आखिर कबतक जटिल पूर्वाग्रहों से परेशान रहेगा भारत गणतंत्र?

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कमलेश पांडे । Jan 24 2026 6:47PM

पिछली शताब्दी के अंतिम तीन भागों से लेकर मौजूदा शताब्दी के प्रथम भाग तक यानी पूरे सौ सालों में भारतीय शासन-प्रशासन की जो पूर्वाग्रही गतिविधियां दिखाई-सुनाई पड़ीं, उससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि भारतीय गणतंत्र को दलित-आदिवासी-पिछड़े-अल्पसंख्यक-सवर्ण कोटि के अभिजात्य वर्गों के चंगुल से बाहर निकालना बहुत मुश्किल है।

भारत का गणतंत्र पूर्वाग्रहों जैसे जातिवाद, सांप्रदायिकता, भाषा जनित क्षेत्रवाद, वंशवाद, राजनीतिक पक्षपात और सामाजिक असमानताओं से जूझ रहा है, जो संवैधानिक मूल्यों को कमजोर कर रहे हैं। खासकर गणतंत्र दिवस जैसे अवसरों पर ये मुद्दे अकसर उभरकर सामने आ जाते हैं, जहां लोकतंत्र की चुनौतियां स्पष्ट दिखती हैं। इसलिए कतिपय प्रमुख पूर्वाग्रहों पर चर्चा लाजिमी है जो इसे समदर्शी और सर्वसम्मत लोकतंत्र बनने देने की राह के सबसे बड़े रोड़े तब भी थे, आज भी हैं और अगर यही हालात बने रहे तो भविष्य में भी रहेंगे। लिहाजा प्रबुद्धजनों से लेकर आम आदमी के दिलोदिमाग में यह यक्ष प्रश्न बना हुआ है कि आखिर कबतक जटिल पूर्वाग्रहों से परेशान रहेगा भारत गणतंत्र?

पिछली शताब्दी के अंतिम तीन भागों से लेकर मौजूदा शताब्दी के प्रथम भाग तक यानी पूरे सौ सालों में भारतीय शासन-प्रशासन की जो पूर्वाग्रही गतिविधियां दिखाई-सुनाई पड़ीं, उससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि भारतीय गणतंत्र को दलित-आदिवासी-पिछड़े-अल्पसंख्यक-सवर्ण कोटि के अभिजात्य वर्गों के चंगुल से बाहर निकालना बहुत मुश्किल है। खासकर धर्मनिरपेक्षता ने तो एक पाकिस्तान दे देने के बाद कई और पाकिस्तान देने की पृष्ठभूमि तैयार कर दी है। शांतिपूर्ण सनातन भूमि पर ब्रेक के बाद होते रहने वाले सांप्रदायिक दंगे भी इसी बात की चुगली करते प्रतीत होते हैं। मीडिया और सोशल मीडिया की मुहिम हमारी धर्मनिरपेक्ष सोच को खुली चुनौती देती है, लेकिन प्रशासनिक लाचारी भी जगजाहिर है, जिसे बदले बिना धर्मनिरपेक्ष पूर्वाग्रहों से मुक्ति पाना बिल्कुल कठिन है।

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वहीं, भारतीय संविधान से जिन दलितों, पिछड़ों, सवर्णों और अल्पसंख्यकों ने स्थायी लाभ लिए, अब वहीं इसे वंशानुगत बनाये रखने की सियासी तिकड़म रच रहे हैं। यह संवैधानिक लाभ महादलितों, अत्यंत पिछड़े लोगों, गरीब सवर्णों और पसमांदा लोगों तक पहुंचे, इसकी राह में तरह तरह से रोड़े अटकाए जाते हैं। जिस तरह से जातिवादी आरक्षण का दुरूपयोग हो रहा है और एक बार इसका लाभ ले चुके लोग अपने बच्चों के लिए दुबारा लाभ लेने से भी नहीं हिचकिचाते हैं, जिससे जरूरतमंद लोगों तक आरक्षण का लाभ पहुंचना मुश्किल हो रहा है। आरक्षण के जातीय स्वरूप, क्रीमीलेयर मानदंडों में अव्यवहारिक तर्क और एक ही व्यक्ति को बार बार निर्वाचन क्षेत्रों में आरक्षण देने या फिर एक ही परिवार को नौकरियों में बार बार आरक्षण का लाभ देते रहने से यह पवित्र सोच भी अब कलुषित हो चुकी है। समाज के अन्य लोगों में इससे सत्ता प्रतिष्ठान के प्रति गहरा रोष देखा जाता है।

