हरिवंशराय बच्चन की कविताओं में भावुकता के साथ रस और आनंद भी दिखाई देता है

  •  देवेन्द्रराज सुथार
  •  जनवरी 18, 2021   14:52
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हरिवंशराय बच्चन की कविताओं में भावुकता के साथ रस और आनंद भी दिखाई देता है

मात्र 13 वर्ष की छोटी सी उम्र से हरिवंशराय बच्चन ने लिखना प्रारंभ किया था। एक अध्यापक, कवि, लेखक बच्चन ने अपनी कविता, कहानी, बाल साहित्य, आत्मकथा, रचनावली से बहुत लोकप्रियता हासिल की। 'तेरा हार' बच्चन का प्रथम काव्य-संग्रह है।

हिंदी साहित्य में हालावाद के प्रवर्तक एवं मूर्धन्य कवि हरिवंशराय बच्चन उत्तर छायावाद काल के प्रमुख कवियों में से एक हैं। हाला, प्याला और मधुशाला के प्रतीकों से जो बात इन्होंने कही है, वह हिंदी की सबसे अधिक लोकप्रिय कविताएं स्थापित हुईं। दरअसल उनका वास्तविक नाम हरिवंश श्रीवास्तव था। इनको बाल्यकाल में बच्चन कहा जाता था, जिसका शाब्दिक अर्थ बच्चा या संतान होता है। बाद में वे इसी नाम से मशहूर हुए। बच्चन ने सीधी, सरल भाषा मे साहित्यिक रचना की। 'आत्म परिचय' व 'दिन जल्दी जल्दी ढलता है' इनकी प्रसिद्ध रचनाएं हैं। 'दिन जल्दी जल्दी ढलता है' में उन्होंने मानव जीवन की नश्वरता को स्पष्ट करते हुए दर्शन तत्व को उद्घाटित करने का सार्थक प्रयास किया है। बच्चन मुख्यतः मानव भावना, अनुभूति, प्राणों की ज्वाला तथा जीवन संघर्ष के आत्मनिष्ट कवि हैं। उनकी कविताओं में भावुकता के साथ ही रस और आनंद भी दिखाई देता है। उनके गीतों में बौद्धिक संवेदन के साथ ही गहन अनुभूति भी है। साहित्य शिल्पी बच्चन की कविता सुनकर श्रोता झूमने लगते थे। वे कहा करते थे सच्चा पाठक वही है जो सहृदय हो। विषय और शैली की दृष्टि से स्वाभाविकता बच्चन की कविताओं की विशेषता है। उनकी कविताओं में रूमानियत और कसक है। वहीं गेयता, सरलता, सरसता के कारण इनके काव्य संग्रहों को काफी पसंद किया गया। बच्चन ने सन 1935 से 1940 के बीच व्यापक निराशा के दौर में मध्यम वर्ग के विक्षुब्ध और वेदनाग्रस्त मन को वाणी दी।

