मायावती से शुरू से ही गठबंधन चाहते थे अखिलेश, इसीलिए घोटालों की जाँच रुकवा दी थी

By संजय सक्सेना | Publish Date: Feb 5 2019 12:47PM
मायावती से शुरू से ही गठबंधन चाहते थे अखिलेश, इसीलिए घोटालों की जाँच रुकवा दी थी
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अखिलेश सरकार ने 2012 में सत्ता हासिल करने के बाद 2014 के लोकसभा चुनाव के पूर्व तक मायावती के भ्रष्टाचार के खिलाफ जो भी जांच बैठाई थीं, 2014 के बाद उसकी धार को उन्हीं के द्वारा कुंद भी कर दिया गया।

समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच गठबंधन भले ही अब हुआ हो लेकिन अखिलेश के दिमाग में गठबंधन का 'कीड़ा' 2014 के बाद (नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही) से ही बिलबिलाने लगा था। पूर्व में दिए गए उनके कुछ बयान इस बात की ताकीद करते थे। इसीलिए सीएम की कुर्सी पर बैठे अखिलेश यादव ने 2014 के बाद ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जिससे मायावती की मुश्किलें बढ़ सकती थीं या फिर वह जेल जा सकती थीं, जैसा की सपा नेताओं ने 2012 के विधान सभा चुनाव प्रचार के दौरान दावा भी किया था। अखिलेश सरकार ने 2012 में सत्ता हासिल करने के बाद 2014 के लोकसभा चुनाव के पूर्व तक मायावती के भ्रष्टाचार के खिलाफ जो भी जांच बैठाई थीं, 2014 के बाद उसकी धार को उन्हीं के द्वारा कुंद भी कर दिया गया। इन जांचों में खासकर मायावती राज के स्मारक घोटाले सबसे ज्यादा चर्चा में रहे थे, जिसमें मायावती के जेल जाने की बात समाजवादी पार्टी के नेता 2012 के विधान सभा चुनाव प्रचार के दौरान किया करते थे। लोकायुक्त की रिपोर्ट में भी मायावती को भ्रष्टाचार का दोषी करार दिया गया था। यह उन दिनों की बात है, जब 2007 से 2012 तक यूपी में मायावती सत्तारूढ़ थीं।
 
 


बहरहाल, यह तो जगजाहिर है कि मायावती ने सत्ता में रहते पत्थरों पर पानी की तरह पैसा बहाया था, लेकिन इसमें भी कहीं कोई संदेह नहीं है कि गोमती नगर और काफी हद तक आलमबाग की खूबसरती में चार चांद लगाने में मायावती की सरकार द्वारा कराए गये निर्माण कार्यों का विशेष योगदान रहा था। वैसे उनके विरोधी यही आरोप लगाते हैं कि सत्ता में रहते हुए दलित महापुरूषों के नाम के स्मारकों और पार्कों के नाम पर मायावती ने भ्रष्टाचार की गंगा बहायी थी। यहां तक की उन्होंने मान्यवर कांशीराम के साथ अपनी मूर्ति तक बनवा डाली थी। 2012 के विधान सभा चुनाव प्रचार के दौरान समाजवादी पार्टी ने तत्कालीन मायावती सरकार के खिलाफ इसे बड़ा मुद्दा बनाया था। चुनाव प्रचार के दौरान मुलायम सिंह यादव, शिवपाल यादव और अखिलेश यादव सहित तमाम समाजवादी नेताओं ने यहां तक दावा किया था कि अगर उनकी सरकार बनी तो मायावती सलाखों के पीछे होंगी।
 
