शशि थरूर का बयान वंदे मातरम के सभी पांच अंतरे हर कार्यक्रम में अनिवार्य करना अनावश्यक और बोझिल

Shashi Tharoor
ANI
रेनू तिवारी । Jun 2 2026 7:27AM

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने आधिकारिक कार्यक्रमों के आरंभ और अंत में वंदे मातरम के सभी पांच अंतरे बजाने की अनिवार्यता पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह प्रथा श्रोताओं के लिए अनावश्यक और बोझिल है।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद शशि थरूर ने आधिकारिक कार्यक्रमों के आरंभ और अंत में राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' के सभी पांच अंतरे (Stanzas) गाए जाने की अनिवार्यता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। केरल में राष्ट्रगीत के गायन को लेकर छिड़े एक नए विवाद के बीच, संवाददाताओं से बातचीत करते हुए थरूर ने इस प्रथा को श्रोताओं के लिए "अनावश्यक और बोझिल" करार दिया।

केरल में राष्ट्रगीत के गायन को लेकर जारी विवाद के बीच संवाददाताओं से बात करते हुए थरूर ने कहा कि वंदे मातरम का सभी सम्मान करते हैं, लेकिन हर समारोह में इसके सभी अंतरे बजाने को अनिवार्य करना तर्कसंगत नहीं है। उन्होंने कहा, “वंदे मातरम राष्ट्रगीत है और जब इसे गाया जाता है तो हम सम्मानपूर्वक खड़े हो जाते हैं। इसका पहला अंतरा या शुरुआती दो अंतरे, ज्यादातर लोगों को मुंह जुबानी याद होते हैं।”

थरूर ने बताया कि परंपरागत रूप से यह गीत किसी कार्यक्रम की शुरुआत में एक बार गाया जाता है, जबकि राष्ट्रगान अलग से, अक्सर अंत में बजाया जाता है। उन्होंने कहा, “अब वे चाहते हैं कि हर कार्यक्रम की शुरुआत में और अंत में पांचों अंतरे गाए जाएं। मुझे लगता है कि यह एक अनावश्यक थोपा हुआ नियम है।” थारूर ने इस बात पर जोर दिया कि उन्हें राष्ट्रगीत से कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने कहा, “हम सभी वंदे मातरम का सम्मान करते हैं। मैं खुशी-खुशी इसे आपके लिए गा सकता हूं।

 वंदे मातरम: इतिहास और महत्वपूर्ण तथ्य

इस विवाद के बीच यह जानना जरूरी है कि 'वंदे मातरम' का इतिहास क्या है और इसे लेकर हमारे संविधान में क्या प्रावधान हैं:

रचना और मूल स्रोत: 'वंदे मातरम' की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में की थी। बाद में इसे उनके प्रसिद्ध बंगाली उपन्यास 'आनंदमठ' (1882) में शामिल किया गया। यह मूल रूप से संस्कृत और बंगाली भाषा के मिश्रण (मिश्रित भाषा) में लिखा गया है।

स्वतंत्रता संग्राम का नारा: ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत देशभक्ति का सबसे बड़ा प्रतीक बनकर उभरा। साल 1896 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार इसे राजनीतिक मंच पर गाया था।

राष्ट्रगीत (National Song) का दर्जा: 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने 'जन गण मन' को राष्ट्रगान और 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की थी कि 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगान के बराबर ही सम्मान दिया जाएगा।

गायन की स्थापित परंपरा: आधिकारिक और व्यावहारिक तौर पर दूरदर्शन, आकाशवाणी और संसद के सत्रों की शुरुआत में वंदे मातरम के केवल पहले अंतरे (First Stanza) को ही गाया या बजाया जाता है, क्योंकि इसमें मुख्य रूप से मातृभूमि की वंदना है। पूरे पांच अंतरे काफी लंबे हैं और आमतौर पर सार्वजनिक कार्यक्रमों में इन्हें पूरा नहीं गाया जाता।

Read Latest National News in Hindi only on Prabhasakshi  

All the updates here:

अन्य न्यूज़