वामपंथी नहीं चाहते भारत आगे बढ़े, पहले उद्योगों का विरोध किया और अब कृषि क्षेत्र के पीछे पड़े हैं

  •  राकेश सैन
  •  जनवरी 14, 2021   13:42
  • Like
वामपंथी नहीं चाहते भारत आगे बढ़े, पहले उद्योगों का विरोध किया और अब कृषि क्षेत्र के पीछे पड़े हैं

केंद्र सरकार के तीनों नए कृषि सुधार कानून किसानों को बंधे-बंधाए तौर-तरीकों से आजाद कर वैश्विक पटल पर ले जाने वाले हैं। लेकिन किसान आंदोलन में सक्रिय वामपंथी नेता सच्चाई समझने की बजाए 'माई वे या हाईवे' का सिद्धांत अपनाए हुए हैं।

दिल्ली की सीमा पर धरना दे रहे पंजाब-हरियाणा के किसान जो 'माई वे या हाईवे' सिद्धांत अपनाए हुए हैं वह कुछ ऐसी ही जिद्द है जो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को हार कर भी पराजय न मानने और भारत के विपक्ष को हर चुनावी पटकनी के बाद ईवीएम पर संदेह जताने को विवश करती है। धरनाकारी किसान इस जिद्द पर अड़े हैं कि केंद्र सरकार अपने तीन कृषि सुधार कानूनों को वापिस ले अन्यथा उनका धरना चलता रहेगा। आंदोलनकारी किसान सरकार को दो ही विकल्प दे रहे हैं, या तो उनका रास्ता अपनाया जाए अन्यथा वे रास्ता बंद किए रहेंगे। 'माई वे या हाईवे' का जिद्दी सिद्धांत न तो लोकतांत्रिक व्यवस्था के हित में है और न ही देश के। कल को कोई भी संगठन अपनी उचित-अनुचित मांग को ले 'हाईवे' रोक कर लोकतांत्रिक व्यवस्था को 'माई वे' पर चलने को विवश कर सकता है। किसी भी आंदोलन की सफलता के लिए उसका सत्यनिष्ठ होना, लक्ष्य जनहित व साधन नैतिक होने आवश्यक हैं परंतु मौजूदा किसान आंदोलन में इनका अभाव दिख रहा है।

इसे भी पढ़ें: किसान आंदोलन का हल सर्वोच्च न्यायालय की बजाय सरकार ही निकाले तो बेहतर

समय बीतने के साथ-साथ देश के सामने साफ होता जा रहा है कि किसानों के नाम पर धरना दे रहे अधिकतर लोग कौन हैं। इनकी असली मंशा क्या है और यही कारण है कि किसान आंदोलन को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। देश में घटित घटनाक्रमों को श्रृंखलाबद्ध जोड़ा जाए तो एक भयावह तस्वीर सामने आती है। विगत माह 12 दिसम्बर को कर्नाटक के कोलार में विस्ट्रान के प्लाट में हुई तोड़फोड़ ने पूरे देश को झिंझोड़ कर रख दिया। ताईवान की कंपनी विस्ट्रान भारत में 'एपल' के उत्पाद बनाती है। तोड़फोड़ को पहले तो कर्मचारियों व कंपनी के बीच विवाद के रूप में प्रचारित किया गया लेकिन ये घटना कई मायनों में अलग थी। विरोध प्रदर्शन में कंपनी के अतिरिक्त बाहर के लोग भी शामिल हो गए। प्रदर्शनकारियों ने प्लांट की मशीनरी को नुक्सान पहुंचाया और फोन भी लूट लिए। इस घटना के बाद न केवल विस्ट्रान का उत्पादन रुका बल्कि विस्ट्रान व एपल की समझौता भी खटाई में पड़ता नजर आने लगा है। पुलिस जांच में इसके पीछे वामपंथी संगठन इंडियन ट्रेड यूनियन कांग्रेस (इंटक) और वामपंथियों के छात्र संघ स्टूडेंट्स फेडरेशन आफ इंडिया (एसएफआई) के नाम सामने आ रहे हैं। देशवासियों को याद होगा कि वामपंथी इससे कई साल पहले जापानी कंपनी मारुती सुजूकी व होंडा कंपनी में भी हिंसा करवा चुके हैं क्योंकि जापान चीन का जबरदस्त प्रतिद्वंद्वी माना जाता है। यूपीए सरकार के कार्यकाल में वामपंथियों द्वारा पतंजलि के खिलाफ झूठ-फरेब के आधार पर खोला गया मोर्चा भी किसी को भूला नहीं है जो आज स्वदेशी उत्पाद की अग्रणी कंपनी बन कर सामने आई है।

भारतीय वामपंथियों की गतिविधियां इसके जन्म से ही संदिग्ध रही हैं। संदेह को उस समय बल मिलता है जब चीन का सरकारी अखबार 'ग्लोबल टाइम्स' विस्ट्रान हिंसा की खबर को प्रमुखता से न केवल प्रकाशित करता है बल्कि यह संदेश देने का भी प्रयास करता है कि भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियां सुरक्षित नहीं हैं। कोरोना के चलते बहुत-सी बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन छोड़ने और भारत आने को बेताब हैं। विस्ट्रान का उदाहरण देकर चीनी अखबार की चीफ रिपोर्टर चिंगचिंग चेन फॉक्सान कंपनी का मजाक उड़ाती है जो अपनी आईफोन कंपनी चीन से भारत ले आई है।

इसे भी पढ़ें: निजी क्षेत्र को इस तरह निशाना बनाया जाता रहा तो कौन निवेश के लिए आगे आयेगा ?

