भारतीय सिनेमा को विश्वपटल पर पहुंचाने वाले पहले फिल्म निर्माता थे महबूब खान

भारतीय सिनेमा को विश्वपटल पर पहुंचाने वाले पहले फिल्म निर्माता थे महबूब खान

महबूब खान भारतीय सिनेमा के एक ऐसे निर्माता-निर्देशक थे, जिन्होंने लगभग तीन दशक तक हिन्दी सिनेमा को एक से बढ़कर एक फिल्में दीं। यह दौर था जब फिल्में बहुत कम बनती थीं, बावजूद इसके महबूब खान ने बतौर निर्माता-निर्देशक फिल्मों में अपने 30 साल के कॅरियर में 24 फिल्में बनाईं।

पुराने दिनों में फिल्मों को जिस तरह एकाग्रचित्त होकर देखा जाता था वह अब नदारद ही दिखता है। याद है वह समय जब बड़े पर्दे पर महबूब खान निर्देशित फिल्म का टाइटल इस शेर के साथ उभरकर आता था ‘‘मुद्दई लाख बुरा चाहे तो क्या होता है, वही होता है जो मंजूर-ए-खुदा होता है’’ और फिर तालियों की गड़गड़ाहट के साथ फिल्म शुरू होती थी, तब फिल्म देखने का जो माहौल बनता था उसकी तो अब सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है।

महबूब खान भारतीय सिनेमा के एक ऐसे निर्माता-निर्देशक थे, जिन्होंने लगभग तीन दशक तक हिन्दी सिनेमा को एक से बढ़कर एक फिल्में दीं। यह दौर था जब फिल्में बहुत कम बनती थीं, बावजूद इसके महबूब खान ने बतौर निर्माता-निर्देशक फिल्मों में अपने 30 साल के कॅरियर में 24 फिल्में बनाईं। फिल्मों में उस समय सामाजिक मान-मर्यादा और उसकी बेहतरी पर ज्यादा फोकस था। महबूब खान निर्देशित फिल्मों में महिलाओं की भूमिका का सदा मान रखा गया। नारी शक्ति की अच्छी पहचान थी उन्हें। यही वजह रही कि अपनी फिल्मों में महबूब साहब ने नायिका को सदा सशक्त दिखाया। 

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महबूब खान का असली नाम रमजान खान था, उनका जन्म 9 सितंबर 1907 को गुजरात के बिलिमोरा शहर में हुआ था। इनके पिता पुलिस कांस्टेबल थे। महबूब खान की पढ़ाई औपचारिक ही हुई, उन्हें फिल्में देखने का बहुत शौक था और वह स्वयं भी फिल्मों में अभिनेता बनना चाहते थे। 16 साल की उम्र में अपने ख्वाब को पूरा करने वह घर से भागकर मुम्बई आ गये थे किन्तु उनके पिता उन्हें वापस घर ले आये। पर, महबूब खान ने तो जैसे ठान लिया था कि फिल्मों में जाना है, कुछ समय पश्चात अपने ही शहर में उनकी मुलाकात एक व्यक्ति नूर मोहम्मद से हुई जो फिल्मों के लिए काम करते थे। नूर मोहम्मद फिल्मों की शूटिंग के लिए घोड़े सप्लाई करते थे, वह महबूब को अपने साथ मुम्बई ले आए। उस समय महबूब खान 23 वर्ष के थे। 

मुम्बई आकर शुरूआत में महबूब खान ने नूर मोहम्मद के तबेले में घोड़ों की नाल ठोकने का काम किया। फिर एक दिन किसी काम से उनका साउथ इंडियन फिल्मों के डायरेक्टर चंद्रशेखर के फिल्म सेट पर जाना हुआ। यहां रुककर उन्होंने फिल्में बनने का पूरा प्रोसेस देखा और डायरेक्टर से कहा कि वह उनके साथ काम करना चाहते हैं। चंद्रशेखर ने उन्हें जूनियर आर्टिस्ट और एक्स्ट्रा वाले रोल के लिए रख लिया फिर यहीं से शुरू हुआ महबूब खान का एक्टिंग कॅरियर। शुरूआत में महबूब खान को सर्पोंटिंग रोल ही मिले। बतौर अभिनेता उनके कॅरियर की शुरुआत 1927 में प्रदर्शित फिल्म ‘अलीबाबा और चालीस चोर’ से हुई जिसमें उन्होंने चालीस चोरों में से एक चोर की भूमिका निभाई थी। यह दौर था जब साइलेंट फिल्में बनती थीं। 