 
खैर, पहले पूरे घोटाले के मामले को समझ लिया जाए जिसके चलते आजकल मायावती पर ईडी का शिकंजा कसा हुआ है। माया राज में हुए स्मारक घोटाले को लेकर ईडी की टीमें जगह−जगह छापेमारी कर रही हैं। अकेले लखनऊ में ही स्मारक घोटाले के आरोपी इंजीनियर और ठेकेदारों के 6 ठिकानों- गोमतीनगर, अलीगंज, हजरतगंज और शहीद पथ के पास ईडी की ताबड़तोड़ छापेमारी की जा चुकी है। ये स्मारक मायावती के कार्यकाल में बने थे। 1400 करोड़ से ज्यादा के इस घोटाले की जांच विजिलेंस और ईडी की टीमें कर रही हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मायावती राज में हुए स्मारक घोटाले को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाते हुए इस मामले में चल रही विजिलेंस जांच की स्टेटस रिपोर्ट तलब की थी। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने इस मामले में सुनवाई के दौरान तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि जनता के धन का दुरूपयोग करने का कोई भी दोषी बचना नहीं चाहिए। दोषी कितना भी रसूखदार हो, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी ही चाहिए। अदालत ने विजिलेंस जांच की धीमी रफ्तार पर भी सवाल उठाए थे और यूपी सरकार से पूछा है कि क्यों न इस मामले की जांच सीबीआई या एसआईटी को सौंप दी जाए।


 
गौरतलब है कि मायावती ने 2007 से 2012 तक के अपने कार्यकाल में लखनऊ−नोएडा में अम्बेडकर स्मारक परिवर्तन स्थल, मान्यवर कांशीराम स्मारक स्थल, गौतमबुद्ध उपवन, ईको पार्क, नोएडा का अम्बेडकर पार्क, रमाबाई अम्बेडकर मैदान और स्मृति उपवन समेत पत्थरों के कई स्मारक बनवाए थे। इन स्मारकों के निर्माण में सरकारी खजाने से 41 अरब 48 करोड़ रूपये खर्च किये गए थे। तत्कालीन मायावती सरकार पर इन स्मारकों के निर्माण में बड़े पैमाने पर घपला कर सरकारी रकम के दुरूपयोग का आरोप लगा था। 2012 में मायावती की सत्ता जाने और अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद इस घोटाले की जांच यूपी के तत्कालीन लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा को सौंपी गई थी। लोकायुक्त ने 20 मई 2013 को सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में 14 अरब, 10 करोड़, 83 लाख, 43 हजार का घोटाला होने की बात कही थी।
 
उधर, कैग रिपोर्ट 2012 के अनुसार, चुनार (मिर्जापुर) से पत्थर लेकर उसे नक्काशी के लिए 670 किमी दूर बयाना (राजस्थान) भेजा गया था, फिर 450 किमी दूर लखनऊ लाया गया। यदि चुनार में ही पत्थर काटने वालों को नियुक्त कर नक्काशी कराते तो 15.60 करोड़ परिवहन व्यय बच सकता था। रिपोर्ट में बलुआ पत्थरों के भुगतान पर भी सवाल खड़े किए गए थे।


 
इसी तरह नवंबर 2007 में स्मारकों की चहारदीवारी बनाने को 1890 रुपये प्रति घन फुट, ब्लाक स्थापना के लिए 1750 रुपये प्रति घन फुट और फ्लोरिंग के लिए 2400 रुपये प्रति वर्गमीटर की दर पर ठेका दिया गया था। दिसंबर 2008 में संयुक्त क्रय समिति ने अपने आप कार्यों की दर घटा दी। चहारदीवारी के लिए 1300 रुपये घन फुट, ब्लॉक के लिए 1750 से 1250 रुपये घन फुट व फ्लोरिंग के लिए 1750 रुपये प्रति वर्ग मीटर दर तय कर दी। यह कटौती पहले की जाती तो 22.16 करोड़ रुपये बच जाते।
 