सच कहूं तो जातिवाद और सांप्रदायिकता जैसे पूर्वाग्रह समदर्शिता की राह के रोड़े बनकर भारतीय गणतंत्र की जड़ों को खोखला कर रही हैं, जबकि सर्वसम्मति की जगह बहुमत वाला गणतंत्र अपने ही अल्पमत लोगों के नैसर्गिक हितों पर कुठाराघात करता प्रतीत होता है। आलम यह है कि प्रवासी मजदूरों और छात्रों तक को प्रताड़ित करने में साधन संपन्न वर्ग नहीं हिचकता और भीड़ का न्याय भी जहां तहां सम्पन्न लोगों के खिलाफ दिख जाता है। भारत में ब्रेक के बाद होने वाले जातीय या क्षेत्रीय/भाषाई दंगे इसी बात की तस्दीक करते हैं।

दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि मीडिया और राजनीतिक विमर्श में पूर्वाग्रही ध्रुवीकरण बढ़ रहा है, जो नीतिगत मुद्दों को नजरअंदाज कर भावनात्मक विभाजन पैदा करता है। जहां कांग्रेस व क्षेत्रीय दलों की तुष्टीकरण वाली धर्मनिरपेक्ष राजनीति खतरनाक है, तो आरएसएस-बीजेपी की सेक्युलरिज्म विरोधी विचारधारा से भी लोग सांसत में रहने को अभिशप्त हैं। इसलिए बेहतर होगा कि संविधान के प्रस्तावना से 'समाजवादी' और 'सेक्युलर' शब्द हटाने की पहल की जाए, क्योंकि जाति व धर्म की आड़ में इनका दुरुपयोग हो रहा है। 

ऐसे में राजनीतिक विवाद स्वाभाविक बात है। आपने देखा होगा कि गणतंत्र दिवस परेड में दिल्ली के टेबलो को लगातार चौथी बार खारिज करने पर आप ने बीजेपी पर पूर्वाग्रह का आरोप लगाया, जबकि गुजरात-उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों को प्राथमिकता मिली। वहीं रक्षा मंत्रालय चयन प्रक्रिया को निष्पक्ष बताता है, लेकिन विपक्ष इसे राजनीतिक प्रतिशोध मानता है। पंजाब जैसे राज्यों के टेबलो अस्वीकृति ने भी विवाद बढ़ाया। 

ऐसे में संवैधानिक चुनौतियां भी स्वाभाविक हैं। आपको पता होना चाहिए कि संविधान निर्माता डॉ भीम राव  अंबेडकर ने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि सामाजिक असमानताओं पर लोकतंत्र की 'टॉप ड्रेसिंग' विफल हो जाएगी, जो आज मतदाता सूची शुद्धिकरण और नागरिकता संशोधन अधिनियम से साकार हो रही है। जहां कार्यपालिका का केंद्रीयकरण विधायिका-न्यायपालिका को कमजोर कर रहा है, वहीं UAPA जैसे कानून असहमति को दबाते हैं, लेकिन आपराधिक मिजाज पर अंकुश लगाते हैं।। कुलमिलाकर तमाम किंतु परन्तु के चलते देश में आर्थिक असमानता और बेरोजगारी जैसे मुद्दे गर्त में या हाशिए पर  धकेल दिए गए हैं, जो सार्वजनिक चिंता और लोक दुश्चिंता का सबब बना हुआ है।

देखा जाए तो भारत में राजनीतिक पूर्वाग्रहों के प्रमुख स्रोत पहचान-आधारित राजनीति, मीडिया प्रभाव, सामाजिक ध्रुवीकरण और संस्थागत दबाव आदि हैं। कमोबेश ये तमाम पूर्वाग्रह लोकतंत्र को कमजोर करते हुए विभाजनकारी विमर्श को बढ़ावा देते हैं, जिससे कहीं न कहीं समग्र राष्ट्रहित भ्रमित होता है। जहां पहचान-आधारित राजनीति यानी जाति और धर्म पर आधारित राजनीति पूर्वाग्रहों को गहरा करती है, वहीं दल विशेष इन पहचानों का उपयोग वोट बैंक के लिए करते हैं। वहीं, राम जन्मभूमि आंदोलन और नागरिकता संशोधन अधिनियम जैसे मुद्दों ने हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण बढ़ाया। कुछ लोग आरएसएस-बीजेपी जैसे संगठनों पर सांप्रदायिक पूर्वाग्रह के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन वो कांग्रेसियों और क्षेत्रीय दलों के सांप्रदायिक तुष्टीकरण वाली सोच की निंदा करने में भी गुरेज करते हैं। 

एक बात और, मीडिया और सोशल मीडिया यानी मीडिया घरानों पर सरकारी विज्ञापनों, कॉर्पोरेट हितों और राजनीतिक दबाव से पक्षपातपूर्ण कवरेज होता है। जबकि, सोशल मीडिया एल्गोरिदम फेक न्यूज और भावनात्मक फ्रेमिंग से ध्रुवीकरण तेज करते हैं। इस मामले में कांग्रेस और भाजपा एवं उनके समर्थक या विरोधी दल प्रचार दर प्रचार पर भारी खर्च कर पूर्वाग्रह फैलाते हैं। इससे संस्थागत और आर्थिक कारक तक प्रभावित होते हैं। खासकर राजनीतिक दलों का विज्ञापन और नियामक शक्ति मीडिया को प्रभावित करती है, जबकि आर्थिक मंदी सामाजिक विभाजनों को भड़काती है। इससे अभिप्रेरित कानून-व्यवस्था सम्बन्धी विफलताएं जैसे महाजंगलराज आदि पूर्वाग्रहपूर्ण राजनीति को जन्म देती हैं। 

