Prabhasakshi NewsRoom: Mamata Banerjee के राज में जनता से वसूली गयी Cut Money वापस लौटाने लगे TMC नेता

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ग्रामीणों ने मीडिया को बताया कि प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ लेने, जमीन या मकान खरीदने बेचने अथवा व्यापार करने तक के लिए उन्हें कट मनी देनी पड़ती थी। आरोप है कि वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की जीत के बाद यह वसूली और अधिक संगठित तरीके से शुरू हुई।

पश्चिम बंगाल के कूचबिहार जिले के माथाभांगा इलाके से सामने आई घटनाओं ने ममता बनर्जी के शासनकाल में फैले भ्रष्टाचार और कट मनी के खेल की परतें खोल दी हैं। वर्षों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पाने के लिए गरीब ग्रामीणों और छोटे व्यापारियों को स्थानीय दबंगों तथा तृणमूल कांग्रेस से जुड़े लोगों को मोटी रकम देनी पड़ती थी। अब सत्ता परिवर्तन के बाद हालात बदलते दिखाई दे रहे हैं और ग्रामीणों को उनकी मेहनत की कमाई वापस मिलने लगी है। यह घटनाक्रम न केवल पुराने शासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि किस प्रकार आम लोगों का हक छीना गया था।

माथाभांगा के कई ग्रामीणों ने मीडिया को बताया कि प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ लेने, जमीन या मकान खरीदने बेचने अथवा व्यापार करने तक के लिए उन्हें कट मनी देनी पड़ती थी। आरोप है कि वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की जीत के बाद यह वसूली और अधिक संगठित तरीके से शुरू हुई। गरीब परिवारों को धमकाया जाता था कि यदि उन्होंने पैसा नहीं दिया तो उनकी अगली किस्त रोक दी जाएगी। कई लाभार्थियों से पंद्रह हजार से बीस हजार रुपये तक वसूले गए।

अब जब राज्य में भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद माहौल बदला, तो ग्रामीण खुलकर सामने आने लगे हैं। जिन लोगों ने वर्षों तक डर के कारण आवाज नहीं उठाई, वह अब अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कई जगहों पर देखा गया कि कट मनी वसूलने वालों के घर के बाहर ग्रामीणों ने प्रदर्शन किया। कई जगह कट मनी वसूलने वालों से मारपीट की खबरें भी आईं। कई जगह बड़ी मात्रा में नकदी जब्ती की रिपोर्टें भी सामने आईं। इसके बाद दबाव बढ़ने पर कई स्थानीय टीएमसी नेताओं और दबंगों ने कट मनी लौटानी शुरू कर दी है। माथाभांगा के सुभाषपल्ली इलाके में आवास योजना के लाभार्थियों को उनकी रकम वापस मिल गयी है। वहीं पचागढ़ ग्राम पंचायत के फकीरेरकुठी गांव में ग्रामीणों को खुले मैदान में बुलाकर नकद राशि लौटाई गई।

देखा जाये तो यह दृश्य अपने आप में अभूतपूर्व था। गांव के स्कूल मैदान में विशेष सभा बुलाई गई, जहां लोगों को नाम पुकार कर पैसे लौटाए गए। जिन नेताओं पर अवैध वसूली के आरोप लगे, उनमें से कुछ फरार बताए जा रहे हैं। ऐसे मामलों में उनके परिवार के लोग सामने आकर ग्रामीणों को पैसा लौटाते नजर आए। स्थानीय लोगों के अनुसार इलाके के प्रभावशाली नेताओं ने वर्षों में लगभग अस्सी लाख रुपये तक की वसूली की थी। अब जनता के गुस्से और कानूनी कार्रवाई के डर से उन्हें रकम लौटानी पड़ रही है।

एक ग्रामीण ने बताया कि जमीन विवाद सुलझाने के नाम पर उससे भारी रकम ली गई थी, लेकिन कोई काम नहीं हुआ। बाद में जब उसे पता चला कि लोगों को पैसे वापस मिल रहे हैं, तो उसने भी अपना नाम दर्ज कराया और आखिरकार उसे उसकी रकम लौटा दी गई। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि ममता बनर्जी की सत्ता के दौर में बिना पैसे दिए कोई भी काम संभव नहीं था।

इसके अलावा, एक और दृश्य सामने आया है जिसमें माथाभांगा के घुघुमारी इलाके में रिक्शे पर लाउडस्पीकर लगाकर घोषणा की गई कि जिन लोगों ने कट मनी दी थी, वे पंचायत सदस्य के घर पहुंचकर अपनी रकम वापस ले सकते हैं। यह दृश्य राज्य की राजनीति में एक नए बदलाव का संकेत माना जा रहा है। स्थानीय भाजपा नेताओं का कहना है कि अब ग्रामीण डरने की बजाय खुलकर सामने आ रहे हैं और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं।

इसी बीच नदिया जिले से सामने आई एक और घटना ने ममता बनर्जी सरकार के दौरान योजनाओं में हुए भ्रष्टाचार की गंभीरता को उजागर कर दिया है। महिलाओं के लिए चलाई गई लक्ष्मीर भंडार योजना में एक सौ तिहत्तर पुरुषों के नाम लाभार्थियों की सूची में पाए गए। यह योजना केवल महिलाओं के लिए बनाई गई थी, लेकिन जांच में सामने आया कि पुरुषों के नाम पर खाते बनाकर फरवरी से लगातार धन निकाला जा रहा था।

जिला प्रशासन ने इन नामों को सूची से हटाकर जांच शुरू कर दी है। अब यह पता लगाया जा रहा है कि इस पूरे खेल को किस तरह अंजाम दिया गया और कितनी राशि का गबन हुआ। राज्य सरकार ने भी विस्तृत जांच के आदेश दिए हैं और अन्य जिलों में भी पड़ताल शुरू हो गयी है।

भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया है कि लक्ष्मीर भंडार योजना में लाखों फर्जी लाभार्थी शामिल किए गए। उनका कहना है कि महिलाओं के नाम पर चलाई जा रही योजना में पुरुषों का पैसा लेना इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि पूर्ववर्ती शासन में भ्रष्टाचार किस हद तक पहुंच चुका था। यह मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि संगठित घोटाले की ओर संकेत करता है।

बहरहाल, कूचबिहार और नदिया की ये घटनाएं पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत दे रही हैं। जहां पहले सरकारी योजनाओं का लाभ पाने के लिए गरीबों को रिश्वत देनी पड़ती थी, वहीं अब वही लोग अपनी मेहनत की कमाई वापस पा रहे हैं। साथ ही योजनाओं में फर्जी लाभार्थियों का खुलासा यह साबित करता है कि ममता बनर्जी के शासनकाल में भ्रष्टाचार व्यवस्था का हिस्सा बन चुका था। अब जनता खुलकर सवाल पूछ रही है और अपने अधिकारों के लिए सामने आ रही है।

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