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बच्चन का जन्म 27 नवंबर, 1907 में इलाहाबाद से सटे प्रतापगढ़ जिले में एक छोटे से गांव बाबूपट्टी में कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम प्रतापनारायण श्रीवास्तव तथा माता का नाम सरस्वती देवी था। उन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एमए किया और पीएचडी की उपाधि कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से प्राप्त की तथा प्रयाग विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया। कुछ समय तक वे आकाशवाणी के साहित्यिक कार्यक्रमों से भी संबद्ध रहे। उनका विवाह 19 वर्ष की अवस्था में ही श्यामा के साथ हो गया था। सन 1936 में श्यामा की क्षय रोग से अकाल मृत्यु हो गई थी। इसके पांच वर्ष पश्चात 1941 में बच्चन ने तेजी सूरी के साथ प्रेम विवाह किया। तेजी संगीत और रंगमंच से जुड़ी हुई थी। तेजी बच्चन से उन्हें दो पुत्र हुए। अमिताभ एवं अजिताभ। अमिताभ बच्चन हिंदी सिनेमा के एक ख्यातनाम अभिनेता हैं। बच्चन ने आत्मपरकता, निराशा, वेदना जैसे विषयों पर आधारित कविताएं लिखीं। मात्र 13 वर्ष की छोटी सी उम्र से बच्चन ने लिखना प्रारंभ किया था। एक अध्यापक, कवि, लेखक बच्चन ने अपनी कविता, कहानी, बाल साहित्य, आत्मकथा, रचनावली से बहुत लोकप्रियता हासिल की। 'तेरा हार' बच्चन का प्रथम काव्य-संग्रह है पर 1935 में प्रकाशित 'मधुशाला' से बच्चन का नाम एक गगनभेदी रॉकेट की तरह साहित्य जगत पर छा गया। इसी कृति से हिंदी साहित्य में 'हालावाद' का उन्मेष हुआ। यद्यपि हालावाद की उत्पत्ति, विकास और समाप्ति की कहानी बच्चन की तीन पुस्तकों मधुशाला, मधुबाला, मधुकलश में ही सीमित होकर रह गई। इनका प्रकाशन एक-एक वर्ष के अंतराल से हुआ। इनमें बच्चन ने यौवन, सौन्दर्य, और मस्ती के मादक गीत गाए थे। उस समय नवयुवकों में ये अत्यंत लोकप्रिय हुई थी, किंतु हालावाद एक झौंके की तरह आया और लुप्त हो गया। कारण हालावाद का कवि जगत और समाज से तटस्थ था, उसे विश्व से कोई मतलब न था। इस तरह की अनुभूतियों का सामाजिक सरोकारों से कोई लेना-देना नहीं था। इसके बाद निशा-निमंत्रण, एकांत-संगीत, सतरंगिनी, मिलन-यामिनी आदि अनेक काव्य प्रकाशित और लोकप्रिय हुए। आकुल अंतर, हलाहल, प्रणय पत्रिका, बुद्ध और नाचघर उनके अन्य काव्य-संग्रह हैं। इसके अतिरिक्त इन्होंने तीन खण्डों में अपनी आत्मकथा 'क्या भूलूं क्या याद करूं' लिखी। साथ ही उन्होंने अनेक समीक्षात्मक निबंध लिखें और शेक्सपियर के कई नाटकों का अनुवाद भी किया।

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नि:संदेह हिंदी में कवि सम्मेलन परंपरा को सुदृढ़, गरिमापूर्ण, जनप्रिय तथा प्रेरक बनाने में बच्चन का असाधारण योगदान रहा है। उनकी कृति 'दो चट्टानें' को 1968 में हिंदी कविता का साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान हुआ। इसी वर्ष उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार तथा एफ्रो एशियाई सम्मेलन के कमल पुरस्कार से भी नवाजा गया। आत्मकथा 'क्या भूलूं क्या याद करूं' के लिए उन्हें बिड़ला फाउंडेशन ने सरस्वती सम्मान प्रदान किया। सन 1976 में उन्हें भारत सरकार द्वारा साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में 'पद्मभूषण' से नवाजा गया। बच्चन की कविता के साहित्यिक महत्व के बारे में अनेक मत हो सकते हैं और हैं, किंतु उनके काव्य की विलक्षण लोकप्रियता को सभी स्वीकारते हैं। वे हिन्दी के लोकप्रिय कवि रहे हैं और उनकी कृति 'मधुशाला' ने लोकप्रियता के सभी रिकॉर्ड तोड़े हैं। इसका कारण है कि बच्चन ने अपनी कविता के लिए तब जमीन तलाश की, जब पाठक छायावाद की अतीन्द्रिय और अतिवैयक्तिक सूक्ष्मता से उकता रहे थे। उन्होंने सर्वग्राह्य, गेय शैली में संवेदनसिक्त अभिधा के माध्यम से अपनी बात कही तो हिंदी का काव्य रसिक सहसा चौंक पड़ा। उन्होंने सयत्न ऐसा किया हो, ऐसा नहीं है, वे अनायास ही इस राह पर निकल पड़े। उन्होंने काव्य सृजन के लिए अनुभूति से प्रेरणा प्राप्त की तथा अनुभूति को ही काव्यात्मक अभिव्यक्ति देना अपना ध्येय बनाया। उनकी प्रसिद्ध रचना अग्निपथ में वह लिखते हैं- वृक्ष हो भले खड़े, हो घने हो बड़े, एक पत्र छांह भी, मांग मत, मांग मत, मांग मत, अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ। छायावाद के कवि डॉ. बच्चन के व्यक्तित्व व कृतित्व को साधारण लेखक लेखनी में नहीं बांध सकता। कवि ने जीवन के उल्लास में मृत्यु के पार की कल्पना करते हुए भी खूब लिखा- इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा ! हरिवंशराय बच्चन का देहांत 18 जनवरी 2003 में सांस की बीमारी के वजह से मुंबई में हुआ था। 