बात करते हैं किसान आंदोलन की तो सभी जानते हैं कि भारत में कृषि क्षेत्र की उत्पादकता दुनिया की तमाम बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले कहीं पीछे है। अधिकांश किसानों की गरीबी का यह सबसे बड़ा कारण है। यह उत्पादकता तब तक नहीं बढ़ने वाली जब तक कृषि के आधुनिकीकरण के कदम नहीं उठाए जाएंगे। यह काम सरकार अकेले नहीं कर सकती है। इसमें निजी क्षेत्र का सहयोग आवश्यक है। निजी क्षेत्र अगर कृषि में निवेश के लिए आगे आएगा तो इसके लिए कानूनों की आवश्यकता तो होगी ही। जो लोग इस मामले में किसानों को बरगलाने का काम कर रहे हैं वे वही वामपंथी हैं जो भारत में अस्थिरता का माहौल बनाने के प्रयास में दिखते हैं। यह वह सोच है जो सब कुछ सरकार से चाहने-मांगने पर भरोसा करती है। सच्चाई यह है कि जो देश विकास की होड़ में आगे हैं उन सभी ने मुक्त बाजार की अवधारणा पर ही आगे बढ़कर कामयाबी हासिल की है। देश के किसानों को भी आगे आकर मुक्त बाजार की अवधारणा को अपनाना चाहिए।

तीनों नए कृषि सुधार कानून किसानों को बंधे-बंधाए तौर-तरीकों से आजाद कर वैश्विक पटल पर ले जाने वाले हैं। इनके विरोध का मतलब है सुधार और विकास के अवसर खुद ही बंद कर लेना लेकिन किसान आंदोलन में सक्रिय वामपंथी नेता सच्चाई समझने की बजाए 'माई वे या हाईवे' का सिद्धांत अपनाए हुए हैं। शुरू-शुरू में इस आंदोलन में छिपी ताकतें भूमिगत थीं परंतु अब सामने आने लगी हैं। 10 जनवरी को करनाल में हरियाणा के मुख्यमंत्री के कार्यक्रम से पहले किसान प्रदर्शनकारियों द्वारा की गई हरकत के बाद इस आंदोलन को शांतिपूर्ण कहना भी मुश्किल हो गया। आखिर धरने पर बैठे मुट्ठी भर किसान किस आधार पर कह सकते हैं कि वे पूरे देश के करोड़ों किसानों का प्रतिनिधित्व करते हैं? आखिर पूरा जोर लगाने के बाद भी देश के बाकी हिस्सों का किसान आंदोलनकारियों के साथ क्यों नहीं आ रहा है? अब तो समाचार मिलने लगे हैं कि आंदोलन में किसानों की संख्या बनाए रखना किसान नेताओं के लिए चुनौतीपूर्ण बनने लगा है। किसानों को मोर्चे पर बैठाए रखने के लिए तरह-तरह की सुविधाएं दी जा रही हैं। किसान नेता राकेश टिकैत साफ शब्दों में कहते हैं कि वे मई 2024 तक यहां बैठने को तैयार हैं। आंदोलनकारी साफ-साफ केंद्र में मोदी व हरियाणा की भाजपा सरकार गिराने की बात कर रहे हैं और वहां पर भाजपा की सहयोगी जजपा को समर्थन वापिस लेने के लिए उकसाते रहे हैं। केवल इतना ही नहीं किसानों व सरकार के बीच मध्यस्थता का प्रयास कर रहे नानकसर संप्रदाय के बाबा लक्खा सिंह पर वामपंथी नेता राशन पानी लेकर चढ़ चुके हैं।

किसान आंदोलन की फीकी पड़ती चमक का एक और उदाहरण है कथित किसान नेता योगेंद्र यादव का वह ट्वीट। जिसमें उन्होंने शिकवा किया है कि हरियाणा के किसान आंदोलन में पूरे मन से हिस्सा नहीं ले रहे। किसान अब कहने लगे हैं कि जब सरकार कृषि सुधार कानून में आंदोलनकारियों की मांग के अनुसार चर्चा व संशोधन करने को तैयार है तो 'माई वे या हाईवे' की जिद्द का औचित्य क्या है ? किसानों को लगने लगा है कि उनके नेता या तो अपने अहं की तुष्टि के लिए या फिर किसी और के इशारे पर 'मैं ना मानूं-मैं ना मानूं' की माला फेर रहे हैं। अमेरिका के व्हाइट हाऊस में ट्रंप समर्थकों के हमले की घटना के बाद 'लोकतंत्र बनाम भीड़तंत्र' पर चर्चा हो रही है। भीड़तंत्र की तानाशाही अमेरिका में औचित्यपूर्ण नहीं कही जा सकती तो यह भारत में भी स्वीकार्य नहीं है, चाहे यह किसान आंदोलन के रूप में ही क्यों न हो।

-राकेश सैन







जोखिम भरी होती जा रही हैं सड़कें, सुरक्षा के लिए सरकार को उठाने होंगे और सख्त कदम

  •  ललित गर्ग
  •  जनवरी 20, 2021   13:11
  • Like
जोखिम भरी होती जा रही हैं सड़कें, सुरक्षा के लिए सरकार को उठाने होंगे और सख्त कदम

