भारतीय आर्मी को मिले 'त्रिशूल' समेत ये 5 घातक हथियार, चीनी दुश्मन को करंट से चखाएंगे मजा

भारतीय आर्मी को मिले 'त्रिशूल' समेत ये 5 घातक हथियार, चीनी दुश्मन को करंट से चखाएंगे मजा

भारत पिछले काफी दिनों से सेना में इस्तेमाल होने वाले हथिहार भारत में ही बना रहा है। रक्षा क्षेत्र में काफी हथिहार भारत में बनें हैं। अब मेक इन इंडिया के अभियान को आगे बढ़ाते हुए त्रिशूल, सैपर पंच जैसे हथिहार को उत्तर प्रदेश की एक कंपनी ने तैयार किया है।

गलवान घाटी संघर्ष के एक साल बाद भारतीय सुरक्षा बलों को अब चीनी सैनिकों को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए गैर-घातक हथियारों की एक श्रृंखला मिली है। यह चीनी सेना से निपटने के लिए भारतीय बलों को पूरी तरह से तैयार रखने के उद्देश्य से बनायी गयी है क्योंकि पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर सैन्य गतिरोध एक साल से अधिक समय से जारी है। चीनी सैनिक एलएसी पर सीमापार करने की कोशिशें लगातार करते रहते हैं। हाल ही में दोनों सेनाओं के जवानों के बीच झड़प हुई थी। पिछले साल जून में, चीन ने गालवान घाटी संघर्ष में भारतीय सैनिकों के खिलाफ तार वाली लाठी, टेसर जैसे गैर-घातक हथियारों का इस्तेमाल किया था, जिसमें 20 भारतीय सैनिक मारे गए थे और दोनों शक्तियों के बीच तनाव बढ़ गया था। इस संघर्ष में अज्ञात संख्या में चीनी सैनिकों की भी जान गयी थी। अब भारत इस तरह के हथिहार बना रहा है इसमें वज्र, त्रिशूल, सैपर पंच, दंड और भद्र शामिल हैं। 

अब भारत ने भी इस तरह के हथियारों को बनाना शुरू कर दिया है ताकि सीमा पर सैनिक बिना गोली चलाए भी अपनी और देश की सुरक्षा कर सकें। भारत पिछले काफी दिनों से सेना में इस्तेमाल होने वाले हथिहार भारत में ही बना रहा है। रक्षा क्षेत्र में काफी हथिहार भारत में बनें हैं। अब मेक इन इंडिया के अभियान को आगे बढ़ाते हुए त्रिशूल, सैपर पंच जैसे हथिहार को उत्तर प्रदेश की एक कंपनी ने तैयार किया है।  उत्तर प्रदेश के नोएडा स्थित कंपनी ने मेक इन इंडिया इनिशिएटिव के तहत भारतीय बलों के लिए इन गैर-घातक हथियारों को विकसित किया है।

इसे भी पढ़ें: T20 विश्वकप: बुमराह-शमी छोड़िए, पाकिस्तान के खिलाफ भारत के यह दो गेंदबाज साबित हो सकते हैं ट्रंप कार्ड 

त्रिशूल: भगवान महादेव शिव का पारंपरिक हथियार माना जाता है। सैनिकों के लिए त्रिशूल को बैटरी की मदद से संचालित किया जाता है और इसमें विद्युत प्रवाह प्रणाली होती है। इसे संचालित करने के लिए सैनिकों को विशेष प्रशिक्षण भी दिया जाएगा।

वज्र: यह बैटरी से चलने वाली धातु की छड़ी है जो दुश्मन को जोरदार झटका देने के लिए विद्युत प्रवाह का निर्वहन करती है। इसमें आगे और पूरे शरीर पर धातु के स्पाइक्स होते हैं जिनका उपयोग दुश्मन के वाहनों और हथियारों को पंचर करने के लिए किया जा सकता है। यह किसी भी शत्रु को कुछ समय के लिए बेहोश भी कर सकता है।

इसे भी पढ़ें: अब चीनी सेना नहीं कर पाएगी LAC पार करने का दुस्साहस, एविएशन ब्रिगेड के जरिए भारत रखेगा हर चाल पर नजर 

सैपर पंच: इसका अर्थ है 'बिजली के दस्ताने'। यह हाथ से हाथ मिलाकर मुकाबला करने का एक हथियार है जो दुश्मन को मुक्का मारने में उपयोगी है। यह 8 घंटे तक चार्ज रहता है और वाटरप्रूफ है और 0 से 30 तापमान में काम कर सकता है।

डंड: यह एक इलेक्ट्रिक स्टिक है जिसे बैटरी की मदद से संचालित किया जाता है। इसमें एक बटन होता है जिसे दूसरे सेफ्टी स्विच की जरूरत होती है। यदि दुश्मन इसे छीनने की कोशिश करता है, तो वह सुरक्षा स्विच के उपयोग के बिना इसे संचालित नहीं कर पाएगा। यह 8 घंटे तक चार्ज भी रह सकता है और वाटरप्रूफ है।

भद्रा: यह एक खास तरह की ढाल होती है जो एक जवान को पत्थर के हमले से बचाती है. ढाल से निकलने वाली रोशनी जहां कुछ समय के लिए दुश्मन को 'अंधा' कर देगी, वहीं ढाल में बहने वाली विद्युत धारा झटका देती है।

एएनआई से बात करते हुए अपेस्टरॉन इंडिया के मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी, मोहित कुमार ने कहा कि उन्हें पिछले साल चीनी सेना के सैनिकों के साथ पूर्वी लद्दाख में आमने-सामने के बाद भारतीय सशस्त्र बलों से गैर-घातक हथियार विकसित करने का अनुरोध मिला था। शारीरिक लड़ाई के दौरान, चीनी सैनिकों ने कथित तौर पर "अनैतिक प्रथाओं" का सहारा लिया, क्योंकि उन्होंने भारतीय सुरक्षा बलों पर हमला करने के लिए नुकीले डंडे, कांटेदार तार वाले क्लब, टसर और पत्थरों का इस्तेमाल किया था।





नोट:कोरोना वायरस से भारत की लड़ाई में हम पूर्ण रूप से सहभागी हैं। इस कठिन समय में अपनी जिम्मेदारी का पूर्णतः पालन करते हुए हमारा हरसंभव प्रयास है कि तथ्यों पर आधारित खबरें ही प्रकाशित हों। हम स्व-अनुशासन में भी हैं और सरकार की ओर से जारी सभी नियमों का पालन भी हमारी पहली प्राथमिकता है।