इस प्रकार राजनीतिक पूर्वाग्रह मीडिया को विकृत करते हुए एकतरफा कवरेज, ध्रुवीकरण और जनमत निर्माण को प्रभावित करते हैं। ये पूर्वाग्रह सरकारी दबाव, कॉर्पोरेट हितों और संपादकीय झुकाव से उत्पन्न होकर लोकतंत्र की निष्पक्षता को कमजोर करते हैं। जहां तक चयनात्मक रिपोर्टिंग की बात है तो राजनीतिक पूर्वाग्रह मीडिया को विशिष्ट घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने या दबाने के लिए प्रेरित करते हैं, जैसे विपक्षी दलों की आलोचना पर अधिक जोर।

 वहीं, भारत में मुख्यधारा मीडिया अक्सर सरकार समर्थक या विरोधी रुख अपनाता है, जिससे जनता में ध्रुवीकृत धारणा बनती है। इनकी फंडिंग और नियंत्रण भी सवालों के दायरे में है, क्योंकि दल और सरकारें विज्ञापनों, कानूनी दबाव या स्वामित्व के माध्यम से मीडिया को प्रभावित करती हैं, जिससे पक्षपातपूर्ण सामग्री बढ़ती है।  उदाहरणस्वरूप, कांग्रेस या भाजपा या क्षेत्रीय दलों के शासनकाल में कुछ चैनलों पर विपक्षी मुद्दों की उपेक्षा देखी गई। 

वहीं सोशल मीडिया प्रभाव भी इनपर स्पष्ट देखा जाता है। खासकर राजनीतिक एल्गोरिदम भावनात्मक सामग्री को प्राथमिकता देकर पूर्वाग्रह फैलाते हैं, फेक न्यूज और ट्रायल बाय मीडिया को बढ़ावा देते हुए। इससे मीडिया ट्रायल जैसे आरुषि तलवार मामले में न्याय प्रक्रिया प्रभावित होती है। 

कहना न होगा कि भारतीय गणतंत्र को जातिगत, धार्मिक, राजनीतिक और सामाजिक पूर्वाग्रहों से मुक्त करने के लिए बहुआयामी सुधार आवश्यक हैं। ये सुधार कानूनी, शैक्षिक, सामाजिक और संस्थागत स्तर पर होने चाहिए। इसके लिए निम्नलिखित प्रमुख कदम उठाए जा सकते हैं। 

पहला, कानूनी सुधार यानी सामाजिक विधान बनाकर पूर्वाग्रहों को गैरकानूनी घोषित किया जाए, जैसे छुआछूत को समाप्त करने वाला कानून जो दलितों के प्रति पूर्वाग्रह कम करने में सफल रहा। 

दूसरा, चुनावी सुधारों में धनबल और अपराधीकरण को रोकने के लिए पारदर्शिता सुनिश्चित करें, जैसे उम्मीदवारों का आपराधिक रिकॉर्ड अनिवार्य घोषित करना। 

तीसरा, शैक्षिक प्रयास यानी शिक्षा पाठ्यक्रम में पूर्वाग्रह-विरोधी सामग्री शामिल करें, जो उदारता बढ़ाए और जाति-धर्म आधारित रूढ़ियों को तोड़े।

चतुर्थ, अनौपचारिक शिक्षा के माध्यम से परिवार और समुदाय स्तर पर जागरूकता फैलाएं, क्योंकि उच्च शिक्षा पूर्वाग्रह कम करती है। 

पांचवां, सामाजिक संपर्क बढ़ावा देने के तहत अंतर-जातीय विवाह और समूह संपर्क को प्रोत्साहित करें, जैसे आर्थिक सहायता देकर, ताकि गलतफहमियां दूर हों। 

छठा, अलगाव-विरोधी नीतियां अपनाएं, जैसे एकीकृत आवास योजनाएं, जो पूर्वाग्रह मजबूत करने वाली पृथक परियोजनाओं को बदलें। 

सातवां, संस्थागत मजबूती यानी चुनाव आयोग की स्वतंत्रता बढ़ाएं, जैसे मुख्य न्यायाधीश को नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल कर पारदर्शिता लाएं। वहीं, न्यायपालिका को पूर्वाग्रह-मुक्त बनाने के लिए डिजिटलीकरण और विविधता बढ़ाएं।

आठवां, प्रचार और जागरूकता यानी पूर्वाग्रह-विरोधी प्रचार रेडियो, टीवी और मीडिया से करें, जो अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावी साबित हुआ है। राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र लाकर पारदर्शिता सुनिश्चित करें।

- कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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