First Indian in Space | अंतरिक्ष में दिखे थे 'भगवान' का जवाब देने वाले 'स्पेस हीरो' की अनसुनी कहानी | Matrubhoomi

क्या आप जानते हैं कि पंजाब के पटियाला का रहने वाला एक आम सा लड़का, भारत का पहला अंतरिक्ष यात्री कैसे बना? फाइटर जेट उड़ाने से लेकर अंतरिक्ष में योग करने तक का यह सफर इतना आसान नहीं था। तो अपनी कुर्सी की पेटी बाँध लीजिए... क्योंकि आज हम आपको मातृभूमि में बताने जा रहे हैं भारत के उस जांबाज की दास्तान, जिसने अंतरिक्ष से पूरी दुनिया से कहा था-सारे जहाँ से अच्छा, हिंदोस्ताँ हमारा!
3 अप्रैल 1984... सुबह का धुंधला सा वक्त। सोवियत यूनियन का बाईकनूर कॉस्मोड्रोम। हवा में एक अजीब सी खामोशी थी, लेकिन ज़मीन के नीचे एक बहुत बड़ा तूफान पक रहा था। एक रॉकेट लॉन्च पैड पर आग उगलने को तैयारखड़ा था। लेकिन यह सिर्फ एक रॉकेट नहीं था। यह उड़ान भरने वाला था 100 करोड़ भारतीयों के सपनों, उम्मीदों और एक नए इतिहास को लेकर। इस इतिहास का चेहरा थे—राकेश शर्मा। उस दिन पूरा भारत थम सा गया था। गाँव की चौपालों से लेकर शहर के ड्राइंग रूम तक, लोग टीवी स्क्रीन और रेडियो से चिपके बैठे थे। हर दिल में बस एक ही धड़कन चल रही थी, हर ज़ेहन में बस एक ही सवाल—क्या भारत आज आसमान का सीना चीरकर सितारों तक पहुँचेगा? और फिर... एक धमाका हुआ! धुआँ, आग और एक ज़ोरदार गर्जना! भारत ने इतिहास रच दिया था। राकेश शर्मा अंतरिक्ष में थे! लेकिन क्या आप जानते हैं कि पंजाब के पटियाला का रहने वाला एक आम सा लड़का, भारत का पहला अंतरिक्ष यात्री कैसे बना? फाइटर जेट उड़ाने से लेकर अंतरिक्ष में योग करने तक का यह सफर इतना आसान नहीं था। तो अपनी कुर्सी की पेटी बाँध लीजिए... क्योंकि आज हम आपको मातृभूमि में बताने जा रहे हैं भारत के उस जांबाज की दास्तान, जिसने अंतरिक्ष से पूरी दुनिया से कहा था-सारे जहाँ से अच्छा, हिंदोस्ताँ हमारा!
बचपन से ही मशीनंस और हवाई जहाजों में दिलचस्पी
13 जनवरी 1949 में पटियाला पंजाब के एक मध्यम वर्ग के परिवार में राकेश शर्मा का जन्म हुआ। बचपन से ही उन्हें मशीनंस और हवाई जहाजों में बहुत दिलचस्पी थी। जब भी कोई एरोप्लेन आसमान में उड़ता वो उसे देर तक देखते रहते। उनकी आंखों में एक सपना था आसमान को और करीब से देखने का। स्कूल के दिनों में ही उन्होंने फैसला कर लिया था कि वो पायलट बनेंगे। पढ़ाई के बाद राकेश शर्मा ने इंडियन एयरफोर्स ज्वाइन करने का निर्णय लिया। 1966 में उन्होंने नेशनल डिफेंस एकेडमी में एडमिशन लिया। यहां उन्होंने कठिन मिलिट्री ट्रेनिंग ली। सुबह से लेकर रात तक डिसिप्लिन, फिटनेस और फ्लाइंग की तैयारी चलती थी। कुछ सालों बाद उनका सपना पूरा हुआ। वो इंडियन एयरफोर्स के फाइटर पायलट बन गए। यह उनकी जिंदगी का पहला बड़ा मोड़ था। इंडियन एयरफोर्स में राकेश शर्मा ने कई तरह के एयरक्राफ्ट उड़ाए। उनकी फ्लाइंग स्किल्स बहुत शानदार थी। जल्दी ही उनकी पहचान एक टैलेंटेड पायलट के रूप में होने लगी। 