निःसंदेह बेहतर सड़कें समय की मांग हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वे भीषण दुर्घटनाओं का गवाह बनती रहें। बेहतर हो कि हमारे नीति-नियंता यह समझें कि जानलेवा सड़क हादसे को रोकने के लिए कुछ ठोस कदम उठाने की सख्त जरूरत है।

भारत का सड़क यातायात तमाम विकास की उपलब्धियों एवं प्रयत्नों के असुरक्षित एवं जानलेवा बना हुआ है, सुविधा की खूनी एवं हादसे की सड़कें नित-नयी त्रासदियों की गवाह बन रही है। सड़क सुरक्षा माह के उद्घाटन कार्यक्रम में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी की ओर से दी गई यह जानकारी हतप्रभ करने वाली है कि देश में प्रतिदिन करीब 415 लोग सड़क दुर्घटनाओं में जान गंवाते हैं। कोई भी अनुमान लगा सकता है कि एक वर्ष में यह संख्या कहां तक पहुंच जाती होगी? इसका कोई मतलब नहीं कि प्रति वर्ष लगभग डेढ़ लाख लोग सड़क हादसों में जान से हाथ धो बैठे। इन त्रासद आंकड़ों ने एक बार फिर यह सोचने को मजबूर कर दिया कि आधुनिक और बेहतरीन सुविधा की सड़कें केवल रफ्तार के लिहाज से जरूरी हैं या फिर उन पर सफर का सुरक्षित होना पहले सुनिश्चित किया जाना चाहिए। हर सड़क दुर्घटना को केन्द्र एवं राज्य सरकारें दुर्भाग्यपूर्ण बताती हैं, उस पर दुख व्यक्त करती हैं, मुआवजे का ऐलान भी करती हैं लेकिन एक्सीडेंट रोकने के गंभीर उपाय अब तक क्यों नहीं किए जा सके हैं? जो भी हो, सवाल यह है कि इस तरह की तेज रफ्तार सड़कों पर लोगों की जिंदगी कब तक इतनी सस्ती बनी रहेगी? सच्चाई यह भी है कि पूरे देश में सड़क परिवहन भारी अराजकता का शिकार है। सबसे भ्रष्ट विभागों में परिवहन विभाग शुमार है।

इसे भी पढ़ें: मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने केन्द्रीय मंत्री गडकरी को सड़क सुरक्षा माह की दी शुभकामनाएं

‘दुर्घटना’ एक ऐसा शब्द है जिसे पढ़ते ही कुछ दृश्य आंखों के सामने आ जाते हैं, जो भयावह होते हैं, त्रासद होते हैं, डरावने होते हैं, खूनी होते हैं। खूनी सड़कों में सबसे शीर्ष पर है यमुना एक्सप्रेस-वे। इस पर होने वाले जानलेवा सड़क हादसे कब थमेंगे? यह प्रश्न इसलिए, क्योंकि इस पर होने वाली दुर्घटनाओं और उनमें मरने एवं घायल होने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। यही नहीं, देश की अन्य सड़कें इसी तरह इंसानों को निगल रही हैं, मौत का ग्रास बना रही हैं। इनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। सड़क दुर्घटनाओं में लोगों की मौत यही बताती है कि अपने देश की सड़कें कितनी अधिक जोखिम भरी हो गई हैं। बड़ा प्रश्न है कि फिर मार्ग दुर्घटनाओं को रोकने के उपाय क्यों नहीं किए जा रहे हैं? सच यह है कि बेलगाम वाहनों की वजह से सड़कें अब पूरी तरह असुरक्षित हो चुकी हैं। सड़क पर तेज गति से चलते वाहन एक तरह से हत्या के हथियार होते जा रहे हैं वहीं सुविधा की सड़कें खूनी मौतों की त्रासद गवाही बनती जा रही हैं।

सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय लोगों के सहयोग से वर्ष 2025 तक सड़क हादसों में 50 प्रतिशत की कमी लाना चाहता है, लेकिन यह काम केवल सड़क सुरक्षा माह के माध्यम से लोगों को जागरूक करने भर से होने वाला नहीं है। सड़क हादसों के प्रति लोगों को सजग करने का अपना एक महत्व है, लेकिन बात तो तब बनेगी जब मार्ग दुर्घटनाओं के मूल कारणों का निवारण करने के लिए ठोस कदम भी उठाए जाएंगे। कुशल ड्राइवरों की कमी को देखते हुए ग्रामीण एवं पिछड़े इलाकों में ड्राइवर ट्रेनिंग स्कूल खोलने की तैयारी सही दिशा में उठाया गया कदम है, लेकिन इसके अलावा भी बहुत कुछ करना होगा। हमारी ट्रैफिक पुलिस एवं उनकी जिम्मेदारियों से जुड़ी एक बड़ी विडम्बना है कि कोई भी ट्रैफिक पुलिस अधिकारी चालान काटने का काम तो बड़ा लगन एवं तन्मयता से करता है, उससे भी अधिक रिश्वत लेने का काम पूरी जिम्मेदारी से करता है, प्रधानमंत्रीजी के तमाम भ्रष्टाचार एवं रिश्वत विरोधी बयानों एवं संकल्पों के यह विभाग धड़ल्ले से रिश्वत वसूली करता है, लेकिन किसी भी अधिकारी ने यातायात के नियमों का उल्लघंन करने वालों को कोई प्रशिक्षण या सीख दी हो, नजर नहीं आता। यह स्थिति दुर्घटनाओं के बढ़ने का सबसे बड़ा कारण है।

