरोपियों में शामिल है। उन्होंने कहा कि मामले से संबंधित चार पत्रावलियां जिला न्यायाधीश की अदालत में विचाराधीन हैं, जिनमें से दो में साक्ष्य की प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है और निर्धारित तिथि पर आरोपी के बयान दर्ज किए जाएंगे। दीक्षित ने कहा कि रासुका के तहत हिरासत के मामले में अफरोज को उच्चतम न्यायालय से राहत मिली है, लेकिन उसके खिलाफ लंबित अन्य आपराधिक मामलों में कोई राहत नहीं मिली है।
उन्होंने कहा कि हत्या से जुड़े मामलों में गवाहों के बयान दर्ज किए जा चुके हैं और पत्रावलियों में साक्ष्य मौजूद हैं। अफरोज को 17 जनवरी 2025 को गिरफ्तार किया गया था और 13 अक्टूबर 2025 को उसे रासुका के तहत हिरासत में रखने का आदेश पारित हुआ था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जून 2026 में उस आदेश कोबरकरार रखा था।
मगर उच्चतम न्यायालय ने उस फैसले को पलटते हुए अफरोज की रासुका के तहत हिरासत रद्द कर दी और उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। संभल में नवंबर 2024 में शाही जामा मस्जिद के अदालत के आदेश पर किए गए सर्वेक्षण के दौरान बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी, जिसमें चार लोगों की मौत हो गयी थी तथा पुलिसकर्मियों समेत बड़ी संख्या में लोग घायल हुए थे।
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