बिहारशरीफ, नालंदा स्थित शीतला माता मंदिर में हुए हादसे से उभरते सवाल मांग रहे जवाब?

Stampede Sheetla Mata Temple
ANI
कमलेश पांडे । Apr 2 2026 2:30PM

ताजा मामला बिहार के अभागे जिला नालंदा का है जहां के मूल निवासी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अस्ताचलगामी राजनीतिक साम्राज्य के लिए शीतला माता मंदिर भगदड़ से उपजी टीस सालों तक लोगों को सालती रहेगी। उनके पास से गृह मंत्रालय क्या गया, उनका गृह जिला भी मानवीय आपदा का शिकार हो गया।

जब दुनियादारी से परेशान व्यक्ति ईश्वरीय आस्था की शरण में जाता है तो उसके बेचैन मन को असीम शांति मिलती है। फलस्वरूप वह नाना प्रकार के रोगों से प्रभावित होते रहने से बच जाता है। वहीं उसकी मनोकामनाएं रूपीं मन्नतें भाव मार्ग द्वारा सम्बन्धित हृदय को प्रभावित करते हुए द्रवित करती हैं, जिससे श्रद्धालु के मनोरथ पूरे हो जाते हैं। यही वजह है कि ईश्वरीय आस्था व विश्वास हर धर्म में किसी न किसी रूप में व्याप्त और सर्वव्यापी है।

यद्यपि, मौजूदा दौर में धर्म-कर्म को भी मुनाफे का धंधा बना दिया गया है। जहां अमीर मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण कसा हुआ है, वहीं गरीब मंदिरों की व्यवस्था भगवान भरोसे या मंदिर स्वयंसेवक के जरिए संचालित होते हैं। इनमें से कुछ मंदिरों में भारी भीड़ होती है, लेकिन स्थानीय सिविल प्रशासन की अदूरदर्शिता और पुलिस प्रशासन की लापरवाही से जब तब हादसे होते रहते हैं। लिहाजा सुव्यवस्था व सुशासन अक्सर सवालों के घेरे में रहते आये हैं। 

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ताजा मामला बिहार के अभागे जिला नालंदा का है जहां के मूल निवासी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अस्ताचलगामी राजनीतिक साम्राज्य के लिए शीतला माता मंदिर भगदड़ से उपजी टीस सालों तक लोगों को सालती रहेगी। उनके पास से गृह मंत्रालय क्या गया, उनका गृह जिला भी मानवीय आपदा का शिकार हो गया। उनका मन जरूर अफसोस करता होगा, यदि अपनी मिट्टी से थोड़ा सा भी प्यार बचा रह गया होगा तो!

गौरतलब है कि बिहार के नालंदा जिले के बिहारशरीफ स्थित शीतला माता मंदिर में 31 मार्च 2026 को चैत्र मास के अंतिम मंगलवार को भगदड़ मच गई, जिसमें 8-9 श्रद्धालुओं (ज्यादातर महिलाओं) की मौत हो गई और कई घायल हुए। बताया गया कि यह हादसा भारी भीड़, अपर्याप्त सुरक्षा और प्रबंधन की कमी के कारण हुआ। नीतिगत दृष्टि से यह घटना राज्य की भीड़ प्रबंधन व्यवस्था पर सवाल उठाती है। लिहाजा, स्थानीय पुलिस अधीक्षक ने लोकल थाना प्रभारी को कर्तव्य हीनता के आरोप में निलंबित कर दिया है।

इस गम्भीर हादसे के कारण के तौर पर मंदिर का छोटा होना, बैरिकेडिंग न होना और पुलिस की अनुपस्थिति से हुई धक्कामुक्की आदि बताया गया। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि महावीर जयंती के संयोग से भीड़ बढ़ गई, लेकिन कोई पूर्व तैयारी नहीं की गई। बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की गाइडलाइन का पालन न होने से हादसा हुआ, जो टलने योग्य था।

इस हादसे पर प्रशासनिक प्रतिक्रिया देते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अफसोस जताया और मृतकों के परिजनों को 6 लाख रुपये मुआवजा घोषित किया और अधिकारियों को इसे अविलंब पीड़ितों को प्रदान करने के निर्देश दिए। दीपनगर थानाध्यक्ष को निलंबित किया गया तथा जांच शुरू हुई। क्योंकि विपक्ष ने इसे प्रशासनिक लापरवाही करार दिया।