जरूरत है सड़कों के किनारे अतिक्रमण को दूर करने की, आवारा पशुओं के प्रवेश एवं बेघड़क घुमने को भी रोकने की। दोनों ही स्थितियां सड़क हादसों का कारण बनती हैं, खासकर तब और भी जब ऐसे ठिकानों पर बस, ट्रक और अन्य वाहन खड़े कर दिए जाते हैं। यह ठीक नहीं कि ढाबे भारी वाहनों के लिए पार्किंग स्थल बन जाएं। यह भी समझने की जरूरत है कि सड़क किनारे बसे गांवों से होने वाला हर तरह का बेरोक-टोक आवागमन भी जोखिम बढ़ाने का काम करता है। इस स्थिति से हर कोई परिचित है, लेकिन ऐसे उपाय नहीं किए जा रहे, जिससे कम से कम राजमार्ग तो अतिक्रमण और बेतरतीब यातायात से बचे रहें। इसमें संदेह है कि उलटी दिशा में वाहन चलाने, लेन की परवाह न करने और मनचाहे तरीके से ओवरटेक करने जैसी समस्याओं का समाधान केवल सड़क जागरूकता अभियान चला कर किया जा सकता है। इन समस्याओं का समाधान तो तब होगा जब सुगम यातायात के लिए चौकसी बढ़ाई जाएगी और लापरवाही का परिचय देने अथवा जोखिम मोल लेने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी, चालान काटना या नये-नये जुर्माने की व्यवस्था करने से सड़क दुर्घटनाएं रूकने वाली नहीं हैं। यह ठीक नहीं कि जानलेवा सड़क दुर्घटनाओं का सिलसिला कायम रहने के बाद भी राजमार्गों पर सीसीटीवी और पुलिस की प्रभावी उपस्थिति नहीं दिखती।

इसे भी पढ़ें: गडकरी को उम्मीद, 2025 तक देश में सड़क दुर्घटनाओं में 50 प्रतिशत तक होगी कमी

यह गंभीर चिंता का विषय और विडम्बनापूर्ण है कि हर रोज ऐसी दुर्घटनाओं और उनके भयावह नतीजों की खबरें आम होने के बावजूद बाकी वाहनों के मालिक या चालक, सरकार और परिवहन विभाग कोई सबक नहीं लेते। सड़क पर दौड़ती गाड़ी मामूली गलती से भी न केवल दूसरों की जान ले सकती है, बल्कि खुद चालक और उसमें बैठे लोगों की जिंदगी भी खत्म हो सकती है। पर लगता है कि सड़कों पर बेलगाम गाड़ी चलाना कुछ लोगों के लिए मौज-मस्ती एवं फैशन का मामला होता है लेकिन यह कैसी मौज-मस्ती या फैशन है जो कई जिन्दगियां तबाह कर देती है। ऐसी दुर्घटनाओं को लेकर आम आदमी में संवेदनहीनता की काली छाया का पसरना त्रासद है और इससे भी बड़ी त्रासदी सरकार की आंखों पर काली पट्टी का बंधना है। हर स्थिति में मनुष्य जीवन ही दांव पर लग रहा है। इन बढ़ती दुर्घटनाओं की नृशंस चुनौतियों का क्या अंत है? बहुत कठिन है दुर्घटनाओं की उफनती नदी में जीवनरूपी नौका को सही दिशा में ले चलना और मुकाम तक पहुंचाना, यह चुनौती सरकार के सम्मुख तो है ही, आम जनता भी इससे बच नहीं सकती।

निःसंदेह बेहतर सड़कें समय की मांग हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वे भीषण दुर्घटनाओं का गवाह बनती रहें। बेहतर हो कि हमारे नीति-नियंता यह समझें कि जानलेवा सड़क हादसे को रोकने के लिए कुछ ठोस कदम उठाने की सख्त जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट भी तल्ख टिप्पणी कर चुका है कि ड्राइविंग लाइसेंस किसी को मार डालने के लिए नहीं दिए जाते। सच्चाई यह भी हैं कि नियमों के उल्लंघन की एवज में पुलिस की पकड़ में आने वाले लोग बिना झिझक जुर्माना चुकाकर अपनी गलती के असर को खत्म हुआ मान लेते हैं। परिवहन नियमों का सख्ती से पालन जरूरी है, केवल चालान काटना समस्या का समाधान नहीं है। देश में 30 प्रतिशत ड्राइविंग लाइसेंस फर्जी हैं। परिवहन क्षेत्र में भारी भ्रष्टाचार है लिहाजा बसों का ढंग से मेनटेनेंस भी नहीं होता। इनमें बैठने वालों की जिंदगी दांव पर लगी होती है। देश भर में बसों के रख-रखाव, उनके परिचालन, ड्राइवरों की योग्यता और अन्य मामलों में एक-समान मानक लागू करने की जरूरत है, तभी देश के नागरिक एक राज्य से दूसरे राज्य में निश्चिंत होकर यात्रा कर सकेंगे।

