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शख्सियत

तमाम व्यस्तताओं के बावजूद माँ के साथ बैठने का समय जरूर निकालते थे शास्त्रीजी

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Publish Date: Oct 2 2018 10:08AM

तमाम व्यस्तताओं के बावजूद माँ के साथ बैठने का समय जरूर निकालते थे शास्त्रीजी
Image Source: Google
देश के दूसरे प्रधानमंत्री रहे स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री अपनी सारी व्यस्तताओं के बावजूद अपनी मां के साथ कुछ पल बिताना नहीं भूलते थे और बाहर से चाहे वे कितना ही थक कर आयें अगर मां आवाज देती थीं तो वह उनके पास जाकर जरूर बैठते थे। लाल बहादुर शास्त्री पर उनके पुत्र सुनील शास्त्री द्वारा लिखी पुस्तक ‘‘लाल बहादुर शास्त्री, मेरे बाबूजी’’ में बताया गया है कि शास्त्री जी की मां उनके कदमों की आहट से उनको पहचान लेती थीं और बड़े प्यार से धीमी आवाज में कहती थीं.. ‘‘नन्हें, तुम आ गये?’’ सुनील शास्त्री ने कहा कि आज की पीढ़ी जहां अपने बुजुर्गों की उपेक्षा करती है और आमतौर पर बुजुर्गों की शिकायत रहती है कि उनकी संतान उनकी अवहेलना करती है वहीं शास्त्री जी अपनी सभी व्यस्तताओं के बावजूद मां की कभी अनदेखी नहीं करते थे।
 
किताब के अनुसार शास्त्री जी ‘‘चाहे कितनी ही परेशानियों से लदे हुए आये हों, मां की आवाज सुनते ही उनके कदम उस कमरे की तरफ मुड़ जाते थे, जहां उनकी मां की खाट पड़ी थी।’’ पुस्तक में लेखक ने लिखा है कि ‘‘सारी उलझनों के बावजूद वे पांच एक मिनट अपनी मां की खाट पर जा बैठते। मैं देखता, दादी का अपने बेटे के मुंह पर, सिर पर प्यार से हाथ फेरना और भारत के प्रधानमंत्री, हजार तरह की देशी, अंतरदेशी परेशानियों से जूझते जूझते अपनी मां के श्रीचरणों में स्नेहिल प्यार में लोट पोट।’’
 
अधिकतर देखने में आता है कि 60 वर्ष या इससे ज्यादा की उम्र वाली आबादी के लगभग 31 प्रतिशत बुजु्र्गों को अपने परिवार के सदस्यों की उपेक्षा, अपमान और गाली गलौज झेलना पड़ता है और पांच में से एक बुजुर्ग परिवार का साथ तलाश रहा है। पुस्तक के अनुसार शास्त्री जी की मां रामदुलारी 1966 में शास्त्री जी के निधन के बाद नौ माह तक जीवित रहीं और इस पूरे समय उनकी फोटो सामने रख उसी प्यार एवं स्नेह से उन्हें चूमती रहती थीं, मानों वह अपने बेटे को चूम रही हों। सुनील शास्त्री के अनुसार उनकी दादी कहती थीं.. ‘‘इस नन्हें ने जन्म से पहले नौ महीने पेट में आ बड़ी तकलीफ दी और नहीं जानती थी कि वह इस दुनिया से कूच कर मुझे नौ महीने फिर सतायेगा।’’
 
किताब के अनुसार शास्त्री जी के निधन के ठीक नौ माह बाद उनकी माता का निधन हो गया था। लेखक लिखते हैं, ‘‘दादी का प्राणांत बाबूजी के दिवंगत होने के ठीक नौ महीने बाद हुआ। पता नहीं कैसे दादी को मालूम था कि नौ महीने बाद ही उनकी मृत्यु होगी।’’ वर्ष 1965 में भारत पाकिस्तान युद्ध के बाद शास्त्री जी दोनों देशों में संधि के लिये बातचीत करने ताशकंद गये थे और वहीं 11 जनवरी 1966 को उनका निधन हो गया था।

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