- देवेन्द्रराज सुथार







पुण्यतिथि विशेषः मैं आजाद हूँ, आजाद रहूँगा और आजाद ही मरूंगा

  •  अमृता गोस्वामी
  •  फरवरी 27, 2021   11:48
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पुण्यतिथि विशेषः मैं आजाद हूँ, आजाद रहूँगा और आजाद ही मरूंगा

चन्द्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को उन्नाव जिले के बदरका कस्बे में हुआ था। पिता का नाम सीताराम तिवारी तथा माता का नाम जगरानी देवी था। चन्द्रशेखर की पढ़ाई की शुरूआत मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले से हुई और बाद में उन्हें वाराणसी की संस्कृत विद्यापीठ में भेजा गया।

“मैं आजाद हूँ, आजाद रहूँगा और आजाद ही मरूंगा” यह नारा था भारत की आजादी के लिए अपनी जान की कुर्बानी देने वाले देश के महान क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद का। मात्र 24 साल की उम्र जो युवाओं के लिए जिंदगी के सपने देखने की होती है उसमें चन्द्रशेखर आजाद अंग्रेजों के खिलाफ लड़ते हुए शहीद हो गए।

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चन्द्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को उन्नाव जिले के बदरका कस्बे में हुआ था। पिता का नाम सीताराम तिवारी तथा माता का नाम जगरानी देवी था। चन्द्रशेखर की पढ़ाई की शुरूआत मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले से हुई और बाद में उन्हें वाराणसी की संस्कृत विद्यापीठ में भेजा गया। आजाद का बचपन आदिवासी इलाकों में बीता था, यहां से उन्होंने भील बालकों के साथ खेलते हुए धनुष बाण चलाना व निशानेबाजी के गुर सीखे थे।

बहुत छोटी मात्र 14-15 साल की उम्र में चन्द्रशेखर आजाद गांधी जी के असहयोग आंदोलन में शामिल हो गए थे। इस आंदोलन से जुड़े बहुत सारे लोगों के साथ चन्द्रशेखर को भी गिरफ्तार कर लिया गया था। गिरफ्तारी के बाद कोड़े खाते हुए बार-बार वे भारत माता की जय का नारा लगाते रहे और जब उनसे उनके पिता नाम पूछा गया तो उन्होंने जवाब दिया था कि मेरा नाम आजाद है, मेरे पिता का नाम स्वतंत्रता और पता जेल है और तभी से उनका नाम चंद्रशेखर सीताराम तिवारी की जगह चंद्रशेखर आजाद बोला जाने लगा। इस गिरफ्तारी के बाद आजाद ने ब्रिटिशों से कहा था कि अब तुम मुझे कभी नहीं पकड़ पाओगे।

एक घटना याद आ रही है। ब्रिटिश पुलिस से बचने के लिए एक बार जब चन्द्रशेखर अपने एक मित्र के घर छुपे हुए थे। उस समय गुप्तचरों से सूचना मिलने पर ब्रिटिश पुलिस वहां पहुंच गई। चन्द्रशेखर के मित्र ने पुलिस से कहा कि चन्द्रशेखर यहां नहीं है पर पुलिस नहीं मानी और घर की तलाशी के लिए दबाव डालने लगी तो मित्र की पत्नी ने चन्द्रशेखर आजाद को एक देहाती धोती और अंगरखा पहनने को दिया और सिर पर साफा बंधवा दिया। वह टोकरे में कुछ अनाज तथा तिल के लड्डुओं को लेकर अपने पति से बोली-सुनो जी, मैं जरा अड़ोस-पड़ोस में लड्डू बांटकर आती हूं, तुम घर का ध्यान रखना और फिर ब्रिटिश पुलिस के सामने वह चन्द्रशेखर से बोली- अरे वज्र मूर्ख, तू क्या यहीं बैठा रहेगा। यह लड्डुओं की टोकरी अपने सिर पर रख और मेरे साथ चल। चन्द्रशेखर ने तुरंत सिर पर टोकरी उठाई और पुलिस को चकमा देकर मित्र की पत्नी के साथ किसान के भेष में घर से बाहर निकल गए। थोड़ा दूर पहुंचकर चन्द्रशेखर न लड्डुओं व अनाज से भरे टोकरे को एक मंदिर की सीढ़ियों पर रखा और मित्र की पत्नी को धन्यवाद देकर वहां से चले गए।