सड़क हादसों में मरने वालों की बढ़ती संख्या ने आज मानो एक महामारी का रूप ले लिया है। इस बारे में राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े दिल दहलाने वाले हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया के अट्ठाईस देशों में ही सड़क हादसों पर नियंत्रण की दृष्टि से बनाए गए कानूनों का कड़ाई से पालन होता है। इंसानों के जीवन पर मंडरा रहे सड़क हादसों के डरावने दृश्य एवं दुर्घटनाओं पर काबू पाने के लिये प्रतीक्षा नहीं, प्रक्रिया आवश्यक है। तेज रफ्तार से वाहन दौड़ाते वाले लोग सड़क के किनारे लगे बोर्ड़ पर लिखे वाक्य ‘दुर्घटना से देर भली’ पढ़ते जरूर हैं, किन्तु देर उन्हें मान्य नहीं है, दुर्घटना भले ही हो जाए।

-ललित गर्ग







धर्म और संस्कृति के प्रति हिंदुओं को जागृत करने का कार्यक्रम है निधि समर्पण अभियान

  •  ललित गर्ग
  •  जनवरी 19, 2021   13:27
  • Like
धर्म और संस्कृति के प्रति हिंदुओं को जागृत करने का कार्यक्रम है निधि समर्पण अभियान

एक सकारात्मक वातावरण के अन्तर्गत आने वाले समय में अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण पूरा होने तक ऐसे जागृति अभियान और हिन्दुत्व को संगठित करने के कार्यक्रम चलते रहेंगे जिनसे भारत सहित संपूर्ण विश्व में फैले हिंदुओं के अंदर हिंदुत्व चेतना जागृत रहे।

अयोध्या में भव्य श्रीराम मन्दिर निर्माण को लेकर देशभर में चल रहा निधि समर्पण अभियान जहां सामाजिक समता एवं सौहार्द का दर्पण है वहीं भारतीय जनता पार्टी एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिन्दुत्व सशक्तिकरण का माध्यम भी है। विश्व हिन्दू परिषद इसके माध्यम से ऊंच-नीच, संकीर्णता, स्वार्थ एवं जातिवाद का भेद मिटाकर हिन्दू समाज को एकजुट एवं सशक्त करने में जुटी है। राम मंदिर निर्माण संघ के लिए हिंदुओं के पुनर्जागरण और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का लक्ष्य हासिल करने का एक महत्वपूर्ण चरण रहा है।

आजादी के बाद से ही हिन्दुत्व को कमजोर करने एवं हिन्दू आस्था केन्द्रों के प्रति राजनीतिक उपेक्षाएं बढ़ती ही गयी थीं। वैसे मध्यकाल एवं विशेष मुस्लिम शासकों ने बड़ी मात्रा में हिन्दू आस्था के केन्द्रों एवं हिन्दू-आस्था को ध्वस्त किया। संघ एवं उससे जुड़े संगठन ही एकमात्र ऐसी रोशनी रही है जिन्होंने हिन्दुओं के अंदर यह भाव पैदा किया कि उनके आस्था केंद्रों पर चोट पहुंचाई गई, उनको तोड़ा गया, दूसरे मजहब के केंद्र बनाए गए, जबरन धर्म परिवर्तन किया गया, शिक्षा पद्धति में हिन्दुत्व की उपेक्षा की गयी और अब उन सबको मुक्त कराना हमारा धर्म है एवं दायित्व भी। संघ धीरे-धीरे लोगों के अंदर ये भावनाएं पैदा करने में सफल हुआ है। उनके अंदर यह विश्वास कायम हो रहा है कि भाजपा सत्ता में रहेगी तो आस्था केंद्रों की मुक्ति का रास्ता आसान होगा, न केवल आस्था केन्द्रों का बल्कि हिन्दुत्व के अजेंडे़ को भी तभी पूरा किया जा सकेगा।

इसे भी पढ़ें: अयोध्या में बन रहा भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर राष्ट्र मंदिर के रूप में भी जाना जायेगा

संघ और भाजपा के एजेंडे में श्रीराम मन्दिर के अलावा कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाना, समान नागरिक संहिता लागू करना, गोवंश हत्या निषेध और लव जिहाद को रोकने के आशय वाले कानूनों का निर्माण करना शामिल है। एक बड़ा मसला अब मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि और काशी में श्रीविश्वनाथ की मुक्ति का है। मथुरा से संबंधित मामले न्यायालय में विचाराधीन हैं। संघ चाहता है कि मथुरा की तरह ही काशी विश्वनाथ और संपूर्ण भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में छोटे-बड़े मंदिरों के मामले न्यायालयों में डाले जाएं। हिन्दुत्व आस्था एवं संस्कृति को बहुत जतन से बर्बरतापूर्वक कुचला गया, अब पुनः हिन्दुत्व संस्कृति को गरिमा प्रदान करते हुए उसे जीवंत करने का अभियान चल रहा है। हिन्दू घोर अंधेरी रात के साक्षी रहे हैं, एक-दूसरे का हाथ नहीं थामेंगे तो सुबह की दहलीज पर नहीं पहुंच पायेंगे।

एक सकारात्मक वातावरण के अन्तर्गत आने वाले समय में मंदिर का निर्माण पूरा होने तक ऐसे जागृति अभियान और हिन्दुत्व को संगठित करने के कार्यक्रम चलते रहेंगे जिनसे भारत सहित संपूर्ण विश्व में फैले हिंदुओं के अंदर हिंदुत्व चेतना जागृत रहे। संघ अपनी स्थापना के समय से ही हिंदू राष्ट्र की बात करता है। संघ नौ दशकों बाद दुनिया के सबसे बड़े संगठन के रूप में खुद को स्थापित कर पाया है तो इसका कारण स्पष्ट नीति, सकारात्मक सोच, संस्कृति-विचार एवं अपनी जड़ों को मजबूती प्रदान करना है।

दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना केशव बलराम हेडगेवार ने की थी। भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के लक्ष्य के साथ 27 सितंबर 1925 को विजयदशमी के दिन आरएसएस की स्थापना केशव बलिराम हेडगेवार व संघ के कार्यकर्ताओं द्वारा की गई थी। हेडगेवार के साथ विश्वनाथ केलकर, भाऊजी कावरे, अण्णा साहने, बालाजी हुद्दार, बापूराव भेदी आदि थे। उस वक्त हिंदुओं को सिर्फ संगठित करने का विचार था। संघ परिवार या भाजपा का मानना है कि भारत हिंदू राष्ट्र था, है और रहेगा।

संघ का दावा है कि उसके एक करोड़ से ज्यादा जीवनदानी समर्पित सदस्य हैं। संघ परिवार में 80 से ज्यादा समविचारी या आनुषांगिक संगठन हैं। दुनिया के करीब 40 देशों में संघ सक्रिय है। मौजूदा समय में संघ की 56 हजार से अधिक दैनिक शाखाएं लगती हैं। करीब 13 हजार 847 साप्ताहिक मंडली और 9 हजार मासिक शाखाएं भी हैं। संघ ने अपने लंबे सफर में कठोर संघर्ष के उपरान्त कई उपलब्धियां अर्जित कीं जबकि तीन बार उस पर प्रतिबंध भी लगा। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या को संघ से जोड़कर देखा गया, संघ के दूसरे सरसंघचालक गुरु गोलवलकर को बंदी बनाया गया। लेकिन 18 महीने के बाद संघ से प्रतिबंध हटा दिया गया। दूसरी बार आपातकाल के दौरान 1975 से 1977 तक संघ पर पाबंदी लगी। तीसरी बार छह महीने के लिए 1992 के दिसंबर में लगी, जब 6 दिसंबर को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरा दी गई थी। तमाम वितरीत परिस्थितियों एवं अवरोधों के, संघ हर बार अधिक तेजस्विता एवं प्रखरता से उभर कर सामने आया।

इसे भी पढ़ें: राम मंदिर भारत के स्वाभिमान और गौरव का प्रतीक होगा : आरएसएस

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सम्पूर्ण साहस, सूझबूझ एवं तय सोच के साथ वैसे कदम उठा रहे हैं जिनकी चाहत संघ परिवार के एक-एक कार्यकर्ता और समर्थक के अंदर सालों से कायम रही है। दिशा एवं दशा, समय और संयोग भी उनका साथ दे रहा है। उदाहरण के लिए अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का रास्ता उच्चतम न्यायालय ने साफ कर दिया। इसके पूर्व तीन तलाक को अपराध करार देने के कानून का आधार भी न्यायालय के फैसले ने ही प्रदान किया। अयोध्या पर न्यायालय के फैसले के बाद पूरा संघ परिवार मंदिर निर्माण की प्रक्रिया को अपनी सोच के अनुसार आगे बढ़ा रहा है। संपूर्ण देश को इससे जोड़ने का कार्यक्रम भी अनुकूल माहौल निर्मित कर रहा है। क्योंकि संघ ने धीरे-धीरे अपनी पहचान एक अनुशासित और राष्ट्रवादी संगठन की बनाई। जिससे न केवल देश में बल्कि दुनिया में इसके समर्थन का माहौल बन रहा है। सच तो यह है कि संस्कृति, मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं का कोई मजहब और सम्प्रदाय नहीं होता। अगर संवेदनहीनता एक तरफ है और वह समस्याओं की जड़ में है, तो वैसी ही संवेदनहीनता उस तरफ भी पायी जाती है जिधर आरोप लगाने वाले होते हैं। सबसे बड़ी बात अपने भीतर के न्यायाधिपति के सामने खड़े होकर खुद को जांचने, सुधारने, संगठित होने और आगे का रास्ता तय करने की होती है।

