Chai Par Sameeksha I किसान आंदोलन तो स्थगित हो गया लेकिन क्या BJP के खिलाफ नाराजगी भी दूर हुई

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अंकित सिंह । Dec 11, 2021 4:13PM
ट्रैक्टरों के बड़े-बड़े काफिलों के साथ पिछले साल नवंबर में दिल्ली की सीमाओं पर पहुंचे आंदोलनरत किसानों ने सुबह अपने-अपने गृह राज्यों की तरफ लौटना शुरू कर दिया। साल भर से ज्यादा वक्त तक अपने घरों से दूर डेरा डाले हुए ये किसान अपने साथ जीत की खुशी और सफल प्रदर्शन की यादें लेकर लौट रहे हैं।

पिछले 1 साल से चला रहा किसान आंदोलन फिलहाल स्थगित हो गया है। सरकार की ओर से लिखित आश्वासन के बाद किसान अपने गांव की ओर लौटने लगे हैं। इसके साथ ही दिल्ली के तमाम बॉर्डर पर बैठे किसानों ने जगह को खाली कर दिया है। इस सप्ताह चाय पर समीक्षा के लिए हम भी किसानों के बीच पहुंचे। हमारे साथ प्रभासाक्षी के संपादक नीरज कुमार दुबे भी मौजूद थे। घर वापसी को लेकर जहां किसानों में खुशी थी, वहीं इस बात का भी गम था कि वह एक दूसरे से बिछड़ रहे हैं। इस दौरान नीरज कुमार दुबे ने कहा कि कहीं ना कहीं किसान एक बहुत बड़ी खुशी लेकर दिल्ली से लौट रहे हैं। सरकार ने इनकी लगभग सभी मांगों को मान ली है या फिर इन्हें लिखित आश्वासन दिया है। किसानों में इस बात की खुशी है कि उनका संघर्ष रंग लाया और आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा। किसानों ने यह खुलकर माना कि सरकार को आज नहीं तो कल हमारी मांग को मानना ही था।

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ग्राउंड रिपोर्ट देखने के बाद नीरज कुमार दुबे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि कहीं न कहीं किसानों के बीच एकता खूब मजबूत है। किसान चाहे कैसा भी मौसम रहे, किसी भी तरह की परिस्थिति क्यों ना रहे, अब जब किसानों की घर वापसी हो रही है तो उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं है। हमने सवाल किया कि क्या सरकार आगामी चुनाव के मद्देनजर किसानों की मांग को मानने के लिए तैयार हुई। इसके जवाब में नीरज दुबे ने कहा था कहीं ना कहीं भारत लोकतांत्रिक देश है और यहां हमेशा चुनाव होते है। अगर चुनाव के मद्देनजर सरकार लोगों की नाराजगी को दूर करती हैं तो वह भी एक अच्छी बात है। हालांकि कृषि कानूनों को लेकर कहीं ना कहीं आगामी चुनाव में एक दूसरे पर वार-पलटवार विपक्षी दल जरूर करेंगे। 

किसानों के प्रदर्शन स्थल- सिंघू बॉर्डर, गाजीपुर बॉर्डर और टिकरी बॉर्डर में सीढ़ी, तिरपाल, डंडे और रस्सियां ​​बिखरी पड़ी हैं क्योंकि कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन खत्म होने के बाद किसानों ने अपने तंबू उखाड़ लिए हैं और अपना सामान बांध कर उन्हें ट्रकों पर लादना शुरू कर दिया है। जोश पैदा करने के लिए किसान लगातार ‘बोले सो निहाल’ का नारा लगा रहे थे। उल्लेखनीय है कि 40 किसान संगठन की संस्था संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) ने बृहस्पतिवार को प्रदर्शन खत्म करने की घोषणा की थी। केंद्र के कृषि कानूनों को निरस्त करने की मांग को लेकर एक साल पहले उन्होंने विरोध प्रदर्शन शुरू किया था। सरकार द्वारा विवादास्पद कानूनों को वापस लेने के हफ्तों बाद किसान घर जा रहे हैं। 

साल भर के आंदोलन के बाद घर लौटने लगे किसान

ट्रैक्टरों के बड़े-बड़े काफिलों के साथ पिछले साल नवंबर में दिल्ली की सीमाओं पर पहुंचे आंदोलनरत किसानों ने सुबह अपने-अपने गृह राज्यों की तरफ लौटना शुरू कर दिया। साल भर से ज्यादा वक्त तक अपने घरों से दूर डेरा डाले हुए ये किसान अपने साथ जीत की खुशी और सफल प्रदर्शन की यादें लेकर लौट रहे हैं। किसानों ने सिंघू, टिकरी और गाजीपुर सीमाओं पर राजमार्गों पर नाकेबंदी हटा दी और तीन विवादास्पद कृषि कानूनों को निरस्त करने और फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर कानूनी गारंटी के लिए एक समिति गठित करने सहित उनकी अन्य मांगों को पूरा करने के लिए केंद्र के लिखित आश्वासन का जश्न मनाने के लिए एक विजय मार्च निकाला। एक सफल आंदोलन के बाद पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों में किसानों के अपने घरों के लिए रवाना होने के साथ ही भावनाएं उत्साह बनकर उमड़ने लगीं। रंग-बिरंगी रोशनी से सजे ट्रैक्टर जीत के गीत गाते हुए विरोध स्थलों से निकलने लगे और रंगीन पगड़ियां बांधे बुजुर्ग युवाओं के साथ नृत्य करते नजर आए। 