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आजाद ने देश की स्वतंत्रता के लिए भगत सिंह के साथ मिलकर भी अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिए थे।

कहते हैं जैसा नाम वैसा काम। चन्द्रशेखर ने अपने नाम के आगे आजाद लगाया था और वे मरते दम तक आजाद ही रहे। एक बार इलाहाबाद में उनके होने की सूचना मिलने पर ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें और उनके सहकर्मियों को चारों तरफ से घेर लिया था। अपने साथियों सहित स्वयं का बचाव करते हुए आजाद ने कई पुलिसकर्मियों पर गोलियां चलाईं और जब उनकी पिस्तौल में अंतिम गोली बची वे स्वयं भी पूरी तरह से घायल हो चुके थे। बचने का कोई रास्ता न दिखा तो ब्रिटिशों के हाथ लगने से पहले ही आजाद ने बची अन्तिम गोली खुद पर चला ली। यह घटना फरवरी 27, 1931 की है जो इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में घटी थी। चंद्रशेखर आजाद की पिस्तौल को आज भी इलाहाबाद म्यूजियम में देखा जा सकता है।

आजादी के बाद अल्फ्रेड पार्क का नाम बदलकर चंद्रशेखर आजाद पार्क रख दिया गया। चन्द्रशेखर आजाद का बलिदान लोग आज भी भूले नहीं हैं। कई स्कूलों, कॉलेजों, रास्तों व सामाजिक संस्थाओं के नाम उन्हीं के नाम पर रखे गये हैं तथा भारत में कई फिल्में भी उनके नाम पर बनी हैं।  

अमृता गोस्वामी







संत रविदास ने समाज में फैली तमाम बुराइयों के खिलाफ पुरजोर आवाज उठाई थी

  •  योगेश कुमार गोयल
  •  फरवरी 27, 2021   11:37
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संत रविदास ने समाज में फैली तमाम बुराइयों के खिलाफ पुरजोर आवाज उठाई थी

संत रविदास को ‘रैदास’ के नाम से भी जाना जाता है। वे गंगा मैया के अनन्य भक्त थे। संत रविदास को लेकर ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ कहावत बहुत प्रचलित है। इस कहावत का संबंध संत रविदास की महिमा को परिलक्षित करता है।

समस्त भारतीय समाज को भेदभाव से ऊपर उठकर मानवता और भाईचारे की सीख देने वाले 15वीं सदी के महान् समाज सुधारक संत रविदास का जन्म वाराणसी के गोवर्धनपुर गांव में माघ पूर्णिमा के दिन हुआ था। इसीलिए प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा के ही दिन उनकी जयंती मनाई जाती है। इस वर्ष माघ पूर्णिमा 27 फरवरी को है, इसीलिए इसी दिन संत रविदास जयंती मनाई जा रही है। महान् संत, समाज सुधारक, साधक और कवि रविदास ने जीवन पर्यन्त छुआछूत जैसी कुरीतियों का विरोध करते हुए समाज में फैली तमाम बुराइयों के खिलाफ पुरजोर आवाज उठाई और उन कुरीतियों के खिलाफ निरन्तर कार्य करते रहे। उनका जन्म ऐसे विकट समय में हुआ था, जब समाज में घोर अंधविश्वास, कुप्रथाओं, अन्याय और अत्याचार का बोलबाला था, धार्मिक कट्टपंथता चरम पर थी, मानवता कराह रही थी। उस जमाने में मध्यमवर्गीय समाज के लोग कथित निम्न जातियों के लोगों का शोषण किया करते थे। ऐसे विकट समय में समाज सुधार की बात करना तो दूर की बात, उसके बारे में सोचना भी मुश्किल था लेकिन जूते बनाने का कार्य करने वाले संत रविदास ने आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित करने के लिए समाधि, ध्यान और योग के मार्ग को अपनाते हुए असीम ज्ञान प्राप्त किया और अपने इसी ज्ञान के जरिये पीडि़त समाज एवं दीन-दुखियों की सेवा कार्य में जुट गए। उन्होंने अपनी सिद्धियों के जरिये समाज में व्याप्त आडम्बरों, अज्ञानता, झूठ, मक्कारी और अधार्मिकता का भंडाफोड़ करते हुए समाज को जागृत करने और नई दिशा देने का प्रयास किया।