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान उन्होंने देश की सेवा की। उन्होंने कई ऑपरेशनल मिशनंस में भाग लिया। उनकी हिम्मत और प्रोफेशनलिज्म ने सीनियर ऑफिसर्स को बहुत प्रभावित किया। इसी वजह से उन्हें बाद में टेस्ट पायलट के रूप में भी चुना गया।
भारत और सोवियत यूनियन का ज्वाइंट स्पेस मिशन
1980 के दशक में भारत और सोवियत यूनियन ने मिलकर एक जॉइंट स्पेस मिशन की योजना बनाई। लक्ष्य था एक भारतीय को अंतरिक्ष भेजना। इंडियन एयरफोर्स के कई बेहतरीन पायलट्स को सिलेक्शन प्रोसेस के लिए बुलाया गया। फिजिकल टेस्ट्स, मेडिकल एग्जामिनेशंस, साइकोलॉजिकल टेस्ट्स और कठिन इंटरव्यूज। कई राउंड्स के बाद दो नाम फाइनल हुए। राकेश शर्मा और रवश मल्होत्रा। आखिरकार मिशन के लिए राकेश शर्मा को चुना गया। भारत को अपना पहला एस्ट्रोनॉट मिल चुका था। राकेश शर्मा को ट्रेनिंग के लिए सोवियत यूनियन भेजा गया। यहां उन्होंने लगभग 2 साल तक कठिन ट्रेनिंग ली। रूसी भाषा सीखी। जीरो ग्रेविटी सिमुलेशंस किए। इमरजेंसी सर्वाइवल ट्रेनिंग ली। एक्सट्रीम टेंपरेचर में रहने की प्रैक्टिस की। स्पेसक्राफ्ट सिस्टम्स को समझा। यह ट्रेनिंग इतनी कठिन थी कि बहुत कम लोग इसे पूरा कर पाते हैं। लेकिन राकेश शर्मा ने हर चुनौती का सामना किया। 3 अप्रैल 1984 सो यूज़ टी1 स्पेसक्राफ्ट लॉन्च पैड पर तैयार खड़ा था। पूरे भारत की सांसे रुकी हुई थी। काउंटडाउन शुरू हुआ। 10 9 8 और फिर रॉकेट ने आसमान की तरफ उड़ान भर दी। कुछ ही मिनट में राकेश शर्मा अंतरिक्ष में पहुंच गए। इसी के साथ वो अंतरिक्ष में जाने वाले पहले भारतीय बन गए।
इंदिरा गांधी ने किया कॉल
यह सिर्फ उनकी जीत नहीं थी। यह पूरे भारत की जीत थी। राकेश शर्मा ने लगभग आठ दिन अंतरिक्ष में बिताए। उन्होंने कई साइंटिफिक एक्सपेरिमेंट्स किए। स्पेस मेडिसिन पर रिसर्च की, फोटोग्राफी की, अर्थ ऑब्जरवेशन एक्सपेरिमेंट्स किए। उन्होंने अंतरिक्ष से भारत को देखा। वही भारत जिसके लिए करोड़ों लोग सपने देखते हैं और अब एक भारतीय उसे अंतरिक्ष से देख रहा था। मिशन के दौरान भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राकेश शर्मा से वीडियो कॉल पर बात की। उन्होंने एक सवाल पूछा। अंतरिक्ष से भारत कैसा दिखता है? राकेश शर्मा ने मुस्कुरा कर जवाब दिया, सारे जहां से अच्छा यह चार शब्द भारत के इतिहास का हिस्सा बन गए। आज भी जब उनका नाम लिया जाता है, यह जवाब सबके दिल में गूंज उठता है। मिशन सफलता के साथ पूरा हुआ। राकेश शर्मा सुरक्षित धरती पर लौट आए।
हलवा,छोले लेकर अपने साथ अंतरिक्ष में गए थे शर्मा
