Travel Tips: धरती पर 'नरक का दरवाजा' बना Tourist Hotspot, जानिए Turkmenistan की इस जलती हुई जगह का Secret

Gate of Hell
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अगर हम आपसे कहें कि जैसा हम सोचते हैं, ठीक वैसा ही नरक धरती पर मौजूद है। तो क्या आप यकीन कर सकेंगे। लेकिन यह सच है। इस जगह का नाम 'दरवाजा गैस क्रेटर' है, जिसको पूरी दुनिया 'गेटवे टू हेल' यानी कि 'नरक का दरवाजा' के नाम से जाना जाता है।

पृथ्वी पर ऐसी कई जगहें मौजूद हैं, जोकि हमारी कल्पनाओं से परे हैं। हम जितना अधिक पृथ्वी के बारे में जानने का प्रयास करते हैं, वह हमको उतना ही आश्चर्यचकित करते हैं। बताया जाता है कि स्वर्ग और नरक दोनों ही पृथ्वी पर मौजूद हैं। जब हम स्वर्ग के बारे में सोचते हैं, तो हमारे दिमाग में कुछ बेहद खूबसूरत जगहें आती हैं। लेकिन जब नरक के बारे में सोचते हैं, तो आग की लपटें और अंधेरा दिखता है। अगर हम आपसे कहें कि जैसा हम सोचते हैं, ठीक वैसा ही नरक धरती पर मौजूद है। तो क्या आप यकीन कर सकेंगे। लेकिन यह सच है।

इस जगह का नाम 'दरवाजा गैस क्रेटर' है, जिसको पूरी दुनिया 'गेटवे टू हेल' यानी कि 'नरक का दरवाजा' के नाम से जाना जाता है। इसमें जाने वाले एक शख्स ने बताया था कि यह मंगल ग्रह जैसा लगता है।

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जानिए कहां है दरवाजा गैस क्रेटर

बता दें कि दरवाजा गैस क्रेटर तुर्कमेनिस्तान में है। जोकि राजधानी अश्गाबात से करीब 260 किमी दूर काराकुम रेगिस्तान के दरवेज गांव में है। साल 1971 में इस जगह की खोज हुई थी। तब से लेकर आज तक यह आग जल रही है। इस पर दुनिया भर के वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं।

क्यों जल रही है आग

इस दरवाजा गैस क्रेटर में लगातार आग जलने के पीछे पूरी तरह से साइंस है। जिस रेगिस्तान में यह गड्ढा है, उसको दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस भंडार कहा जाता था। यह रेगिस्टान में मिथेन गैस और आग से भरा है। सालों से यहां पर 1000 सेल्सियम के तापमान आग जल रही है।

कैसे हुई इसकी खोज

साल 1971 में सोवियत संघ के वैज्ञानिक तुर्कमेनिस्तान गए। थे। यहां पर वैज्ञानिक तेल और गैस की खोज कर रहे थे, लेकिन तभी उनका ड्रिलिंग एक बड़े गैस भंडार में घुस गया। जिसके बाद वहां की जमीन धंस गई। जब जमीन धंसी तो वैज्ञानिकों ने देखा कि गड्ढे से मीथेन गैस निकल रही है। मीथेन एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है, जिसका हमारे पर्यावरण पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। उस समय वैज्ञानिकों से सोचा कि अगर गड्ढे में आग लगा दें, तो मीथेन गैस खत्म होगी और आग बुझ जाएगी, लेकिन जैसा वैज्ञानिकों से सोचा था, वैसा नहीं हुआ।

यह आग आज भी जल रही है। तुर्कमेनिस्तान के कुछ लोगों का मानना है कि यह गड्ढा साल 1960 के दशक में बना था और 1980 के दशक में जलना शुरू हुआ था। लेकिन यह गड्ढा कब बनना शुरू हुआ, इसके बारे में कोई सटीक जानकारी नहीं है।

जिंदा मिले बैक्टीरिया

वैज्ञानिकों ने इस गड्ढे की मिट्टी पर रिसर्च की, तो उन्होंने पाया कि कुछ ऐसे बैक्टीरिया हैं, जोकि जीवित हैं। साल 2013 में दुनियाभर की मुश्किल जगहों पर जाने वाले एक शख्स दरवाजा गैस क्रेटर के अंदर गए थे। यहां जाने के लिए उन्होंने एल्यूमीनियम से बने खास कपड़े पहने थे। वहीं उन्होंने सांस लेने के लिए स्कूबा गियर जैसा एक उपकरण भी लगाया था।

दरवाजा गैस क्रेटर के अंदर जाने वाले इस शख्स ने बताया था कि इसके अंदर जाकर ऐसा लगा था, जैसे वह किसी दूसरे ग्रह पर आ गए हैं। वह यहां से मिट्टी का कुछ सैंपल अपने साथ लाए थे, जिस पर रिसर्च की गई थी। इस रिसर्च में पता चला था कि गड्ढे के अंदर इतने गर्म तापमान में भी कुछ बैक्टीरिया जीवित थे।

तुर्कमेनिस्तान की बना पहचान

बता दें कि इसकी आग को बुझने में दशकों लग सकते हैं। क्योंकि तुर्कमेनिस्तान में दुनिया का सबसे बड़ा नेचुरल गैस का भंडार है। दरवाजा गैस क्रेटर तुर्कमेनिस्तान की पहचान बन गया है। हर साल लाखों की संख्या में देखने के लिए पर्यटक आते हैं। यहां पर किसी तरह का हादसा न हो, इसलिए इसके चारों ओर रेलिंग लगा दी गई है। वहीं एक व्यू पॉइंट भी बनाया गया है, जिससे टूरिस्ट इसको देख सकें।

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