 
भ्रष्टाचार का आलम यह था कि थरमोकोल के लिए भी 25 रुपये प्रति घनफुट का भुगतान किया गया, जिसकी जरूरत ही नहीं थी। कैग ने रेडी मिक्स कंक्रीट के लिए 11.34 करोड़ अधिक खर्च करने समेत मिट्टी व बालू के आपूर्तिकर्ताओं को अधिक भुगतान, 4.51 करोड़ के सेवा कर के अधिक भुगतान पर भी सवाल उठाए गए थे। वहीं, कांशीराम−मायावती की मूर्तियों पर 6.68 करोड़, पत्थर के 60 हाथियों पर 52 करोड़, अंबेडकर परिवर्तन स्थल पर 1.20 अरब, स्क्रीन वाल पर 14 करोड़, रखरखाव पर 80 करोड़, स्मारकों के सुदृढ़ीकरण पर 2.31 अरब, 2.03 अरब म्यूजियम पर, 2.72 अरब कांशीराम स्मारक के लिए और पार्क के सौंदर्यीकरण के लिए 90 करोड़ खर्च हुए। सारे काम राजकीय निर्माण निगम के द्वारा कराए गए। इस दौरान निगम के प्रबंध निदेशक सीपी सिंह थे। सीपी सिंह को बतौर ईनाम मायावती सरकार ने पहले दो साल फिर छह महीने का सेवा विस्तार दिया था।
 
बात लोकायुक्त की जांच रिपोर्ट की कि जाए तो उनके द्वारा कहा गया था कि सबसे बड़ा घोटाला पत्थर ढोने और उन्हें तराशने के काम में हुआ। जांच में कई ट्रकों के नंबर दो पहिया वाहनों के निकले थे। इसके अलावा फर्जी कंपनियों के नाम पर भी करोड़ों रूपये डकारे गए थे। लोकायुक्त ने 14 अरब 10 करोड़ रूपये से ज्यादा की सरकारी रकम का दुरूपयोग पाए जाने की बात कहते हुए डिटेल्स जांच सीबीआई या एसआईटी से कराए जाने की सिफारिश की थी। लोकायुक्त की जांच रिपोर्ट में कुल 199 लोगों को आरोपी माना गया था, जिसमें मायावती सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी और बाबू सिंह कुशवाहा के साथ ही कई विधायक और तमाम विभागों के बड़े अफसर शामिल थे।
 
यहां तक तो सब ठीक रहा, लेकिन जब यह मसला तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के सामने आया तो वह चुनाव प्रचार के दौरान जनता से किए वायदे को भूल गये और उन्होंने जानबूझकर लोकायुक्त द्वारा इस मामले में सीबीआई या एसआईटी जांच कराए जाने की सिफारिश को नजरअंदाज करते हुए जांच सूबे के विजिलेंस डिपार्टमेंट को सौंप दी। विजिलेंस ने एक जनवरी साल 2014 को गोमती नगर थाने में नसीमुद्दीन सिद्दीकी और बाबू सिंह कुशवाहा समेत उन्नीस नामजद व अन्य अज्ञात के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर अपनी जांच शुरू की। एफआईआर में आईपीसी की धारा 120 ठ और 409 के तहत केस दर्ज कर जांच शुरू की गई, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में बुरी तरह से हारने और केन्द्र में मोदी की सरकार बनने के बाद अखिलेश को भविष्य की राजनीति के लिये मायावती के साथ चलने की संभावनाएं नजर आने लगीं थीं तो कांग्रेस के प्रति भी अखिलेश का रुख नरम हो गया था। संभवतः इसीलिए कलातांर में अखिलेश सरकार की मेहरबानी के चलते इस मामले में मायावती के खिलाफ न तो चार्जशीट दाखिल हो सकी  और न ही विजिलेंस अपनी जांच पूरी कर पाई।
 
