कोरोना के सन्नाटे में रोमांटिक पर्वतीय स्थलों पर हनी भी है, मून भी है, नहीं हैं तो हनीमून कपल्स

कोरोना के सन्नाटे में रोमांटिक पर्वतीय स्थलों पर हनी भी है, मून भी है, नहीं हैं तो हनीमून कपल्स

कालका शिमला पर्वतीय रेल की यात्रा के दौरान पर्वतीय एवं प्राकृतिक सौन्दर्य का देखने का अपना ही आनन्द है। समुद्रतल से 656 मीटर ऊंचाई पर जब रेल कालका को छोड़ती है तो शिवालिक की घुमावदार पहाड़ी रास्ते से गुजरकर 2076 मीटर ऊंचाई पर स्थित शिमला तक जाती है।

पहाड़ों एवं प्रकृति का सौन्दर्य, गिरती हुई बर्फ और देवताओं के दर्शन करने वाले हिमाचल के रोमांटिक पर्यटन स्थलों पर हनी भी है, मून भी है, नहीं हैं तो हनीमून कपल्स नहीं हैं। हनीमून मनाने के लिए इन दिनों में यहां आने वाले हनीमून कपल्स एवं सैलानियों की चहल-पहल से आबाद रहने वाले ये पर्वतीय स्थल आज कोरोना की फैली वैश्विक महामारी से सुने पड़े हैं।

शिमला-

शिमला सैलानियों एवं हनीमून कपल्स के लिए एक रोमांटिक स्थान है। पहाड़ों की रानी कहे जाने वाले शिमला को सर्वप्रथम 1819 ई. में अंग्रेजों ने खोजा था और अपनी ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया था। शिमला को 25 जनवरी 1971 को पूर्ण राज्य का दर्जा देकर हिमाचल प्रदेश की राजधानी बनाया गया। यहां आईस स्केटिंग का एशिया का सबसे बड़ा एवं प्रमुख केन्द्र है। बताया जाता है कि शिमला का नाम यहां की देवी श्यामला के नाम पर रखा गया।

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शिमला विश्व का एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है। शिमला का रिज रोड़ नामक स्थान शहर के मध्य एक बड़ा एवं खुला स्थान है, यहां से पर्वत श्रृंखलाओं का मनोरम दृश्य देखा जा सकता है। यहां स्थित न्यू गोथिक वास्तुकला का क्राइस्ट चर्च, महात्मा गांधी, इन्द्रा गांधी एवं हिमाचल के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. वाई.एस. मरमर के स्टेच्यू, न्यू-ट्यूडर पुस्तकालय का भवन दर्शनीय हैं। यहीं पर कालीबाड़ी का मंदिर स्थापित है जिसे श्यामल देवी का मंदिर कहा जाता है। मंदिर में श्यामल देवी की प्रतिमा स्थापित है। शिमला से 2 किलोमीटर पर स्थित है भगवान हनुमान को समर्पित जाखू मंदिर। मंदिर के गर्भगृह में हनुमान जी की प्राचीन प्रतिमा विराजित है जबकि इसके बाहर हनुमान जी की 108 फीट ऊंची प्रतिमा बनाई गई है। यह मंदिर एक जाखू पहाड़ी टीले पर बना है। बताया जाता है कि त्रेता युग में ऋषि याकू ने यहां तपस्या की थी और यह मंदिर बनवाया था। जाखू पहाड़ी समुद्रतल से 2445 मीटर की ऊंचाई पर है जहां से बर्फीली चोटियों, घाटियों तथा शिमला का सुन्दर दृश्य दिखाई देता है। शिमला से 4 किलोमीटर पर प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर ग्लेन दर्शनीय स्थल है। 

रिज रोड़ क्षेत्र से जुड़ा है यहां का सर्वाधिक प्रमुख माल रोड़। माल रोड़ शॉपिंग एवं संस्कृति का महत्वपूर्ण केन्द्र है। यहां प्रायः सांकृतिक कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं। शिमला में गर्मी के मौसम में समर फेस्टिवल का आयोजन किया जाता है जिसमें देशभर के लोकप्रिय गायकों को बुलाया जाता हैं। शिमला में जोहनिस बेक्स संग्रहालय, हिमाचल राज्य संग्रहालय एवं शिमला विरासत संग्रहालय भी दर्शनीय हैं। शिमला से 5 किलोमीटर दूरी पर स्थित प्रोस्पेक्ट हिल पर कामना देवी का मंदिर बना है। शिमला में बने राष्ट्रपति भवन को 1950 तक वायसराय भवन कहा जाता था जिसमें 340 कमरे बने हैं। अब यहां भारत के राष्ट्रपति ग्रीष्मकाल के दौरान प्रवास पर आते हैं। यहां बने मुगल उद्यान वाटिका में कई प्रकार के गुलाब लगाये गये हैं। मार्च माह में यहां अनेक प्रकार के पक्षी देखे जा सकते हैं।