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संत रविदास को ‘रैदास’ के नाम से भी जाना जाता है। वे गंगा मैया के अनन्य भक्त थे। संत रविदास को लेकर ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ कहावत बहुत प्रचलित है। इस कहावत का संबंध संत रविदास की महिमा को परिलक्षित करता है। वे जूते बनाने का कार्य किया करते थे और इस कार्य से उन्हें जो भी कमाई होती, उससे वे संतों की सेवा किया करते और उसके बाद जो कुछ बचता, उसी से परिवार का निर्वाह करते थे। एक दिन रविदास जूते बनाने में व्यस्त थे कि तभी उनके पास एक ब्राह्मण आया और उनसे कहा कि मेरे जूते टूट गए हैं, इन्हें ठीक कर दो। रविदास उनके जूते ठीक करने लगे और उसी दौरान उन्होंने ब्राह्मण से पूछ लिया कि वे कहां जा रहे हैं? ब्राह्मण ने जवाब दिया, ‘‘मैं गंगा स्नान करने जा रहा हूं पर चमड़े का काम करने वाले तुम क्या जानो कि इससे कितना पुण्य मिलता है!’’ इस पर रविदास जी ने कहा कि आप सही कह रहे हैं ब्राह्मण देवता, हम नीच और मलिन लोगों के गंगा स्नान करने से गंगा अपवित्र हो जाएगी। जूते ठीक होने के बाद ब्राह्मण ने उसके बदले उन्हें एक कौड़ी मूल्य देने का प्रयास किया तो संत रविदास ने कहा कि इस कौड़ी को आप मेरी ओर से गंगा मैया को ‘रविदास की भेंट’ कहकर अर्पित कर देना।

ब्राह्मण गंगाजी पहुंचा और स्नान करने के पश्चात् जैसे ही उसने रविदास द्वारा दी गई मुद्रा यह कहते हुए गंगा में अर्पित करने का प्रयास किया कि गंगा मैया रविदास की यह भेंट स्वीकार करो, तभी जल में से स्वयं गंगा मैया ने अपना हाथ निकालकर ब्राह्मण से वह मुद्रा ले ली और मुद्रा के बदले ब्राह्मण को एक सोने का कंगन देते हुए वह कंगन रविदास को देने का कहा। सोने का रत्न जडि़त अत्यंत सुंदर कंगन देखकर ब्राह्मण के मन में लालच आ गया और उसने विचार किया कि घर पहुंचकर वह यह कंगन अपनी पत्नी को देगा, जिसे पाकर वह बेहद खुश हो जाएगी। पत्नी ने जब वह कंगन देखा तो उसने सुझाव दिया कि क्यों न रत्न जडि़त यह कंगन राजा को भेंट कर दिया जाए, जिसके बदले वे प्रसन्न होकर हमें मालामाल कर देंगे। पत्नी की बात सुनकर ब्राह्मण राजदरबार पहुंचा और कंगन राजा को भेंट किया तो राजा ने ढ़ेर सारी मुद्राएं देकर उसकी झोली भर दी। राजा ने प्रेमपूर्वक वह कंगन अपनी महारानी के हाथ में पहनाया तो महारानी इतना सुंदर कंगन पाकर इतनी खुश हुई कि उसने राजा से दूसरे हाथ के लिए भी वैसे ही कंगन की मांग की।