अर्देशिर ईरानी का नाम उस समय बड़े डायरेक्टरों में आता था। महबूब खान जब अर्देशीर से मिले तो उन्होंने अपनी फिल्मों में उन्हें सपोर्टिंग रोल दिया। इंपीरियल फिल्म कंपनी के लिए महबूब खान ने कई भूमिकाएं कीं।

1931 में फिल्म निर्माता अर्देशिर ईरानी पहली बोलती फिल्म आलम आरा बनाने जा रहे थे और वह महबूब खान को इस फिल्म में बतौर नायक लेने वाले थे किन्तु किसी वजह से इस फिल्म में महबूब को यह रोल नहीं मिल पाया और तब महबूब ने अभिनेता बनने का ख्वाब छोड़कर फिल्मों के निर्देशन की ओर रूख किया। वह फिल्म निर्माण कंपनी सागर मूवीटोन से जुड़ गए।

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1935 में महबूब खान को फिल्म अल हिलाल (‘जजमेंट ऑफ अल्लाह’) के निर्देशन का मौका मिला जो अरब और रोम के बीच युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित थी, यह फिल्म दर्शकों को खूब पसंद आई। 1936 में महबूब खान ने ‘मनमोहन’ और 1937 में ‘जागीरदार’ फिल्मों का निर्देशन किया जो बहुत ज्यादा कामयाब फिल्में नहीं रहीं। इसके बाद 1939 में आई महबूब खान की फिल्म ‘एक ही रास्ता’ जो सामाजिक पृष्ठभूमि पर बनी थी, इस फिल्म ने दर्शकों के बीच खूब वाहवाही बटोरी। इस फिल्म की सफलता के बाद महबूब खान हिन्दी सिनेमा में बतौर निर्देशक अपनी जगह बनाने में कामयाब हो गए।

1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण फिल्म इंडस्ट्री को काफी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ा जिसकी वजह से सागर मूवीटोन की आर्थिक स्थिति भी बहुत कमजोर हो गई और उसे बंद करना पड़ा। इसके बाद महबूब खान अपने सहयोगियों के साथ नेशनल स्टूडियो गए, जहां उन्होंने 1940 में ‘औरत’ 1941 में ‘बहन’ और 1942 में ‘रोटी’ जैसी बेहतरीन फिल्मों का निर्देशन किया। नेशनल स्टूडियो में महबूब खान का मन ज्यादा दिन नहीं लगा जिसके बाद उन्होंने अपने खुद के प्रोडक्शन ‘महबूब खान प्रोडक्शन लिमिटेड’ की स्थापना की और इसके बैनर तले उन्होंने 1943 में नजमा, तकदीर और 1945 में हूमायूं फिल्मों का निर्माण किया इसके बाद 1946 में आई उनकी बनाई फिल्म ‘अनमोल घड़ी’ जो एक सुपरहिट फिल्म साबित हुई। इस फिल्म में उन्होंने कलाकार नूरजहां, सुरैया और सुरेंद्र को लिया था जो गायक भी थे। इस फिल्म में संगीतकार थे नौशाद। ‘अनमोल घड़ी’ के गीत ‘आवाज दे कहां है’, ‘आजा मेरी बर्बाद मोहब्बत के सहारे’ और ‘जवां है मोहब्बत’ सुपर हिट गीत रहे जो आज भी बजते, गाये-गुनगुनाये जाते हैं। 