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कालका-शिमला पर्वतीय रेल-

कालका शिमला पर्वतीय रेल की यात्रा के दौरान पर्वतीय एवं प्राकृतिक सौन्दर्य का देखने का अपना ही आनन्द है। समुद्रतल से 656 मीटर ऊंचाई पर जब रेल कालका को छोड़ती है तो शिवालिक की घुमावदार पहाड़ी रास्ते से गुजरकर 2076 मीटर ऊंचाई पर स्थित शिमला तक जाती है। इस रेल मार्ग में 20 रेलवे स्टेशन, 103 लम्बी सुरंगे, 869 पुल एवं 919 घुमाव आते हैं। दो फीट एवं छह इंच नैरोगेज पर 9 नवम्बर 1903 यह रेलवे लाईन आज तक निरन्तर चल रही है। यूनेस्को के दल ने जब इसे और आस-पास के प्राकृतिक दृश्य को देखा तो उन्होंने 24 जुलाई 2008 को सांस्कृतिक श्रेणी में इसे विश्व विरासत घोषित किया।

इस रेलवे लाइन पर शिमला की ओर से जाने पर 7 किलोमीटर दूरी पर समर हिल एक खूबसूरत स्थान है। पेड़ों से घिरे इस स्थान का वातावरण अत्यन्त शांत एवं स्वच्छ है। समीप ही चैडविक जल प्रपात में 67 फीट ऊंचाई से गिरता हुआ झरना मनमोहक लगता है। यहीं पर भगवान हनुमान जी का मंदिर भी बना है। शिमला से 11 किलोमीटर दूरी पर तारा देवी मंदिर दर्शनीय स्थल है।

कुल्लू-

देवताओं की घाटी के नाम से प्रसिद्ध कुल्लू पर्वतीय क्षेत्र मनाली से 40 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। हिमाच्छादित चोटियां, स्वास्थप्रद जलवायु, हरे-भरे पहाड़, वन्यजीव कुल्लू को मनोरम एवं खूबसूरत बना देते हैं। यह एक लोकप्रिय हिल स्टेशन है जहां वर्षभर सैलानियों की आवाजाही रहती है। यहां ट्रेकिंग, स्कीइंग, हिम ट्रेकिंग साहसिक खेलों में रत सैलानी नजर आते हैं। कुल्लू की खूबसूरती हनीमून मनाने वालों के लिए आकर्षण का प्रमुख केन्द्र है। फूलों की घाटी एवं यहां का दशहरा विश्व में प्रसिद्ध हैं। बसन्त के मौसम में रंग-बिरंगे फूलों की घाटी, देवदार से घिरे रास्ते, खूबानी एवं बेर वृक्षों से यहां सौन्दर्य अतुल्य हो जाता है। दशहरे पर कुल्लू की शान विशेष रूप से देखने योग्य होती है। यहां लोक गीतों एवं नृत्यों के लिए भी कुल्लू घाटी प्रसिद्ध है। कुल्लू में एक किलोमीटर पर रघुनाथ मंदिर, 4 किलोमीटर पर एक गुफा में वैष्णव देवी मंदिर एवं 16 किलोमीटर पर केम्पिंग साइड मनोरम एवं दर्शनीय स्थल हैं। कुल्लू से 15 किलोमीटर पर बजौरा में बशेश्वर महादेव मंदिर एवं 42 किलोमीटर पर कसौला दर्शनीय स्थल है। कुल्लू में बने रस्सियों के पुल से दूसरी तरफ जाने पर घाटी की पुरानी राजधानी नग्गर जहां अनेक प्राचीन मंदिर बने हैं, पुपनी किला, मंदिर एवं पर्वतीय चित्रों का संग्रहालय भी दर्शनीय स्थल हैं।

