Maharashtra Local Body Elections में मूल मुद्दे गायब, Hindu-Muslim Politics ने पकड़ा जोर

Owaisi and Nitesh Rane
प्रतिरूप फोटो
ANI

इस पूरे घटनाक्रम ने स्पष्ट कर दिया कि महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनाव अब केवल सड़कों, पानी और सफाई जैसे मुद्दों तक सीमित नहीं रहेंगे बल्कि पहचान और धार्मिक ध्रुवीकरण भी चुनावी विमर्श का हिस्सा बनने जा रहा है।

महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनावों की सरगर्मी के बीच एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी का एक बयान राजनीतिक तापमान को अचानक ऊंचाई पर ले गया है। हम आपको बता दें कि सोलापुर में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए ओवैसी ने कहा कि भारतीय संविधान इतना व्यापक है कि भविष्य में कोई भी नागरिक चाहे वह हिजाब पहने हो, वह भारत का प्रधानमंत्री बन सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि यही भारत और पाकिस्तान के बीच मूल अंतर है जहां संविधान किसी धर्म के आधार पर नागरिक अधिकारों को सीमित नहीं करता।

हम आपको बता दें कि ओवैसी का यह बयान ऐसे समय में आया है जब महाराष्ट्र के नगर निगम नगर परिषद और पंचायत चुनावों में धार्मिक और सामाजिक समीकरण निर्णायक भूमिका निभाने वाले हैं। उनका बयान मंच से उतरते ही राजनीतिक प्रतिक्रिया का केंद्र बन गया और देखते ही देखते यह मुद्दा स्थानीय निकाय चुनावों की बहस में शामिल हो गया। भारतीय जनता पार्टी के नेता नितेश राणे ने ओवैसी के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारत में हिजाब पहनने वाला कभी प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। उनका यह बयान केवल ओवैसी के तर्क का खंडन नहीं था बल्कि सीधे तौर पर हिंदू मुस्लिम राजनीति की नई लकीर खींचने वाला वक्तव्य माना गया। इसके बाद राजनीतिक दलों और सोशल मीडिया पर बयानबाजी तेज हो गई।

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इस पूरे घटनाक्रम ने स्पष्ट कर दिया कि महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनाव अब केवल सड़कों, पानी और सफाई जैसे मुद्दों तक सीमित नहीं रहेंगे बल्कि पहचान और धार्मिक ध्रुवीकरण भी चुनावी विमर्श का हिस्सा बनने जा रहा है।

देखा जाये तो महाराष्ट्र की राजनीति में यह बयानबाजी सोची समझी चुनावी रणनीति का हिस्सा दिखती है। स्थानीय निकाय चुनाव भले ही औपचारिक रूप से नगर प्रशासन से जुड़े हों लेकिन वास्तव में वे राज्य और राष्ट्रीय राजनीति की प्रयोगशाला होते हैं। इसी प्रयोगशाला में इस बार हिंदू मुस्लिम राजनीति का नया फार्मूला आजमाया जा रहा है। ओवैसी का बयान संविधान की आड़ में एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश देता है। उनका उद्देश्य केवल संवैधानिक व्याख्या करना नहीं बल्कि मुस्लिम मतदाताओं को यह संकेत देना है कि उनकी राजनीतिक आकांक्षाएं भी वैध हैं और उन्हें हाशिये पर नहीं रहना चाहिए। हम आपको बता दें कि महाराष्ट्र के शहरी इलाकों में जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं वहां यह बयान सीधे तौर पर वोट बैंक को संबोधित करता है।

लेकिन इस बयान की असली चिंगारी तब भड़की जब भाजपा की ओर से यह कहा गया कि हिजाब पहनने वाला कभी प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। यह प्रतिक्रिया केवल एक व्यक्ति के बयान का जवाब नहीं थी बल्कि यह हिंदू मतदाताओं को एक स्पष्ट संदेश देने की कोशिश थी कि सत्ता और पहचान की परिभाषा कौन तय करेगा। यहीं से यह बहस हिंदू मुस्लिम राजनीति के खुले मैदान में प्रवेश कर जाती है।

देखा जाये तो स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा के सामने चुनौती केवल प्रशासनिक मुद्दों की नहीं है बल्कि शहरी असंतोष और विपक्षी गठबंधनों की भी है। ऐसे में धार्मिक ध्रुवीकरण एक आसान और आजमाया हुआ रास्ता बन जाता है। ओवैसी का बयान और उस पर भाजपा की प्रतिक्रिया इसी रणनीति को धार देने का काम करती है। यह भी गौर करने योग्य है कि महाराष्ट्र में ओवैसी की पार्टी सीमित लेकिन प्रभावी इलाकों में चुनावी उपस्थिति दर्ज कराती रही है।

इस पूरी राजनीति में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि स्थानीय समस्याएं पीछे छूट जाती हैं। शहरों में जल संकट, बेरोजगारी, अव्यवस्था और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे हैं लेकिन चुनावी विमर्श पहचान की बहस में उलझ जाता है। लोकतंत्र के निचले स्तर पर जब यह स्थिति बनती है तो उसका असर ऊपर तक जाता है। बहरहाल, महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनाव अब केवल पार्षद और नगराध्यक्ष चुनने की प्रक्रिया नहीं रह गए हैं। वे यह तय करने जा रहे हैं कि राजनीति विकास की भाषा बोलेगी या धर्म की। ओवैसी के बयान और भाजपा की प्रतिक्रिया ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले दिनों में चुनावी मैदान और अधिक गरम होने वाला है और हिंदू मुस्लिम राजनीति इसका मुख्य हथियार बनने जा रही है।

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