बात करते हैं 1949 में महबूब खान की सुपर कामयाब फिल्म ‘अंदाज’ की। इस फिल्म में दिलीप कुमार, राज कपूर और नर्गिस कलाकार थे। इस फिल्म में दिलीप कुमार और राजकपूर ने पहली और आखिरी बार एक साथ काम किया था। इसके कुछ ही समय बाद 1952 में महबूब खान की एक और महत्वपूर्ण फिल्म ‘आन’ प्रदर्शित हुई जो भारत में बनी पहली टेक्नीकलर फिल्म थी, इस फिल्म को काफ़ी बड़े पैमाने पर बनाया गया था। इस फिल्म में दिलीप कुमार, प्रेमनाथ और नादिरा की भूमिका मुख्य थी। यह फिल्म पहली हिन्दी फिल्म बनी जो सब जगह एक साथ रिलीज की गई। आन एक हिट फिल्म रही। आन की सफलता के बाद 1954 में महबूब खान ने फिल्म ‘अमर’ बनाई जिसमें दिलीप कुमार, मधुबाला और निम्मी ने मुख्य भूमिका निभाई थी।

इसके बाद 1957 में महबूब खान ने हिन्दी सिनेमा को दी अपनी एक जबददस्त हिट फिल्म ‘मदर-इंडिया’, यह फिल्म किसानों की गरीबी, भुखमरी और उन पर होने वाले जमींदारों के जुल्म पर आधारित थी जिसमें मुख्य भूमिका नर्गिस, सुनील दत्त, राजेंद्र कुमार और राज कुमार ने निभाई थी।

मदर इंडिया महबूब खान की फिल्मों में मील का पत्थर साबित हुई। इस फिल्म की कामयाबी ने महबूब खान को देश के गिने-चुने बेहतरीन फिल्म निर्माता के बराबर ला दिया। यह फिल्म एक साल तक थिएटरों में लगी रही। मदर इंडिया में छोटे बिरजू का किरदार बेहद ही दमदार था जिसके लिए महबूब खान ने बड़ी मुश्किल से साजिद को झुग्गियों से ढूंढा था और फिल्म में शूट के दौरान उन्हें साजिद इतना पसंद आया कि उन्होंने उसे गोद ले लिया। 

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फिल्म मदर-इंडिया ने दो राष्ट्रीय पुरस्कार के साथ ही सर्वश्रेष्ठ फिल्म और सर्वश्रेष्ठ डायरेक्शन का फिल्म फेयर अवार्ड जीता। इस फिल्म की कामयाबी भारत तक ही सीमित नहीं रही, इसने हिंदी सिनेमा को सरहदों पार अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहचान दिलाई। ‘मदर इंडिया’ ऑस्कर नॉमिनेट फिल्म साबित हुई। यह फिल्म सबसे करीब से ऑस्कर चूकने वाली फिल्म रही जो आखिरी वक्त पर मात्र एक वोट से पीछे रह गई।  ऑस्कर में इसकी कांटे की टक्कर हॉलीवुड मूवी ‘नाइट्स ऑफ कैबिरिया’ से थी जो विजेता रही।  

‘मदर इंडिया’ के बाद महबूब खान को अमेरिका बुलाया गया जहां हॉलीवुड के कुछ बड़े फिल्मकार उनसे मिलना चाहते थे, उनके साथ फिल्म बनाना चाहते थे। महबूब खान हालांकि अमेरिका गए तो और हॉलीवुड के कुछ डायरेक्टर्स से मिले भी किन्तु उन्हें वहां रास नहीं आया और वह भारत वापस आ गए।  

इसके बाद 1962 में महबूब खान ने फिल्म ‘सन ऑफ इंडिया’ बनाई जो उनके करियर की आखिरी फिल्म साबित हुई, जो पर्दे पर अपनी छाप नहीं छोड़ सकी। 28 मई 1964 को खराब स्वास्थ्य के चलते महबूब खान इस दुनिया को अलविदा कह गए। महान फिल्म निर्माता महबूब खान भले ही अब हमारे बीच नहीं है किन्तु उनकी महान फिल्मों के जरिए उन्हें सदा याद किया जाएगा। आपको बता दें कि वर्ष 2007 में महबूब स्टूडियो में आयोजित एक समारोह में महबूब खान पर एक डाक टिकिट भी जारी किया जा चुका है।

हिंदी सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन लिखते हैँ:  महबूब खान में गजब का आत्मविश्वास था जो किसी बंधन को नहीं मानता था। उन्होंने वह कर दिखाया जो कोई विशेषज्ञ भी न कर सके। सिनेमा के प्रति अपने लगाव के कारण ही वह अंततः महान फिल्म निर्माता बने। 

- अमृता गोस्वामी