Prabhasakshi NewsRoom: Karnataka में जो गलती Rajiv Gandhi ने की थी, दशकों बाद वही Mistake Rahul Gandhi ने कर दी

हम आपको बता दें कि कर्नाटक की राजनीति में वीरेंद्र पाटिल प्रकरण आज भी कांग्रेस के लिए एक बड़ा राजनीतिक सबक माना जाता है। वर्ष 1990 में गंभीर रूप से अस्वस्थ चल रहे मुख्यमंत्री वीरेंद्र पाटिल को कांग्रेस नेतृत्व ने अचानक पद से हटा दिया था।
कर्नाटक की राजनीति में जो गलती दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने की थी उसी गलती को दशकों बाद उनके बेटे राहुल गांधी ने दोहरा दिया है। हम आपको बता दें कि राजीव गांधी की जिस गलती ने कर्नाटक में कांग्रेस की सामाजिक और राजनीतिक जमीन को गहरा नुकसान पहुंचाया था, उसी राह पर अब राहुल गांधी के कदम बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। वर्ष 1990 में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरेंद्र पाटिल को अचानक पद से हटाकर ऐसा संदेश दिया था, जिसे लिंगायत समाज ने अपने सम्मान पर चोट माना था। इसका परिणाम यह हुआ था कि कांग्रेस का पारंपरिक समर्थन आधार धीरे धीरे उससे दूर होता गया और राज्य में भाजपा के उदय की मजबूत नींव पड़ी। अब कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को हटाकर उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को जिम्मेदारी सौंपने की तैयारी के बीच कांग्रेस नेतृत्व के सामने वैसी ही चुनौती खड़ी दिखाई दे रही है।
हम आपको बता दें कि कर्नाटक की राजनीति में वीरेंद्र पाटिल प्रकरण आज भी कांग्रेस के लिए एक बड़ा राजनीतिक सबक माना जाता है। वर्ष 1990 में गंभीर रूप से अस्वस्थ चल रहे मुख्यमंत्री वीरेंद्र पाटिल को कांग्रेस नेतृत्व ने अचानक पद से हटा दिया था। सबसे बड़ा विवाद इस बात को लेकर हुआ कि तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी ने बेंगलुरु हवाई अड्डे पर ही उनको हटाए जाने की घोषणा कर दी। लिंगायत समाज ने इसे अपने सबसे सम्मानित नेताओं में से एक के सार्वजनिक अपमान के रूप में देखा था। इसके बाद कांग्रेस और लिंगायत समुदाय के बीच दूरी लगातार बढ़ती गई। जो समुदाय कभी कांग्रेस का मजबूत समर्थक था, वह धीरे धीरे भाजपा के साथ खड़ा हो गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यही वह मोड़ था जिसने कर्नाटक में भाजपा के उदय का रास्ता तैयार किया। इसलिए आज जब सिद्धारमैया को हटाया जा रहा है तब कांग्रेस के भीतर यह चिंता स्वाभाविक है कि कहीं नेतृत्व परिवर्तन का तरीका फिर किसी बड़े सामाजिक समूह में असंतोष पैदा न कर दे और इतिहास एक बार फिर खुद को न दोहरा दे।
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हम आपको बता दें कि कई महीनों से सिद्धारमैया यह कहते रहे थे कि वह तभी पद छोड़ेंगे जब राहुल गांधी उनसे ऐसा कहेंगे। अब सूत्रों के अनुसार, राहुल गांधी ने ही उन्हें उत्तराधिकारी के लिए रास्ता साफ करने को कहा और सिद्धारमैया ने इस्तीफा देकर डीके शिवकुमार के लिए रास्ता साफ कर दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला केवल नेतृत्व परिवर्तन भर नहीं है क्योंकि सिद्धारमैया की पहचान केवल एक मुख्यमंत्री की नहीं, बल्कि पिछड़ा वर्ग, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों के व्यापक सामाजिक गठबंधन "अहिंदा" के सबसे प्रभावशाली चेहरे के रूप में रही है। यही गठबंधन कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनावी ताकत माना जाता है। ऐसे में यदि यह धारणा बनती है कि दिल्ली के निर्देश पर उन्हें बीच कार्यकाल में हटाया गया, तो इसका नकारात्मक संदेश अहिंदा समर्थकों तक पहुंच सकता है। दूसरी ओर डीके शिवकुमार वोक्कालिगा समाज के प्रमुख नेता माने जाते हैं और गांधी परिवार का भरोसा भी उन्हें प्राप्त है। ऐसे में कांग्रेस को एक ओर संगठन के मजबूत नेता को अवसर देने और दूसरी ओर अपने सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक आधार को संतुष्ट रखने के बीच संतुलन बनाना होगा।