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राजा ने अगले ही दिन ब्राह्मण को दरबार बुलाया और उसे वैसा ही एक और कंगन लाने का आदेश देते हुए कहा कि अगर उसने तीन दिन में कंगन लाकर नहीं दिया तो वह दंड का पात्र बनेगा। राजाज्ञा सुनकर बेचारे ब्राह्मण के होश उड़ गए। वह गहरी सोच में डूब गया कि आखिर दूसरा कंगन वो कहां से लाएगा? उसे जब और कोई रास्ता नहीं सूझा तो उसने निश्चय किया कि वह संत रविदास के पास जाकर उन्हें सारे वाकये की जानकारी देगा कि कैसे गंगा मैया ने स्वयं यह कंगन उसे उन्हें देने के लिए दिया था, जो उसने लोभवश अपने पास रख लिया। अंततः यही सोचकर वह रविदास जी की कुटिया में जा पहुंचा। रविदास उस समय प्रभु का स्मरण कर रहे थे। ब्राह्मण ने जब उन्हें सारे वृत्तांत की विस्तृत जानकारी दी तो रविदास जी ने उनसे नाराज हुए बगैर कहा कि तुमने मन के लालच के कारण कंगन अपने पास रख लिया, इसका पछतावा मत करो। रही बात राजा को देने के लिए दूसरे कंगन की तो तुम उसकी चिंता भी मत करो, गंगा मैया तुम्हारे मान-सम्मान की रक्षा करेंगी। यह कहते हुए उन्होंने अपनी वह कठौती (चमड़ा भिगोने के लिए पानी से भरा पात्र) उठाई, जिसमें पानी भरा हुआ था और जैसे ही गंगा मैया का आव्हान करते हुए अपनी कठौती से जल छिड़का, गंगा मैया वहां प्रकट हुई और रविदास जी के आग्रह पर उन्होंने रत्न जडि़त एक और कंगन उस ब्राह्मण को दे दिया। इस प्रकार खुश होकर ब्राह्मण राजा को कंगन भेंट करने चला गया और रविदास जी ने उसे अपने बड़प्पन का जरा भी अहसास नहीं होने दिया। ऐसे थे महान संत रविदास जी, जिनकी आज हम जयंती मना रहे हैं।

योगेश कुमार गोयल

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं तथा 31 वर्षों से साहित्य एवं पत्रकारिता में सक्रिय हैं)







सावरकर अकेले स्वातंत्र्य योद्धा थे जिन्हें दो-दो आजीवन कारावास की सजा मिली

  •  डॉ. पवन सिंह मलिक
  •  फरवरी 26, 2021   11:13
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सावरकर अकेले स्वातंत्र्य योद्धा थे जिन्हें दो-दो आजीवन कारावास की सजा मिली

सावरकर का जीवन आज भी युवाओं में प्रेरणा भर देता है। जिसे सुनकर प्रत्येक देशभक्त युवा के रोंगटे खड़े हो जाते है। विनायक की वाणी में प्रेरक ऊर्जा थी। उसमें दूसरों का जीवन बदलने की शक्ति थी। सावरकर से शिक्षा-दीक्षा पाकर अनेकों युवा व्यायामशाला जाने लगे, पुस्तकें पढ़ने लगे।

"मैं तुम्हारे दर्शन करने आया हूँ मदन, मुझे तुम पर गर्व है. सावरकर तुम्हें मेरी आँखों में डर की परछाई तो नहीं दिखाई दे रही, बिल्कुल नहीं मुझे तुम्हारे चेहरे पर योगेश्वर कृष्ण का तेज दिखाई दे रहा है, तुमने गीता के स्थितप्रज्ञ को साकार कर दिया है मदन" न जाने ऐसे कितने ही जीवन है जो सावरकर से प्रेरणा प्राप्त कर मातृभूमि के लिए हस्ते हस्ते बलिदान हो गए। अपने महापुरुषों का स्मरण व सदैव उनके गुणों को आत्मसात करते हुए आगे बढ़ते रहना, यही भारत की श्रेष्ठ परंपरा है। ऐसे ही अकल्पनीय व अनुकरणीय जीवन को याद करने का दिन है सावरकर पुण्यतिथि।