डलहौजी-

हिमालय की कुदरती सुन्दरता को प्रदर्शित करने वाला डलहौजी पर्वतीय क्षेत्र 6 हजार से 9 हजार फीट की ऊंचाई पर एक रमणिक पर्यटन स्थल है। डलहौजी धौलाधार पर्वत श्रृंखला की पश्चिमी सीमा पर काठ लोग, पात्रे, तेहरा, बकटोरा एवं बलूम नामक पांच पहाड़ियों के आस-पास फैला हुआ है। यह स्कॉटिश और विक्टोरियन वास्तुकला की इमारतों वाला स्थान है। इसका संदर्भ महाभारत एवं अन्य पौराणिक साहित्यों में मिलता है। यहां राजशाही युग की भव्यता नजर आती है। बताया जाता है कि 19 वीं शताब्दी में ब्रिटिश गर्वनर जनरल लॉर्ड डलहौजी के नाम पर इस पर्वतीय क्षेत्र को बसाया गया। इसके आस-पास पाइन, देवदार, ओक और रोडो डेंड्रॉन फूलों सहित विविध प्रकार की आकर्षक वनस्पति पाई जाती हैं। रावी नदी का यहां अद्भुत दृश्य दिखाई देता है। पठानकोट-चम्बा के 120 किलोमीटर मार्ग पर स्थित बनीखेत कस्बे से 7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है डलहौजी। यहां कुल्लू-मनाली-धर्मशाला व शिमला के लिए सीधी बसे जाती हैं। 

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धर्मशाला-

धर्मशाला पर्वतीय क्षेत्र की ख्याति अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर छोटे ल्हासा के रूप में विख्यात है। बताया जाता है कि 1960 ई. में दलाईलामा ने यहां अपना अस्थाई मुख्यालय बनवाया था। धर्मशाला की ऊंचाई 4400 फीट से 6460 फीट के मध्य है। यहां पाइन के ऊँचे पेड़, चाय के बागान और इमारती लकड़ी के ऊंचे वृक्ष प्रकृति को मनोरम स्वरूप प्रदान करते हैं। अंग्रेजों ने इसे एक छोटे पर्यटक स्थल के रूप में बसाया था। धर्मशाला को दो भागों में बांटा जा सकता है, एक नीचला धर्मशाला जहां कोतवाली बाजार है तथा दूसरा ऊपरी धर्मशाला जिसे मक्लोडगंज के नाम से जाना जाता है, जो 1982 मीटर की ऊँचाई पर है। मक्लोडगंज तिब्बतीय बस्तियों का क्षेत्र है। यहां एक वृहत प्रार्थना चक्र एवं एक मठ में बौद्ध प्रतिमा दर्शनीय है। यह स्थान तिब्बत के धर्मगुरू दलाईनामा का निवास है। यहां सेंट जोन चर्च भी दर्शनीय है एवं त्रियूंड एक खूबसूरत पिकनिक स्थल है।

निचला धर्मशाला के कोतवाली बाजार से 3 किलोमीटर पर कुशलदेवी पत्थर मंदिर, 11 किलोमीटर पर डलझील पिकनिक स्थल, समीप ही एक जल प्रपात तथा भगसूनाथ मंदिर दर्शनीय है। धर्मशाला से 15 किलोमीटर दूरी पर चामुण्डा माता प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। धर्मशाला का निकटतम नैरोगेज रेलवे स्टेशन कांगड़ा है जहां से 18 किलोमीटर दूर धर्मशाला स्थित है। बड़ी रेलवे लाइन का निकटतम रेलवे स्टेशन 90 किलोमीटर दूर पठानकोट में है।

कुफरी-

अनन्त दूरी तक चलता आकाश, बर्फ से ढ़की चोटियां, गहरी घाटियां और मीठे पानी के झरने सभी कुछ मिलकर सैलानियों को कुफरी आने का निमंत्रण देते हैं। शिमला के समीप कुफरी समुद्र तल से 2510 मीटर की ऊंचाई पर हिमाचल प्रदेश के दक्षिणी भाग में स्थित है। ठण्ड के मौसम में यहां हर वर्ष यहां आने वाले पर्यटकों के लिए खेल कार्निवाल आयोजित किये जाते हैं। ठण्ड के मौसम में स्काइंग, टोबोगेनिंग, गो-कार्टिंग एवं घुड़सवारी का आनन्द ले सकते हैं। साथ ही पर्वतारोहण का भी अपना ही मजा है। यह स्थान साहसिक खेल प्रेमियों के लिए एक आदर्श स्थल है। महासूपीक, ग्रेट हिमालियन नेचर पार्क और फांगू कुफरी के प्रमुख पर्यटक स्थल हैं। ग्रेट हिमालियन नेचर पार्क में पक्षियों एवं जानवरों की 180 से ज्यादा प्रजातियां पाई जाती हैं। फांगू कुफरी से 6 किलोमीटर दूर प्रकृतिक का शांत स्थल है। यहां लकड़ियों से बने मंदिरों की नक्काशी देखते ही बनती है। कुफरी का निकटतम हवाई अड्डा शिमाला मंे है।