संघ साफ तौर पर हिंदू समाज को उसके धर्म और संस्कृति के आधार पर शक्तिशाली बनाने की बात करता है। संघ से निकले स्वयंसेवकों ने ही भाजपा को स्थापित किया। संघ एवं भाजपा के प्रयासों से आज समूचा देश राममय बना है, भगवान श्रीराम सबके हैं, इसलिये उनके मन्दिर निर्माण में सबसे सहयोग लेने के प्रयास हो रहे हैं। इसी मन्दिर के लिये गुरु गोविन्द सिंह ने भी दो बार युद्ध लड़ा। गुरुनानक देवजी जब अयोध्या आये थे तब अपने शिष्य मर्दाना को बोला था कि यह मेरे पूर्वजों की धरती है। जैन धर्म के 24 में से 22 तीर्थंकरों की यह कल्याणक भूमि है तो महात्मा बुद्ध श्रीराम के वंश से जुड़े थे। बाबा साहब अंबेडकर ने कई बार अयोध्या का जिक्र किया तो महात्मा गांधी ने तो अपने प्राण ही श्रीराम को पुकारते हुए त्यागे थे। हिन्दू संस्कृति सबसे प्राचीन ही नहीं, समृद्ध और जीवंत संस्कृति भी है। यह राष्ट्रीयता की द्योतक है। अतः राष्ट्रीयता को सशक्त एवं समृद्ध हमें अपने सांस्कृतिक तत्वों से करना चाहिए अन्यथा मानसिक दासता हमें अपनी संस्कृति के प्रति गौरवशील नहीं रहने देगी। यह भारत भूमि जहां राम-भरत की मनुहारों में 14 वर्ष पादुकाएं राज-सिंहासन पर प्रतिष्ठित रहीं, महावीर और बुद्ध जहां व्यक्ति का विसर्जन कर विराट बन गये, श्रीकृष्ण ने जहां कुरुक्षेत्र में गीता का ज्ञान दिया और गांधीजी संस्कृति के प्रतीक बनकर विश्व क्षितिज पर एक आलोक छोड़ गये, उस देश में एक समृद्ध संस्कृति को धुंधलाने के प्रयत्न होना, सत्ता के लिये मूल्यों एवं संस्कृति को ध्वस्त करना, कुर्सी के लिये सिद्धान्तों का सौदा, वैभव के लिये अपवित्र प्रतिस्पर्धा और विलास के हाथों राष्ट्र को कमजोर करने का षड्यंत्र होना लगातार चुभन पैदा करता रहा है, अब इन धुंधलकों के बीच रोशनी का अवतरण हो रहा है तो उसका स्वागत होना चाहिए। संघ परिवार एवं भाजपा इस दिशा में जितना प्रखर होकर चलेंगे, देश उतना ही सशक्त होगा। जितने मजबूत इनके इरादे होंगे, उतना ही जन-समर्थन बढ़ेगा। 

-ललित गर्ग







गाँव-गाँव में पार्टी की मजबूती के लिए भाजपा ने बनाया मेगा प्लान

  •  अजय कुमार
  •  जनवरी 18, 2021   13:44
  • Like
गाँव-गाँव में पार्टी की मजबूती के लिए भाजपा ने बनाया मेगा प्लान

2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी ने हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद की ऐसी अलख जलाई की शहर से लेकर गाँव तक में मोदी-मोदी होने लगा, लेकिन इसका यह मतलब नहीं था कि बीजेपी ने गाँव-देहात में अपने संगठन को मजबूत कर लिया था। बीजेपी पर शहरी पार्टी होने का ठप्पा लगा था।

भारतीय जनता पार्टी का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है। 1980 में गठन के बाद 1984 के लोकसभा चुनाव में दो सीटें जीतने वाली बीजेपी के आज तीन सौ से अधिक सांसद हैं। कई राज्यों में उसकी सरकारें हैं, लेकिन बीजेपी आज भी सर्वमान्य पार्टी नहीं बन पाई है। दक्षिण के राज्यों में उसकी पकड़ नहीं के बराबर है। कर्नाटक को छोड़ दें तो दक्षिण के राज्यों- आन्ध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना में आज भी बीजेपी ज्यादातर मुकाबले में नजर नहीं आती है। इसी के चलते बीजेपी पर पूरे देश की बजाए उत्तर भारतीयों की पार्टी होने का ठप्पा चस्पा रहता है। उत्तर भारत में भी बीजेपी को लेकर बुद्धिजीवियों और राजनैतिक पंडितों की अलग-अलग धारणा है। कभी बीजेपी को बनिया (व्यापारियों) और ब्राह्मणों की पार्टी कहा जाता था, तो ऐसे लोगों की भी संख्या कम नहीं थी जो बीजेपी को शहरी पार्टी बताया करते थे। इस अभिशाप को मिटाने के लिए बीजेपी को काफी पापड़ बेलने पड़े तो प्रभु राम ने उसका (बीजेपी) बेड़ा पार किया।

इसे भी पढ़ें: अयोध्या में बन रहा भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर राष्ट्र मंदिर के रूप में भी जाना जायेगा

अयोध्या में भगवान राम की जन्मस्थली के पांच सौ वर्ष पुराने विवाद में ‘कूद’ कर बीजेपी ने ऐसा रामनामी चोला ओढ़ा कि वह बनिया-ब्राह्मण की जगह हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद की लम्बरदार बन बैठी। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की राजनैतिक इकाई भारतीय जनता पार्टी ने वर्षों से अलग-अलग अपनी ढपली बजाने वाले हिन्दुओं को भगवान राम के नाम पर एकजुट करके उसे बीजेपी का वोट बैंक भी बना दिया, लेकिन फिर भी बीजेपी के ऊपर शहरी पार्टी होने का ठप्पा तो लगा ही रहा। यह वह दौर था जब बीजेपी को छोड़कर कांग्रेस सहित अन्य तमाम गैर-भाजपाई दल मुस्लिम तुष्टिकरण की सियासत में लगे हुए थे। वहीं हिन्दुओं के वोट बंटे रहें, इसके लिए साजिशन हिन्दुओं के बीच जातिवाद घोलकर उनके वोटों में बिखराव पैदा किया गया। यादवों के रहनुमा मुलायम बन गए और मायावती दलितों को साधने में सफल रहीं। हिन्दुओं के वोट बैंक में बिखराव के सहारे ही बिहार में लालू यादव और उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह ने वर्षों तक सत्ता हासिल करने में कामयाबी हासिल की। बसपा सुप्रीम मायावती ने भी कई बार दलित-मुस्लिम वोट बैंक के सहारे सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने में कामयाबी हासिल की। यह सब तब तक चलता रहा जब तक कि भारतीय जनता पार्टी में मोदी युग का श्रीगणेश नहीं हुआ था। 

