Supreme Court ने दिव्यांग सैनिकों की Disability Pension पर केंद्र की 271 याचिकाएं खारिज कीं

उच्चतम न्यायालय ने दिव्यांग सैनिकों को विकलांगता पेंशन दिए जाने के खिलाफ केंद्र सरकार की 271 अपीलों को खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने रक्षा मंत्रालय की 2015 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए मुकदमों को वापस न लेने पर अफसोस जताया। अदालत ने कहा कि तकनीकी कारणों से पूर्व सैनिकों के लाभ रोकना अनुचित है और नियमों में पूरी पारदर्शिता होनी चाहिए।
उच्चतम न्यायालय ने सैनिकों को अत्यधिक तकनीकी कारणों से विकलांगता लाभ देने से इनकार किए जाने के संबंध में रक्षा मंत्रालय की साल 2015 की रिपोर्ट का जिक्र करते हुए इस बात पर अफसोस जताया कि सरकार ने दिव्यांग सैनिकों को विकलांगता पेंशन दिए जाने के खिलाफ दायर मामलों को तुरंत वापस लेने की सिफारिश लागू नहीं की है। रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में कई दिव्यांग सैनिकों को अभी भी अत्यधिक तकनीकी कारणों से विकलांगता लाभ नहीं मिल पा रहा है, जबकि दूसरे देश इस मामले में आगे बढ़ चुके हैं। रिपोर्ट में उन मामलों को वापस लेने की सिफारिश की गई थी, जिनमें दिव्यांग सैनिकों को विकलांगता पेंशन देने के आदेश को चुनौती दी गई है।
शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार की ओर से दायर उन 271 अपील को खारिज कर दिया, जिनमें पूर्व सैनिकों को विकलांगता पेंशन देने के आदेशों को चुनौती दी गई थी। न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने 15 सितंबर को सुनाए गए फैसले में रक्षा मंत्रालय की ‘सेवा और पेंशन से जुड़े मामलों की समीक्षा : संभावित विवाद, मुकदमेबाजी कम करना और शिकायतों के समाधान के लिए संस्थागत तंत्र को मजबूत करना’ रिपोर्ट (रक्षा मंत्री रिपोर्ट) का जिक्र किया। पीठ ने कहा, “रक्षा मंत्री रिपोर्ट में दिव्यांग सैनिकों के खिलाफ लंबित इस तरह की अपील को तुरंत वापस लेने की सिफारिश की गई थी, लेकिन इस सिफारिश को ठीक से लागू नहीं किया गया है।” उसने कहा कि रक्षा मंत्रालय के इस तरह के मुकदमों को वापस लेने की समिति की सिफारिश को स्वीकार करने के बाद भी ऐसी अपील दायर की जाती रही हैं।
पीठ ने इस बात को रेखांकित किया कि 2015 की रिपोर्ट में कहा गया था, “हालांकि दुनिया बहुत आगे बढ़ चुकी है... लेकिन भारत में कई दिव्यांग सैनिकों को अभी भी बहुत ही सूक्ष्म तकनीकी कारणों से दिव्यांगता से जुड़े लाभ नहीं दिए जाते हैं... यह समझना जरूरी है कि सैन्य सेवा में स्वाभाविक रूप से तनाव और दबाव होता है। सभी लोकतांत्रिक देशों में सेवा के दौरान या अधिकृत छुट्टी के समय होने वाली दिव्यांगता को सैन्य सेवा की वजह से हुई या उससे और गंभीर हुई दिव्यांगता माना जाता है।” पीठ ने इस बात पर गौर किया कि उसके सामने आई अपील में सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) और विभिन्न उच्च न्यायालयों के आदेशों को चुनौती दी गई थी। उसने कहा कि न्यायालय के समक्ष जो मुद्दा है, वह सेवानिवृत्ति पर सेवा पेंशन के साथ दिव्यांगता के लिए मिलने वाली राशि की पात्रता से जुड़ा हुआ था।
पीठ ने कहा कि इन सभी मामलों में सेवामुक्ति चिकित्सा बोर्ड ने शुरुआती जांच के दौरान राय दी थी कि पूर्व सैनिक की दिव्यांगता न तो सैन्य सेवा के कारण हुई थी और न ही सैन्य सेवा से और गंभीर हुई थी। पीठ ने कहा कि चिकित्सा बोर्ड की राय के आधार पर पूर्व सैनिकों की विभागीय अपील खारिज कर दी गईं। शीर्ष अदालत ने कहा कि इसके बाद पूर्व सैनिकों ने एएफटी या उच्च न्यायालयों का रुख किया, जिन्होंने इस आधार पर विकलांगता पेंशन देने की मंजूरी दी कि दिव्यांगता या तो सैन्य सेवा के कारण हुई थी या उससे और बढ़ गई थी।
न्यायालय ने ‘सशस्त्र बलों के कर्मियों के लिए हताहत पेंशन से संबंधित पात्रता नियम, 1982’ और ‘सशस्त्र बलों के कर्मियों के लिए हताहत पेंशन से संबंधित पात्रता नियम, 2008 के प्रावधानों का जिक्र किया। उसने कहा कि ऐसा लगता है कि ‘पात्रता नियम, 2008’ असल में ‘पात्रता नियम, 1982’ के बाद जारी किए गए संशोधित कार्यकारी निर्देशों का एक संग्रह है। पीठ ने कहा, “हमें यह समझ नहीं आ रहा कि पेंशन से जुड़े लाभों को तय करने वाले नियम की स्थिति को रहस्य में क्यों रखा जाए।
किसी भी जायज कार्रवाई के लिए पारदर्शिता, स्पष्टता और निश्चितता बहुत जरूरी है।” उसने कहा कि पूर्व सैनिकों के मन में इस बात को लेकर कोई असंतोष और अविश्वास नहीं होना चाहिए कि उनके दावों और पात्रता पर किस तरह से कार्रवाई की जा रही है। पीठ ने कहा, “यह जरूरी, बल्कि अनिवार्य है कि सक्षम अधिकारी जल्द से जल्द लागू होने वाले नियमों/विनियमों को आधिकारिक तौर पर तैयार करें और उनकी अधिसूचना जारी करें।
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