मनाली-

कुल्लू से उत्तर दिशा में 40 किलोमीटर दूर लेह की ओर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग पर घाटी के सिरे के पास स्थित मनाली का रमणीक पर्वतीय स्थल लोकप्रिय पर्यटक केन्द्र है। लाहौल स्पीति, बारां भंगल, कांगड़ाद्ध और जनस्कर पर्वत श्रृंखला पर चढ़ने वालों के लिए यह एक पसन्ददीदा स्थल है। यहां अनेक मंदिर एवं बौद्ध मंदिर बने हैं तथा रोमांचकारी गतिविधियां इसे हर मौसम में लोकप्रिय बनाती है। यहां हाइकिंग, लम्बी पैदल यात्राद्ध, पर्वतारोहण, पैराग्लाइडिंग, राफ्टिंग, ट्रेकिंग, कायाकिंग और माउन्टेन बाईकिंग के साथ-साथ याक स्कीइंग लोकप्रिय हैं। मनाली में मनाली के राजा तक्षपाल द्वारा निर्मित वशिष्ठ मंदिर, 600 वर्ष पुराना लकड़ी का बना ढूंगरी धून मंदिर एवं दो दिन की चढ़ाई कर हनुमान टिब्बा प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं। मनाली में बड़े-बड़े घने देवदार के वृक्षों की प्राकृतिक छंटा के बीच बना हिडम्बा देवी का मंदिर महत्वपूर्ण दर्शनीय स्थल है। मंदिर को 16 वीं सदी में राजा बहादुर सिंह द्वारा बनवाया गया था। यहां मई माह में एक बड़ा मेला लगता है। मनाली से 5 किलोमीटर पर प्रिनी गांव में अर्जुन गुफा एवं नेहरू कुण्ड, 6 किलोमीटर पर जगतसुख में बने अनेक मंदिर जिनमें 8 वीं शताब्दी का बना गौरी शंकर मंदिर भी है तथा 51 किलोमीटर पर खतरनाक रोहतांग दर्रा दर्शनीय स्थल हैं। मनाली का समीपस्थ रेलवे स्टेशन चण्डीगढ़ है। 

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सोलांग घाटी-

हिमाच्छादित पहाड़ों और ग्लेशियरों के मनोरम दृश्य लिये सोलांग घाटी समुद्रतल से 8500 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह घाटी पहाड़ों और हरे-भरे पेड़ों से ढकी है। यहां घाटी में ढलान बने हैं। सर्दियों में घाटी में जब बर्फ जमती है तो हर उम्र के सैलानी इसका मजा उठाते हैं। यह घाटी इस मौसम में स्कीइंग का स्वर्ग बन जाती है। यहां स्कीइंग एवं पैराग्लाइडिंग की मुख्य गतिविधियां हैं। सर्दी के मौसम में यहां स्कीइंग त्यौहार आयोजित किया जाता है। यहां पूरे वर्ष सबसे रोमांचक बर्फ-खेल का आनन्द लिया जा सकता है। जनवरी से फरवरी इस घाटी का सम्पूर्ण आनन्द लेने के लिए उचित समय है। यहां 1.5 किलोमीटर दूरी पर शूलिनी देवी का मंदिर देवी शूलिनी माता को समर्पित है। इस मंदिर का परिदृश्य अत्यन्त सुन्दर है यहां जून के अन्तिम सप्ताह में वार्षिक शूलिनी उत्सव मनाया जाता है, जिसमें राज्य से हजारों पर्यटक और श्रद्धालु भाग लेते हैं। उत्सव का मुख्य आकर्षण नृत्य, गायन एवं कुश्ती होती हैं। देवी की मूर्ति एक पालकी में सजाकर शोभा यात्रा निकाली जाती है।

