Parenting Mistakes । सबके सामने बच्चों को डांटना सही नहीं, पेरेंट्स आज ही बदलें अपनी ये आदत

सार्वजनिक रूप से डांटने पर बच्चे के मन में शर्म और डर बैठ जाता है, जो उसके व्यवहार में गुस्सा या डरपोकपन ला सकता है और सीखने की प्रक्रिया को बाधित करता है।
बच्चों की छोटी-छोटी गलतियों पर उन्हें डांटना लगभग हर माता-पिता की आदत होती है। इसमें खुद में कुछ गलत नहीं है, लेकिन अक्सर हम एक जरूरी बात भूल जाते हैं कि जब हम बच्चे को डांट रहे होते हैं, उस समय आस-पास कौन लोग मौजूद हैं। भीड़-भाड़ वाली जगह, रिश्तेदारों के सामने या स्कूल में डांटना बच्चे के मन पर बुरा असर डाल सकता है।
एक पैरेंट के तौर पर आपको उस वक्त शायद कुछ खास फर्क नजर न आए, लेकिन सच यह है कि ऐसी बातें बच्चे के दिल में गहरी छाप छोड़ जाती हैं। यह छाप धीरे-धीरे उसके आत्मविश्वास और सोच पर असर डालने लगती है।
एक्सपर्ट ने बताया सबके सामने डांटना आपके बच्चे को कैसे नुकसान पहुंचाता है?
दिल्ली के पीएसआरआई अस्पताल की कंसल्टेंट साइकोलॉजिस्ट अर्पिता कोहली के मुताबिक, सबके सामने डांटना सिर्फ उस पल की बात नहीं होती, बल्कि यह बच्चे के कोमल मन पर लंबे समय तक रहने वाले भावनात्मक घाव छोड़ सकता है।
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बच्चों की सेल्फ-रिस्पेक्ट होती है कम
जब बच्चे को सबके सामने डांटा जाता है, तो उसे बहुत बुरा लगता है। उसे लगता है कि उसकी इज्जत दूसरों के सामने कम हो गई है। धीरे-धीरे वह खुद को कम समझने लगता है। उसके अंदर शर्म और डर बैठ जाता है। यही चीज आगे चलकर उसके आत्मविश्वास को कमजोर कर देती है और वह हर काम में खुद पर शक करने लगता है।
बच्चे छिपाने लगते हैं अपनी गलतियां
बार-बार पब्लिक में डांट खाने से बच्चा सीखने की बजाय बचने की कोशिश करता है। उसे लगता है कि अगर गलती बताई तो फिर सबके सामने डांट पड़ेगी। इसलिए वह अपनी गलतियां छिपाने लगता है। इससे वह खुलकर बात करना बंद कर देता है और माता-पिता से दूरी बनाने लगता है। धीरे-धीरे भरोसा भी कम होने लगता है, जो एक अच्छे रिश्ते की सबसे जरूरी चीज है।
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बच्चों के स्वभाव में आ जाता है गुस्सा या डर
ऐसे बच्चों के व्यवहार में बदलाव दिखने लगता है। कुछ बच्चे बहुत चुप और डरपोक हो जाते हैं, तो कुछ जल्दी गुस्सा करने लगते हैं। उन्हें लोगों के बीच जाने से भी डर लग सकता है। ये बदलाव उनके दोस्ती, पढ़ाई और रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डालते हैं।
सही तरीका क्या हो सकता है?
अगर बच्चे से गलती हो जाए, तो उसे अकेले में प्यार से समझाना ज्यादा असरदार होता है। जब बच्चा खुद को सुरक्षित महसूस करता है, तब वह बिना डर के अपनी बात भी कहता है और गलती भी जल्दी समझता है। माता-पिता अगर धैर्य रखें और बच्चों से अच्छे से बात करें, तो रिश्ता मजबूत बनता है। बच्चा भी खुलकर अपने मन की बात बताता है और धीरे-धीरे बेहतर बनता जाता है।
पेरेंट्स जान लें, छोटी-सी समझ से बड़ा फर्क पड़ता है
बच्चों को सही-गलत सिखाना जरूरी है, लेकिन तरीका उससे भी ज्यादा जरूरी है। अगर हम थोड़ा सा ध्यान रखें कि कब और कैसे समझाना है, तो हम अपने बच्चे को डर नहीं, बल्कि आत्मविश्वास दे सकते हैं। यही छोटी-सी समझ उनके पूरे जीवन को बेहतर बना सकती है।
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