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यहाँ दीप नहीं जीवन जलते हैं 

स्वातंत्र्य विनायक दामोदर सावरकर केवल नाम नहीं, एक प्रेरणा पुंज है जो आज भी देशभक्ति के पथ पर चलने वाले मतवालों के लिए जितने प्रासंगिक हैं उतने ही प्रेरणादायी भी। वीर सावरकर अदम्य साहस, इस मातृभूमि के प्रति निश्छल प्रेम करने वाले व स्वाधीनता के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर करने वाला अविस्मरणीय नाम है। इंग्लैंड में भारतीय स्वाधीनता हेतु अथक प्रवास, बंदी होने पर भी अथाह समुद्र में छलांग लगाने का अनोखा साहस, कोल्हू में बैल की भांति जोते जाने पर भी प्रसन्ता, देश के लिए परिवार की भी बाजी लगा देना, पल-प्रतिपल देश की स्वाधीनता का चिंतन व मनन, अपनी लेखनी के माध्यम से आमजन में देशभक्ति के प्राण का संचार करना, ऐसा अदभुत व्यक्तित्व था विनायक सावरकर का। सावरकर ने अपने नजरबंदी समय में अंग्रेजी व मराठी अनेक मौलिक ग्रंथों की रचना की, जिसमें मैजिनी, 1857 स्वातंत्र्य समर, मेरी कारावास कहानी, हिंदुत्व आदि प्रमुख है।

सर्वत्र प्रथम कीर्तिमान रचने वाले सावरकर 

सावरकर दुनिया के अकेले स्वातंत्र्य योद्धा थे जिन्हें दो-दो आजीवन कारावास की सजा मिली, सजा को पूरा किया और फिर से राष्ट्र जीवन में सक्रिय हो गए। वे विश्व के ऐसे पहले लेखक थे जिनकी कृति 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को दो-दो देशों ने प्रकाशन से पहले ही प्रतिबंधित कर दिया। सावरकर पहले ऐसे भारतीय राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने सर्वप्रथम विदेशी वस्त्रों की होली जलाई। वे पहले स्नातक थे जिनकी स्नातक की उपाधि को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण अंग्रेज सरकार ने वापस ले लिया। वीर सावरकर पहले ऐसे भारतीय विद्यार्थी थे जिन्होंने इंग्लैंड के राजा के प्रति वफादारी की शपथ लेने से मना कर दिया। फलस्वरूप उन्हें वकालत करने से रोक दिया गया। वीर सावरकर ने राष्ट्र ध्वज तिरंगे के बीच में धर्म चक्र लगाने का सुझाव सर्वप्रथम दिया था, जिसे तात्कालिक राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने माना। उन्होंने ही सबसे पहले पूर्ण स्वतंत्रता को भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का लक्ष्य घोषित किया। वे ऐसे प्रथम राजनैतिक बंदी थे जिन्हें विदेशी (फ्रांस) भूमि पर बंदी बनाने के कारण हेग के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में मामला पहुँचा। वे पहले क्रांतिकारी थे जिन्होंने राष्ट्र के सर्वांगीण विकास का चिंतन किया तथा बंदी जीवन समाप्त होते ही जिन्होंने अस्पृश्यता आदि कुरीतियों के विरुद्ध आंदोलन शुरू किया। दुनिया के वे ऐसे पहले कवि थे जिन्होंने अंदमान के एकांत कारावास में जेल की दीवारों पर कील और कोयले से कविताएँ लिखीं और फिर उन्हें याद किया। इस प्रकार याद की हुई दस हजार पंक्तियों को उन्होंने जेल से छूटने के बाद पुन: लिखा।

काल कोठरी के ग्यारह साल व सावरकर

क्या मैं अब अपनी प्यारी मातृभूमि के पुनः दर्शन कर सकूंगा? 4 जुलाई 1911 में अंदमान के सेलुलर जेल में पहुँचने से पहले सावरकर के मन की व्यथा शायद कुछ ऐसी ही रही होगी। अंदमान की उस काल कोठरी में सावरकर को न जाने कितनी ही शारीरिक यातनाएं सहनी पड़ी होगी, इसको शब्दों में बता पाना असंभव है। अनेक वर्षो तक रस्सी कूटने, कोल्हू में बैल की तरह जुत कर तेल निकालना, हाथों में हथकड़ियां पहने हुए घंटों टंगे रहना, महीनों एकांत काल-कोठरी में रहना और भी न जाने किसी-किस प्रकार के असहनीय कष्ट झेलने पड़े होंगे सावरकर को। लेकिन ये शारीरिक कष्ट भी कभी उस अदम्य साहस के प्रयाय बन चुके विनायक सावरकर को प्रभावित न कर सके. कारावास में रहते हुए भी सावरकर सदा सक्रिय बने रहे। कभी वो राजबंदियों के विषय में निरंतर आंदोलन करते, कभी पत्र द्वारा अपने भाई को आंदोलन की प्रेरणा देते, कभी अपनी सजाएँ समाप्त कर स्वदेश लौटने वाले क्रांतिवीरों को अपनी कविताएं व संदेश कंठस्थ करवाते। इस प्रकार सावरकर सदैव अपने कर्तव्यपथ पर अग्रसर दिखाई दिए। उनकी अनेक कविताएं व लेख अंदमान की उन दीवारों को लांघ कर 600 मील की दूरी पार करके भारत पहुँचते रहे और समाचार पत्रों द्वारा जनता में देशभक्ति की अलख जगाते रहे।

