संतूर को शास्त्रीय गौरव और वैश्विक पहचान दिलाने वाली शख्सियत थे पंडित शिवकुमार शर्मा

संतूर को शास्त्रीय गौरव और वैश्विक पहचान दिलाने वाली शख्सियत थे पंडित शिवकुमार शर्मा
Prabhasakshi

जम्मू-कश्मीर के मामूली पहचान वाले पारंपरिक वाद्ययंत्र संतूर पर जब शर्मा ने तार छेड़े तो इसे वैश्विक पहचान के साथ ही शास्त्रीय गौरव भी प्राप्त हुआ। वह भारत के जानेमाने शास्त्रीय संगीतकारों में से एक थे जिन्होंने फिल्मों में भी संगीत दिया था।

संतूर को विश्व भर में पहचान दिलाने वाले विख्यात संतूर वादक और संगीतकार पंडित शिवकुमार शर्मा ने महज पांच वर्ष की आयु में तबला वादक के तौर पर संगीत की दुनिया में कदम रखा और जल्द ही उन्होंने संतूर को साधना के रूप में अपनाया और फिर सुरों के सफर में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। शिवकुमार शर्मा का 10 मई की सुबह दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वह 83 वर्ष के थे। वह भारत के जानेमाने शास्त्रीय संगीतकारों में से एक थे जिन्होंने फिल्मों में भी संगीत दिया था।

इसे भी पढ़ें: कैफ़ी आज़मी ने 11 साल की उम्र में लिखी थी पहली ग़ज़ल

जम्मू-कश्मीर के मामूली पहचान वाले पारंपरिक वाद्ययंत्र संतूर पर जब शर्मा ने तार छेड़े तो इसे वैश्विक पहचान के साथ ही शास्त्रीय गौरव भी प्राप्त हुआ। वह भारत के जानेमाने शास्त्रीय संगीतकारों में से एक थे जिन्होंने फिल्मों में भी संगीत दिया था। यहां तक कि फिल्मी दुनिया के जरिये भी पूरी दुनिया में फैले दिग्गज संगीतकार के प्रशंसकों ने इसका लुत्फ उठाया। बांसुरी वादक पंडित हरि प्रसाद चौरसिया के साथ शर्मा की जोड़ी को ‘शिव-हरि’ का नाम दिया गया था। इस जोड़ी ने “सिलसिला”, “लम्हे” और “चांदनी” जैसी कई फिल्मों में संगीत दिया, जिसे काफी पसंद किया गया। जम्मू के निवासी और बनारस घराने से संबंध रखने वाले संगीतकार पंडित उमा दत्त शर्मा के इकलौते बेटे शिवकुमार शर्मा का जन्म के बाद से संगीत से नाता रहा। शर्मा जब सिर्फ पांच साल के थे, तब उनके पिता ने उन्हें तबला वादन के गुर सिखाने शुरू किए।

लेखिका इना पुरी द्वारा लिखी गई शर्मा की आत्मकथा जर्नी विद हंडरेड स्ट्रिंग्स: माइ लाइफ इन म्यूजिक में कहा गया, जब वह 14 वर्ष के थे, तो एक दिन उनके पिता श्रीनगर से संतूर लेकर लौटे और घोषणा की कि उन्होंने अपने बेटे का वास्तविक पेशा खोज लिया है। इस पुस्तक के सह-लेखक शिवकुमार शर्मा ने आत्मकथा में कहा, वह मेरे पिता थे जोकि हमारे घर में संगीत लेकर आये थे। उनसे पहले, मेरे दादाजी जम्मू एवं कश्मीर के महाराजा राजा प्रताप सिंह के शाही मंदिर में राजपुरोहित थे। एक युवा संगीतकार के लिए ये बेहद जोखिम भरा था कि वह तबला वादन के गुर बीच में ही छोड़कर इसकी अपेक्षा काफी कम पहचाने जाने वाले वाद्ययंत्र पर ध्यान केंद्रित करे।

इसे भी पढ़ें: दादा साहब फाल्के ने रखी थी, भारत में सिनमा की नींव

शुरुआती दौर में आलोचकों ने शास्त्रीय संगीत के लिए संतूर को उपयुक्त करार नहीं दिया, हालांकि, दृढ़ संकल्प वाले शर्मा ने अपनी प्रतिभा के बल पर संतूर को शास्त्रीय प्रस्तुतियों का एक महत्वपूर्ण घटक बना दिया। वर्ष 2013 में राज्यसभा टीवी के शो शख्सियत में साक्षात्कार के दौरान शर्मा ने पुरानी यादों को ताजा करते हुए कहा था, जब मैं सात-आठ साल का था, तब मैंने रेडियो पर बाल कार्यक्रमों के लिए तबला वादन शुरू किया। एक दिन मेरे पिता ने कहा कि मैं आपको यह वाद्ययंत्र (संतूर) सिखाना चाहता हूं। मैंना सोचा कि मुझे यह वाद्ययंत्र क्यों बजाना चाहिए? हालांकि, जब मैंने संतूर बजाना शुरू किया तो रागदारी और तबला का ज्ञान होने का लाभ मुझे मिला।