चम्बा-

अपने रमणिक मंदिरों एवं हस्तशिल्प के लिए विख्यात चम्बा रावि नदी किनारे 996 मीटर की ऊंचाई पर स्थित चम्बा पहाड़ी पर स्थित है जो यहां के शासकों की राजस्थानी थी। इसकी स्थापना राजा साहिल वर्मा ने 920 ई. में की थी और अपनी प्रिय पुत्री चम्पावती के नाम पर इसका नाम चम्बा रखा। ऊंची पहाड़ियों से घिरे चम्बा में प्राचीन समय की धरोहर के दर्शन किये जा सकते हैं। यहां की वादियों में युवतियां भेड़ एवं बकरी चराती हुई नजर आती हैं जो यहां के पर्यटन में नया रंग भरती है। चम्बा इतिहास, धर्म, कला एवं पर्यटन का एक अनूठा संगम स्थल है। शिखर शैली में बना चम्पावती मंदिर पुलिस चौकी और कोषागार भवन के पीछे स्थित हैं। मंदिर में छत को पहियेनुमा बनाया गया है तथा मंदिर में पत्थरों पर की गई खूबसूरत नक्काशी दर्शनीय है। भगवान विष्णु को समर्पित राजा वर्मन साहिल द्वारा 10 वीं शताब्दी में बनवाया गया लक्ष्मी नारायण मंदिर वास्तुकला एवं मूर्तिकला का बेहतरीन उदाहरण है। मंदिर में चतुमूर्ति आकार में भगवान विष्णु की कांसे की बनी प्रतिमा स्थापित है। केसरिया रंग का यह मंदिर चम्बा के प्राचीन मंदिरों में गिना जाता है। मंदिर परिक्षेत्र में महाकाली, हनुमान, नन्दीगन के साथ-साथ विष्णु एवं शिव के तीन-तीन मंदिर बने हैं। यह मंदिर राजमहल जहां अब राजकीय महाविद्यालय है के समीप स्थित है। चम्बा क्षेत्र में करीब 75 मंदिर बने हैं। इनमें से कुछ मंदिर शिखर शैली के तथा कुछ मंदिर पर्वतीय शैली के हैं।

चम्बा में स्थित भूरी सिंह संग्रहालय भारत के पांच प्रमुख संग्रहालयों में से है। यहां 5 हजार से ज्यादा दुर्लभ कलाकृतियां, पेन्टिंग, भित्तिचित्र एवं पाण्डुलिपियां संजोई गई हैं। संग्रहालय में चम्बा के प्रसिद्ध रूमाल पर रानियों, राजाओं एवं राजदरबारों की कशीदाकारी देखते ही बनती है। वन्य प्रेमियों के लिए चम्बा से 22 किलोमीटर पर सलूनी से जुड़ी घाटी दर्शनीय है। भरभौर घने जंगलों से घिरा स्थल है। जनश्रुति के अनुसार 10 वीं शताब्दी में यहां 84 संत आये थे जिन्होंने राजा के पुत्रों व पुत्री को आशीर्वाद दिया था। यहां बने मंदिर चैरासी नाम से जाने जाते हैं। यहां लक्ष्मी, देवी, गणेश और नरसिंह मंदिर इसी के अन्तर्गत आते हैं। भरभौर से कुगती पास और कलीचो पास की ओर जाने के लिए एक अच्छा ट्रेकिंग मार्ग हैं।

चम्बा में एक किलोमीटर लम्बा और 75 मीटर चौड़ा एक खुले घास के मैदान को चैगान कहा जाता है। यहां प्रतिवर्ष मेले का आयोजन किया जाता है जिसमें स्थानीय निवासी रंग-बिरंगी वेश-भूषा के साथ शामिल होते हैं। इस अवसर पर सांस्कृति एवं खेल-कूद प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं। चैगान के उत्तर-पश्चिमी किनारे पर बना भगवान विष्णु का मंदिर ग्यारहवीं शताब्दी पुराना हैं। शाह मदार हिल चोटी पर सुई माता का मंदिर भी दर्शनीय है। चम्बा के सुराड़ा मोहल्ले में स्थित मुगल और ब्रिटिश शैली का रंग महल भी दर्शनीय है। 

खजियार (खज्जियार)-

चम्बा से 24 किलोमीटर दूर घास के मैदानों और जंगलों से घिरा हुआ खजियार हिल स्टेशन हिमालय के धौलाधार पर्वतश्रेणी का हिस्सा है। यहां झील, चरागाह एवं वन होने से पारिस्थितिक तंत्र का एक अनूठा संयोजन देखने को मिलता है। इसे कभी मिनी गुलमर्ग कहा जाता था जिसे अब मिनी स्वीटजरलैण्ड कहा जाता है। बताया जाता है कि 7 जुलाई 1992 को स्वीटजरलैण्ड के राजदूत विली टी. ब्लेजर यहां आये थे और उन्होंने सरकारी तौर पर एक चैकोर पत्थर पर इसे मिनी स्वीट्जरलैण्ड बताते हुए लिखवाया कि स्विस कैपिटल बर्न से इसकी दूरी 6194 किलोमीटर है। वे यहां से एक पत्थर भी ले गये और राजधानी बर्न के संसद भवन के पास उसे लगवाया जिस पर उन्होंने खजियार को मिनी स्वीट्जरलैण्ड होने की व दूरी की बात अंकित करवाई। खजियार के मिनी स्वीट्जरलैण्ड का क्षेत्रफल 2,27,670 वर्ग मीटर है। 