इस हादसे के नीतिगत निहितार्थ निम्नलिखित हैं- पहला, यह घटना धार्मिक स्थलों पर भीड़ प्रबंधन नीति (SOP) को मजबूत करने की जरूरत बताती है, जैसे अतिरिक्त पुलिस तैनाती और सीसीटीवी बढ़ाना। दूसरा, बिहार में पूर्व हादसों (जैसे पटना 2012-14) के बावजूद दोहराई जाने वाली चूक से केंद्रीय स्तर पर एकरूप नीति की मांग तेज हो सकती है। इसलिए अन्य मंदिरों में सुरक्षा सख्ती इसका प्रत्यक्ष प्रभाव है।

यदि पिछले मंदिर भगदड़ हादसों से तुलना की जाए तो ऐसा करने पर शीतला माता हादसा भीड़ प्रबंधन की पुरानी कमियों को दोहराता दिखता है। बिहार में विशेष रूप से सावन या चैत्र जैसे उत्सवों पर ऐसी घटनाएं बार-बार हो रही हैं।

वहीं, प्रमुख हादसों की तुलना इस प्रकार है:- यदि हादसा, स्थान, तारीख, मौतें, मुख्य कारण और प्रतिक्रिया की बात की जाए तो इससे पूर्व बाबा सिद्धेश्वर मंदिर, जहानाबाद, में 7 अगस्त 2024 को हादसा हुआ, जो पुलिस लापरवाही और भारी भीड़ के चलते हुए थी। वहीं, गरीबनाथ मंदिर, मुजफ्फरपुर, में 13 अगस्त 2018 को हुए हादसे में 25 घायल हुए थे। क्योंकि सावन सोमवार पर जलाभिषेक के दौरान धक्कामुक्की हुई थी। वहीं, महाबोधि मंदिर/पटना दशहरा, पटना, में 3 अक्टूबर 2014 को हुए हादसे में 32 से ज्यादा लोग मर गए थे, क्योंकि तार गिरने की अफवाह से भगदड़ मची थी। वहीं पड़ोसी राज्य उत्तरप्रदेश में हाथरस सत्संग के दौरान जुलाई 2024 में हादसा हुआ जिसमें 121 लोग मारे गए क्योंकि भगदड़ सत्संग में मची थी। फिर मुख्य आरोपी गिरफ्तार हुए।

उपर्युक्त हादसों से जुड़ीं समानताएं और सबक यह हैं कि सभी मामलों में कारण भारी भीड़, अपर्याप्त सुरक्षा और अफवाहें रहीं। बिहार के हादसे छोटे मंदिरों में ज्यादा, जबकि यूपी जैसे राज्यों में बड़े आयोजनों पर हो ही जाते हैं, इसलिए नीतिगत रूप से SOP, CCTV और पूर्व चेतावनी प्रणाली की कमी उजागर होती है।

आपको यह पता होना चाहिए कि मंदिर भगदड़ रोकने के लिए NDMA दिशानिर्देशों और राज्य SOP का कड़ाई से पालन जरूरी है। ये उपाय पूर्व तैयारी, तकनीक और समन्वय पर आधारित हैं। वहीं पूर्व योजना के तहत भीड़ का अनुमान लगाकर ऑनलाइन पंजीकरण और समयबद्ध प्रवेश लागू करें। मास गेदरिंग प्लान बनाएं जिसमें आयोजक, पुलिस और NGO की भूमिका स्पष्ट हो। मॉक ड्रिल नियमित करें। 

जहां तक भीड़ प्रबंधन की बात है तो प्रवेश-निकास द्वार अलग रखें, बैरिकेडिंग लगाएं और चौड़ी राहें सुनिश्चित करें। AI-CCTV, ड्रोन से रीयल-टाइम मॉनिटरिंग करें (6 व्यक्ति/वर्गमीटर पर अलर्ट)। पर्याप्त प्रशिक्षित पुलिस/स्वयंसेवक तैनात करें। वहीं, बुनियादी ढांचा जैसे आपातकालीन द्वार, अग्निशामक यंत्र, पानी/आराम सुविधाएं उपलब्ध रखें। संकेतक चिन्ह, PA सिस्टम से निर्देश दें और पार्किंग रोकें।वहीं, भविष्योन्मुखी कदम उठाते हुए DMA 2005 के तहत जिलों में मास गेदरिंग नीति लागू करें। भक्तों को जागरूकता दें किभीड़ में हाथ छाती से सटाकर खड़े रहें।वहीं, बिहार जैसे राज्यों में धार्मिक उत्सवों पर केंद्रीय फंडिंग से सुरक्षा मजबूत करें।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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