पंजाब के मोगा निवासी किसान कुलजीत सिह ओलाख ने घर लौटने को उत्सुक अपने साथी किसानों के साथ सफर शुरू करने से पहले कहा, “सिंघू बॉर्डर पिछले एक साल से हमारा घर बन गया था। इस आंदोलन ने हमें (किसानों को) एकजुट किया, क्योंकि हमने विभिन्न जातियों, पंथों और धर्मों के बावजूद काले कृषि कानूनों के खिलाफ एक साथ लड़ाई लड़ी। यह एक ऐतिहासिक क्षण है और आंदोलन का विजयी परिणाम और भी बड़ा है।” गाजीपुर सीमा पर एक किसान जीतेंद्र चौधरी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपने घर लौटने के लिए अपनी ट्रैक्टर-ट्रॉली तैयार करने में व्यस्त थे। उन्होंने कहा कि वह सैकड़ों अच्छी यादों के साथ और ‘काले’ कृषि कानूनों के खिलाफ मिली जीत के साथ घर जा रहे हैं। किसान 11 दिसंबर को ‘विजय दिवस’ के रूप में मना रहे हैं। तीन कृषि कानूनों को निरस्त करने की मांग को लेकर हजारों किसान पिछले साल 26 नवंबर से राष्ट्रीय राजधानी की सीमाओं पर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे।

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इन कानूनों को निरस्त करने के लिए 29 नवंबर को संसद में एक विधेयक पारित किया गया था। हालांकि, किसानों ने अपना विरोध समाप्त करने से इनकार कर दिया और कहा कि सरकार उनकी अन्य मांगों को पूरा करे जिसमें एमएसपी पर कानूनी गारंटी और उनके खिलाफ पुलिस में दर्ज मामले वापस लेना शामिल है। जैसे ही केंद्र ने लंबित मांगों को स्वीकार किया, आंदोलन की अगुवाई कर रही, 40 किसान यूनियनों की छत्र संस्था, संयुक्त किसान मोर्चा ने बृहस्पतिवार को किसान आंदोलन को स्थगित करने का फैसला किया और घोषणा की कि किसान 11 दिसंबर को दिल्ली की सीमाओं पर विरोध स्थलों से घर वापस जाएंगे। किसान नेताओं ने कहा कि वे यह देखने के लिए 15 जनवरी को फिर मुलाकात करेंगे कि क्या सरकार ने उनकी मांगों को पूरा किया है।

किसान नेताओं ने बंगला साहिब गुरुद्वारे में मत्था टेका

किसान आंदोलन की समाप्ति की घोषणा करने और 11 दिसंबर को प्रदर्शन स्थल को औपचारिक रूप से खाली करने से एक दिन पहले संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के वरिष्ठ किसान नेताओं और सदस्यों ने दिल्ली के बंगला साहिब गुरुद्वारा जाकर मत्था टेका। गुरुद्वारा बंगला साहिब में मत्था टेकने जाने वालों में बलबीर सिंह राजेवाल, राकेश टिकैत और मंजीत सिंह राये शामिल थे जिन्हें दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन समिति ने सम्मानित किया। मत्था टेकने के बाद राजेवाल ने कहा कि ‘काले’ कानूनों के खिलाफ किसानों की जीत हुई क्योंकि उनको गुरु साहिब का आर्शीवाद और जनता का समर्थन था। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन समिति द्वारा जारी बयान में राजेवाल को उद्धृत किया गया कि हम दिल्ली की जनता से शहर की सीमाओं पर प्रदर्शन की वजह से हुई पेरशानी के लिए माफी मांगते हैं। उनका आंदोलन को समर्थन याद रखा जाएगा। राकेश टिकैत ने बयान में कहा कि आंदोलन को सफल बनाने में डॉक्टरों, अस्पतालों, खाप पंचायतों, सफाई कर्मियों, गुरुद्वारा समिति और अन्य गुरुधामों ने अहम भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि आंदोलन सफल हुआ क्योंकि गुरु साहिब की कृपा थी। यहां तक कि तीनों कानूनों को वापस लेने की घोषण भी गुरुपरब को हुई। किसान आंदोलन ने भाईचारे को और मजबूत किया है।

- अंकित सिंह

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