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समरसता व हिंदुत्व के पुरोधा 

सन् 1921 में सावरकर को अंदमान से कलकत्ता बुलाना पड़ा। वहां उन्हें रत्नागिरी जेल भेज दिया गया। 1924 को सावरकर को जेल से मुक्त कर रत्नागिरी में ही स्थानबद्ध कर दिया गया। उन्हें केवल रत्नागिरी में ही घूमने-फिरने की स्वतंत्रता थी। इसी समय में सावरकर ने हिंदू संगठन व समरसता का कार्य प्रारम्भ कर दिया। महाराष्ट्र के इस प्रदेश में छुआछूत को लेकर घूम-घूमकर विभिन्न स्थानों पर व्याख्यान देकर धार्मिक, सामाजिक तथा राजनैतिक दृष्टि से छुआछूत को हटाने की आवश्यकता बतलाई। सावरकर के प्रेरणादायी व्याख्यान व तर्कपूर्ण दलीलों से लोग इस आंदोलन में उनके साथ हो लिए। दलितों में अपने को हीन समझने की भावना धीरे-धीरे जाती रही और वो भी इस समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा है ऐसा गर्व का भाव जागृत होना शुरू हो गया। सावरकर की प्रेरणा से भागोजी नामक एक व्यक्ति ने ढाई लाख रूपए व्यय करके रत्नागिरी में ‘श्री पतित पावन मंदिर' का निर्माण करवाया। दूसरी और सावरकर ने ईसाई पादरियों और मुसलमानों द्वारा भोले भाले हिंदुओं को बहकाकर किये जा रहे धर्मांतरण के विरोध में शुद्धि आंदोलन प्रारम्भ कर दिया। रत्नागिरी में उन्होंने लगभग 350 धर्म- भ्रष्ट हिंदुओं को पुनः हिंदू धर्म में दीक्षित किया।      

युवाओं के सावरकर 

सावरकर का जीवन आज भी युवाओं में प्रेरणा भर देता है। जिसे सुनकर प्रत्येक देशभक्त युवा के रोंगटे खड़े हो जाते है। विनायक की वाणी में प्रेरक ऊर्जा थी। उसमें दूसरों का जीवन बदलने की शक्ति थी। सावरकर से शिक्षा-दीक्षा पाकर अनेकों युवा व्यायामशाला जाने लगे, पुस्तकें पढ़ने लगे। विनायक के विचारों से प्रभावित असंख्य युवाओं के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आ गया। जो भोग-विलासी थे, वे त्यागी बन गए। जो उदास तथा आलसी थे, वे उद्यमी हो गए। जो संकुचित और स्वार्थी थे, वो परोपकारी हो गए। जो केवल अपने परिवार में डूबे हुए थे, वे देश-धर्म के संबंध में विचार करने लगे। इस प्रकार हम कह सकते है कि युवाओं के लिए सावरकर वो पारस पत्थर थे, की जो भी उनके संपर्क में आया वो ही इस मातृभूमि की सेवा में लग गया। सावरकर स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए व उसके बाद भी उसकी रक्षा हेतु प्रयास करते रहे। इसलिए उनका नाम 'स्वातंत्र्य सावरकर' अमर हुआ. तो आइये, आज वीर सावरकर पुण्यतिथि प्रसंग पर उस हुतात्मा से अभिभूत होकर, उनके जीवन मूल्यों को अपने आचरण द्वारा सत्य प्रमाणित करने का संकल्प करें।   

-डॉ. पवन सिंह मलिक

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल में वरिष्ठ  सहायक प्राध्यापक है)







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