उधर, मायावती से गठबंधन की संभावनाएं तलाश रहे अखिलेश ने 2014 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद मुलायम सिंह यादव को हाशिये पर और शिवपाल को भी किनारे लगा दिया था। हो सकता है इसके पीछे की वजह अखिलेश को इस बात का अहसास होना होगा कि मुलायम और शिवपाल के रहते बसपा से गठबंधन संभव नहीं है। यहां तक तो सब ठीक चलता रहा, लेकिन तभी एक जनहित याचिका हाईकोर्ट में दाखिल हो गई। याचिकाकर्ता भावेश पांडेय ने मायावती राज में हुए भ्रष्टाचार की जांच सलीके से नहीं कराए जाने के लिए अखिलेश सरकार की नीयत पर सवाल खड़ा करते हुए आरोप लगाया था कि विजिलेंस द्वारा राजनीतिक दबाव में जांच को लटकाया जा रहा है। इसीलिये जनहित याचिकाकर्ता द्वारा लोकायुक्त की सिफारिश के तहत पूरा मामला सीबीआई को हस्तांतरित किये जाने की अपील की गई। अर्जी में यह भी कहा गया है कि मामले में चूंकि तमाम हाई प्रोफाइल लोग आरोपी हैं, इसलिए इसमें लीपापोती की जा रही है। याचिकाकर्ता ने सीधे तौर पर मायावती का नाम लिए बिना यह आशंका जताई है कि अगर सीबीआई या एसआईटी इस मामले में जांच करती है तो कई और चौंकाने वाले हाई प्रोफाइल लोगों की मिलीभगत भी सामने आ सकती है। अदालत ने इस मामले में सख्त रवैया अपनाते हुए विजिलेंस जांच की स्टेटस रिपोर्ट एक हफ्ते में तलब कर ली और टिप्पणी की कि अरबों के घोटाले का कोई भी दोषी कतई बचना नहीं चाहिए, भले ही वह कितना भी रसूखदार क्यों न हो।
 
अखिलेश के दाग भी हैं गहरे
 
मायावती के शासनकाल के भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने का काम करके अखिलेश यादव ने प्रदेश की जनता के साथ विश्वासघात किया था। अखिलेश ने मायावती के भ्रष्टाचार की जांच में ही रोड़ा नहीं अटकाया, बल्कि वह स्वयं भी भ्रष्टाचार के दंगल में फंसते गए। अखिलेश राज में खनन घोटाला, लखनऊ का रिवर फ्रन्ट घोटाला, एक्सप्रेस-वे के लिए भूमि अधिग्रहण में घोटाला और न जाने कौन−कौन से। बीते साल की कैग रिपोर्ट में सनसनीखेज खुलासा हुआ कि अखिलेश सरकार में सरकारी धन की जमकर लूट हुई है। सरकारी योजनाओं के नाम पर फर्जीवाड़ा कर 97 हजार करोड़ रुपए के सरकारी धन का बंदरबांट हुआ। खास बात यह है कि पंचायती राज विभाग, समाज कल्याण विभाग और शिक्षा विभाग में अकेले करीब 26 हजार करोड़ रुपए की लूट−खसोट की गई है। देश की सबसे बड़ी ऑडिट एजेंसी कैग ने 31 मार्च, 2017−18 तक यूपी में खर्च हुए बजट की जांच की के बाद यह बात कही थी।
 

 
कैग ने कहा कि उत्तर प्रदेश में खर्च हुए कुल धनराशी के लेखा जोखा अखिलेश सरकार के पास नहीं था। खर्चे का उपयोगिता प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं होने से यूपी में बड़े पैमाने पर धनराशि के दुरुपयोग और खर्च में धोखाधड़ी की आशंका है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अखिलेश सरकार के दौरान यूपी में 2014 से 31 मार्च 2017 के बीच हुए करीब ढाई लाख से ज्यादा धन कार्यों के लिए उपयोग किया गया लेकिन इनके उपयोगिता प्रमाणपत्र अखिलेश के पास नहीं हैं। यूपी में धनराशि के उपयोगिता प्रमाणपत्र जमा न करने का मामला कई बार शासन के सामने लाया गया, मगर कोई सुधार नहीं हुआ। मायावती को बचाने वाले अखिलेश पर भी आजकल जांच एजेंसियों का शिकंजा कसा हुआ है। ऐसा लगता है कि भ्रष्टाचार के मामले में बसपा सुप्रीमो मायावती और सपा प्रमुख अखिलेश यादव 'चोर−चोर मौसेरे भाई' जैसे थे।
 
-संजय सक्सेना

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