इस पूरे घटनाक्रम को और अधिक जटिल बना दिया है सिद्धारमैया के आखिरी राजनीतिक कदम ने। पद छोड़ने से ठीक पहले उन्होंने कर्नाटक राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की बहुप्रतीक्षित जातीय सर्वेक्षण रिपोर्ट स्वीकार कर ली। यह रिपोर्ट वर्षों से लंबित थी और राज्य की सामाजिक संरचना को लेकर अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। माना जाता है कि पूर्ववर्ती सरकारें लिंगायत और वोक्कालिगा जैसे प्रभावशाली समुदायों की संभावित नाराजगी के डर से इस पर निर्णय लेने से बचती रही थीं।
यह सर्वेक्षण इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य समुदायों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का व्यापक आकलन किया गया है। रिपोर्ट से यह संकेत मिलता है कि पिछड़े वर्गों की जनसंख्या राज्य की पारंपरिक रूप से प्रभावशाली जातियों से अधिक हो सकती है। सिद्धारमैया की अहिंदा राजनीति इसी सामाजिक वास्तविकता पर आधारित रही है। इसलिए यह रिपोर्ट उनके राजनीतिक दृष्टिकोण को आंकड़ों के आधार पर मजबूती प्रदान करती दिखाई देती है।
यहीं से डीके शिवकुमार की कठिन परीक्षा शुरू होती है। यदि उनकी अगुवाई वाली सरकार रिपोर्ट को लागू करती है या उसके आधार पर फैसले लेती है, तो प्रभावशाली समुदायों की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन यदि रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है, तो अहिंदा वर्गों में असंतोष पैदा हो सकता है, जिन्हें सिद्धारमैया ने वर्षों की मेहनत से कांग्रेस के साथ जोड़े रखा है। इस तरह जाते जाते सिद्धारमैया अपने उत्तराधिकारी के सामने एक बेहद कठिन राजनीतिक पहेली छोड़ गए हैं।
देखा जाये तो इसका असर केवल कर्नाटक तक सीमित नहीं रहेगा। राहुल गांधी लंबे समय से जातीय जनगणना को सामाजिक न्याय की राजनीति का केंद्रीय मुद्दा बनाते रहे हैं। उनका तर्क रहा है कि सही सामाजिक आंकड़े ही समान प्रतिनिधित्व और लक्षित कल्याणकारी नीतियों का आधार बन सकते हैं। यदि कर्नाटक में कांग्रेस सरकार इस रिपोर्ट पर आगे नहीं बढ़ती, तो राहुल गांधी की राष्ट्रीय स्तर पर बनाई गई राजनीतिक रेखा कमजोर पड़ सकती है। साथ ही विपक्ष को यह कहने का अवसर मिलेगा कि कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर जातीय जनगणना की मांग करती है, लेकिन सत्ता वाले राज्यों में उस पर अमल करने से हिचकती है। यही कारण है कि कर्नाटक का नेतृत्व परिवर्तन अब केवल मुख्यमंत्री बदलने का मामला नहीं रह गया है, बल्कि कांग्रेस के सामाजिक आधार, भविष्य की चुनावी रणनीति और राहुल गांधी की राजनीतिक विश्वसनीयता की भी बड़ी परीक्षा बन चुका है।
बहरहाल, यह भी दिख रहा है कि सिद्धारमैया को किनारे करने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत शांत तरीके से की गई ताकि किसी बड़े राजनीतिक टकराव से बचा जा सके। इसके बावजूद सिद्धारमैया ने अपने राजनीतिक प्रभाव को बनाए रखा है। जाति सर्वेक्षण की रिपोर्ट को आगे बढ़ाने और पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों तथा दलितों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता देने से उन्हें अपने सामाजिक आधार को फिर से मजबूत करने का अवसर मिला है। साथ ही चूंकि सिद्धारमैया राज्यसभा जाने से इंकार कर राज्य की राजनीति में ही बने रहने की इच्छा जता चुके हैं इसलिए माना जा रहा है कि वह भविष्य की राजनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे।
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