राकेश शर्मा अपने साथ में हलवा, आलू, छोले, वेजिटेबल पुलाव भी ले गए थे जो कि डीआरडीओ ने तैयार किया था और उन्होंने अपने अंतरिक्ष के दूसरे साथियों को ये सारी चीजें खिलाई थी। राकेश शर्मा को उनकी ट्रेनिंग के दौरान मरने तक की ट्रेनिंग दे दी गई थी। राकेश शर्मा और उनके अंतरिक्षियों को यह साफ-साफ कह दिया गया था कि अगर कुछ गलत होता है तो सोवियत रेस्क्यू टीम उन्हें बचाने बिल्कुल भी नहीं आएगी। उन्हें साइबेरिया के जंगलों में -40° में तीन से चार दिन सर्वाइव करने की ट्रेनिंग दी गई थी। वैसे इस तरह की कठोर ट्रेनिंग बाद में किसी भी इंडियन एस्ट्रोनॉट को नहीं दी गई। राकेश शर्मा जब मिशन कंप्लीट करके वापस धरती पर लौटे तो सारे भारतीयों में बड़ी खुशी की लहर थी।
लोगों ने पूछे रोचक सवाल
राकेश शर्मा जब अंतरिक्ष से अपना मिशन सफलापूर्वक पूरा करके आएं। तब लोगों ने उनसे पूछा क्या अंतरिक्ष पर भगवान दिखाई देते हैं। हालांकि उन्होंने इससे इंकार कर दिया। लेकिन उन्होंने बताया की अंतरिक्ष से पृथ्वी देखने पर किसी भी तरह की सीमा, बॉर्डर या देश नजर नहीं आते हैं। ऊपर से पूरी धरती एक जैसी यानी एक घर की तरह दिखाई देती है।
भारत ने अशोक चक्र से किया सम्मानित
राकेश शर्मा को भारत सरकार द्वारा अशोक चक्र से सम्मानित किया गया जो कि भारत का हाईएस्ट पीस टाइम मिलिट्री अवार्ड है और इसी के साथ में उन्हें हीरो ऑफ द सोवियत यूनियन से भी सम्मानित किया गया। इसी के साथ में रवीश मल्होत्रा को भी भारत सरकार ने कीर्ति चक्र से सम्मानित किया और सोवियत यूनियन ने उन्हें द सोवियत होल्डर ऑफ फ्रेंडशिप ऑफ पीपल अवार्ड दिया। स्पेस मिशन के बाद में राकेश शर्मा ने अपने इंडियन एयरफोर्स के करियर को जारी रखा और वैसे 1987 में वह दूसरी बार स्पेस में जाने वाले थे एज ए कमांडर लेकिन फिर इस मिशन को कैंसिल कर दिया गया क्योंकि यूएसएसआर टूट चुका था और वहीं भारतीय इकोनॉमी भी क्राइसिस में थी। 1987 में राकेश शर्मा ने इंडियन एयरफोर्स से रिटायरमेंट ले लिया।
अब क्या करते हैं राकेश शर्मा
जब वो रिटायर हुए तो वे इंडियन एयरफोर्स में विंग कमांडर की पोस्ट पे थे। इसके बाद में उन्होंने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड में चीफ टेस्ट पायलट के रूप में 2001 तक अपनी सेवा दी और इसके बाद में उन्होंने अपने फ्लाइंग करियर से रिटायरमेंट ले लिया। आज वे तमिलनाडु के एक छोटे से गांव कुन्नूर में अपनी फैमिली के साथ में बड़ी सादगी और शांति से रहते हैं। उन्हें पढ़ना, गोल्फ खेलना, गार्डनिंग करना और ट्रैवलिंग करना बहुत पसंद है। वे अभी भी इसरो के कांटेक्ट में रहते हैं और चंद्रयान 3 में भी उन्होंने सपोर्ट किया था। भारत के गगनयान मिशन के लिए भी वह नेशनल स्पेस एडवाइज़री काउंसिल फॉर गगनयान के मेंबर और वह टाइम अपनी सेवा देते रहते हैं।
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