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खजियार में छोटी सी झील जो तश्तरी के आकार की है तथा हरे-भरे अस्थाई द्वीप जैसी नजर आती है दर्शनीय है। यहीं पर चम्पा प्रीति राजा द्वारा निर्मित 12 वीं शताब्दी का सुन्दर लकड़ी की कारीयुक्त खजजी नाग का मंदिर यहां के निवासियों के लिए विशेष महत्व रखता है। यहां नाग देवता के प्रति बड़ी आस्था है। मंदिर में नाग की एक विशाल प्रतिमा स्थापित की गई है। मंदिर के बाहर भी नाग देवता की एक विशाल प्रतिमा नजर आती है। बताया जाता है कि मंदिर के पुनः निर्माण का कार्य चम्बा के राजा पृथ्वी सिंह ने करवाया था। मंदिर की नक्काशी देखकर दर्शक दंग रह जाते हैं।

नारकण्डा-

शिमला से 65 किलोमीटर दूर शिवालिक पर्वत माला रेंज में स्थित नारकण्डा ऊंची पहाड़ियों, गहरी घाटियों, प्राकृतिक सुषमा, शांत वातावरण वाला एक आकर्षक स्थल है। यहां कैल एवं तोश के वृक्ष भारी मात्रा में पाये जाते हैं। स्थानीय बाजार से 2 किलोमीटर पर धमड़ी नामक स्थल पर स्कीइंग केन्द्र है जहां जनवरी से मार्च में प्रशिक्षण भी दिया जाता है। शिमला से नारकण्डा सुबह जाकर शाम को लौटकर आया जा सकता है। रास्ते में सड़क के दोनों ओर गहरी खाई एवं ऊंचे पर्वतों का नजारा मनमोहक लगता है। नारकण्डा में ठहरने के लिए एक डाकबंगला भी मौजूद है। 

लाहौल स्पीति-

लाहौल स्पीति हिमाचल का एक जिला है जिसका मुख्यालय केलांग में स्थित है। यह समुद्रतल से 10050 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। रोहतांग दर्रा इसे कुल्लू घाटी से अलग करता है। शिमला से स्पीति तक किन्नौर होते हुए सड़क मार्ग बना है। यह पर्वतीय खूबसूरती के साथ-साथ अनेक बौद्धमठ, जीवजन्तु, वनस्पति एवं साहसिक खेलों के लिए यह एक आदर्श स्थल है। यहां के मठों की खूबसूरती तथा उनकी स्थापत्य कला देखते ही बनती है। यहां काजा का त्रिमूर्ति बौद्ध मठ दर्शनीय है। काजा से 8 कि.मी. ऊपर गेलुग्पा सम्प्रदाय से संबंधित गोंपा विश्व में प्रसिद्ध है। यहां धंकाचित्रों का विशाल संग्रह है। यहां 100 से ज्यादा आवासीय कक्ष हैं। कक्षों में कंज्यूर एवं तंज्यूर ग्रंथों का अच्छा संग्रह है। यहां अनेक दुर्लभ वाद्ययंत्र भी देखने को मिलते हैं। यहां का छम नृत्य प्रसिद्ध है। कुजम दर्रा, रोहतांग दर्रा एवं केलांग भी मुख्य दर्शनीय स्थल है। स्पीति घाटी में बर्फ के हिमतेंदुए, बबैक्स, हिमालयी ब्राउन भालू, मस्क हिरण, हिमालयी नीली भेड़ आदि अनेक जीवजन्तु देखने को मिलते हैं। यहां विदेशी वनस्पतियों की प्रचुरता के साथ-साथ औषधीय पौधों की 62 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। यह स्थल ट्रेकर्स के लिए आकर्षक स्थल है। यहां स्कीइंग लोकप्रिय साहसिक खेल है तथा याक सफारी सबसे रोमांचक है।

डॉ.प्रभात कुमार सिंघल

लेखक एवं पत्रकार