2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी ने हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद की ऐसी अलख जलाई की शहर से लेकर गाँव तक में मोदी-मोदी होने लगा, लेकिन इसका यह मतलब नहीं था कि बीजेपी ने गाँव-देहात में अपने संगठन को मजबूत कर लिया था। बीजेपी पर शहरी पार्टी होने का ठप्पा लगा था। इस ठप्पे को हटाने के लिए ही मोदी सरकार ने तमाम विकास योजनाओं का रूख गांव-देहात और अन्नदाताओं की तरफ मोड़ दिया। फसल बीमा योजना, कृषि में मशीनीकरण, जैविक खेती, सॉइल हेल्थ कार्ड और प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना ऐसी प्रमुख योजनाएं हैं जो केंद्र सरकार के द्वारा चलाई जा रही हैं। किसानों से लगातार संवाद किया जा रहा है। किसानों की माली हालत सुधारने के लिए कई राहत पैकजों की भी घोषणा की गई। नया कृषि कानून भी इसका हिस्सा है जिसको लेकर आजकल पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ किसानों ने मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा भी खोल रखा है। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने नये कृषि कानून पर अंतरिम रोक लगा कर एक कमेटी भी गठित कर दी है।

एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी किसानों को लेकर कई कदम उठा रहे हैं तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश की योगी सरकार भी केन्द्र सरकार के पदचिन्हों पर चलते हुए कई किसान योजनाएं लेकर आई है। इसी क्रम में उत्तर प्रदेश में सिंचन क्षमता में वृद्धि तथा सिंचाई लागत में कमी लाकर कृषकों की आय में वृद्धि करने के उद्देश्य से स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। 50 लाख किसान ड्रिप स्प्रिंकलर सिंचाई योजना से लाभान्वित हुए। योजना में लघु एवं सीमांत कृषकों को 90 प्रतिशत एवं सामान्य कृषकों को 80 फीसदी का अनुदान मिला है। लघु, सीमांत, अनुसूचित जाति एवं जनजाति के कृषक समूह के लिए मिनी ग्रीन ट्यूबवेल योजना की भी शुरुआत की गई है। योजना के तहत नलकूप के सबमर्सिबल पम्प का संचालन सौर ऊर्जा के माध्यम से किया जाएगा।

योगी सरकार खेतों की मुफ्त में जुताई और बुवाई का भी कार्यक्रम लेकर आई है। पहले चरण में ये योजना यूपी के लखनऊ, वाराणसी और गोरखपुर समेत 16 जिलों में लागू की गई। इसके तहत लघु और सीमांत किसानों को राहत देने के लिए योगी सरकार ने ट्रैक्टरों से मुफ्त में खेतों की जुताई और बुवाई कराने जैसी बड़ी सुविधा दी गई है। मुख्यमंत्री कृषक योजना के तहत 500 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। हाल ही में किसान सम्मान निधि योजना के तहत 2.13 करोड़ किसानों के बैंक खातों में 28,443 करोड़ रुपये हस्तांतरित किये गये। देश के किसानों के लिए यह सब योजनाएं केन्द्र की मोदी सरकार लाई है तो यूपी की योगी सरकार अपने प्रदेश के किसानों की माली हालत सुधारने में लगी है।

इसे भी पढ़ें: यूपी विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी से सीधी लड़ाई लड़ने से बचना चाहती है भाजपा

बात सरकार से अलग संगठन की कि जाए तो भारतीय जनता पार्टी इसमें भी अपनी पूरी ताकत झोंके हुए है। शहर के चौक-चौराहों से निकलकर बीजेपी गाँव-देहात में चौपालों तक दस्तक देने लगी है। इसीलिए भारतीय जनता पार्टी पंचायत चुनावों में भी ताल ठोंकने लगी है। कई राज्यों के पंचायत चुनाव में बीजेपी अपनी ताकत दिखा भी चुकी है। इसी क्रम में उत्तर प्रदेश में भी भारतीय जनता पार्टी ने गांव की सरकार के चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है। भाजपा पंचायत चुनाव को लेकर बेहद गंभीर है। अबकी बार बीजेपी अपने चुनाव चिन्ह कमल के निशान पर पंचायत चुनाव लड़ने जा रही है ताकि भविष्य में बीजेपी ताल ठोक कर कह सके कि उसकी पहुंच गाँव-गाँव तक है। 

दरअसल, पार्टी अभी तक त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव (जिला पंचायत, क्षेत्र पंचायत और ग्राम पंचायत) में अपने उम्मीदवारों को सिर्फ समर्थन देती थी, सिंबल नहीं दिया जाता था। प्रत्याशी को बीजेपी समर्थित कहा जाता था, लेकिन मौजूदा बीजेपी नेतृत्व का मानना है कि हर राजनीतिक दल को खुद का कर्तव्य मानकर हर चुनाव में उम्मीदवार उतारने चाहिए क्योंकि चुनाव के दौरान सियासी दलों को अपनी नीतियां और योजनाओं को आमजन के सामने रखने का खास अवसर मिलता है। चुनाव सियासी दलों की परीक्षा समान हैं।

-अजय कुमार







This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy.Accept